भोपाल में गैस राहत अस्पताल खुद ICU में:डॉक्टर नहीं, मशीनें ताले में, इलाज सिर्फ कागजों में; सुप्रीम कोर्ट की मॉनिटरिंग कमेटी की रिपोर्ट

भोपाल गैस त्रासदी को 40 साल होने वाले हैं, लेकिन दर्द, लापरवाही और सरकारी उदासीनता से आज भी पीड़ित परेशान होने के मजबूर हैं। जिन गैस पीड़ितों को इलाज, राहत और पुनर्वास देने के लिए शहर में छह गैस राहत अस्पताल खोले गए थे, वे अस्पताल आज खुद गंभीर रूप से बीमार हैं। कहीं डॉक्टर नहीं, कहीं मशीनें ताले में बंद और कई सुविधाएं सालों से ठप पड़ी हैं। सुप्रीम कोर्ट की मॉनिटरिंग कमेटी की रिपोर्ट ने इस व्यवस्था की भयावह सच्चाई को उजागर किया है।

मॉनिटरिंग कमेटी के सदस्य पूर्णेंदु शुक्ला ने बताया कि सरकार गैस पीड़ितों के प्रति गंभीर नहीं है। डॉक्टर रिटायर होते हैं, बदले में नियुक्ति नहीं होती हैं। 40 साल पुराने उपकरण हैं। जिम्मेदार चाहते ही नहीं हैं कि यह अस्पताल ठीक से चलें।

कमेटी ने जो रिपोर्ट हाईकोर्ट में पेश की है, उसने गैस राहत अस्पतालों की बदहाली की तस्वीर सामने रखी है। इन अस्पतालों में कहीं डॉक्टर नहीं तो कहीं टेस्टिंग की सुविधा तक नहीं है। वहीं, कुछ अस्पताल तो दशकों पुराने उपकरणों पर आज भी निर्भर हैं।

ताले में सोनोग्राफी मशीनें साल 2023 में गैस राहत अस्पतालों में नई सोनोग्राफी मशीनें खरीदी गईं। लेकिन आज तक उपयोग नहीं हुईं, क्योंकि रेडियोलॉजिस्ट की पोस्ट ही खाली है। प्रतिदिन 50 से अधिक महिला मरीज सोनोग्राफी न हो पाने से परेशान हैं। कई मशीनें बिना चले खराब हो रही हैं। इनके बेहतर इस्तेमाल के लिए महिला डॉक्टरों को ट्रेनिंग देने का प्रयास भी असफल रहा।

चार साल से नहीं हो रहे ऑपरेशन बिगड़े हालात का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कमला नेहरू अस्पताल में बीते चार साल से कोई ऑपरेशन नहीं किया गया। दरअसल विभाग में एनीस्थिसिया विशेषज्ञ नहीं है। ऐसे में ऑपरेशन की जरूरत वाले मरीजों को हमीदिया अस्पताल रेफर कर दिया जाता है। यहां सिर्फ मरीजों की मरहम पट्टी ही हो पाती है।

मरीज होते हैं परेशान 28 साल की शबनम खान पेट में दर्द के बाद पास के ही क्लिनिक पहुंची तो डॉक्टर ने उन्हें सोनोग्राफी कराने की सलाह दी। वे गैस पीड़ित हैं, इसलिए सोनोग्राफी के लिए जवाहर लाल नेहरू अस्पताल चली गई। लेकिन यहां रेडियोलाजिस्ट ना होने पर सोनोग्राफी नहीं हो सकी।

इसके बाद वे मास्टर लाला सिंह अस्पताल गईं लेकिन यहां भी सोनोग्राफी नहीं हो सकी। अंत में उन्हें प्राइवेट सेंटर पर ही जांच करानी पड़ी। जांच के बाद शबनम का ऑपरेशन भी नहीं हो सका क्योंकि यहां कई सालों से एनीस्थिसिया स्पेशलिस्ट नहीं है। अंतत: शबनम को मजबूरन निजी अस्पताल में ऑपरेशन कराना पड़ा।

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