मध्य प्रदेश में नगरीय निकायों का 33 प्रतिशत सीवेज बिना उपचार किए मिल रहा जल स्रोतों में

भोपाल। मध्य प्रदेश के नगरीय निकायों से प्रतिदिन निकलने वाले 2,183 एमएलडी (मिलियन लीटर पर-डे) सीवेज में से 1500 एमएलडी यानी लगभग 33 प्रतिशत ही अभी उपचारित या शोधित हो पा रहा है। बाकी बिना शोधन के ही जल स्रोतों में मिल रहा है। यह जानकारी प्रदूषण नियंत्रण मंडल द्वारा तैयार एक रिपोर्ट में सामने आई है। बता दें, नर्मदा और शिप्रा जैसी नदियों में भी बिना उपचारित सीवेज मिल रहा है।इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पेयजल का मामला सामने आने के बाद लोगों की चिंता और बढ़ गई है। इसकी वजह यह कि सीवेज के पानी में ई-कोलाई सहित कई खतरनाक बैक्टीरिया होते हैं जो पेट में पहुंचकर संक्रमण पैदा करते हैं। ये कभी भी जानलेवा बन सकते हैं। अधिकारियों का कहना है कि प्रदेश में 223 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) निर्माणाधीन हैं, जबकि 225 प्रस्तावित हैं।

सीवेज ट्रीटमेंट

इनके बनने के बाद अधिक से अधिक सीवेज का ट्रीटमेंट होने लगेगा। बता दें, सीवेज ट्रीटमेंट गंदे पानी से हानिकारक पदार्थों, कार्बनिक कचरे और बैक्टीरिया को हटाकर उसे सुरक्षित बनाने की कई चरणों की प्रक्रिया है। इसमें पानी को पुन: उपयोग या पर्यावरण में छोड़ने लायक बनाया जाता है, जिससे जन स्वास्थ्य और जल संसाधनों की रक्षा होती है।

नर्मदा नदी में मिल रहा गंदा पानी

नर्मदा नदी में इसके किनारे के नगरीय निकायों का सीवेज मिल रहा है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने इसे गंभीरता से लिया है। एक याचिका की सुनवाई करते हुए एनजीटी ने राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि बिना उपचारित पानी, सीवेज, रसायनयुक्त पानी नर्मदा नदी में नहीं मिलना चाहिए। प्रदूषण नियंत्रण मंडल को इसकी निगरानी की जिम्मेदारी दी गई।

मंडल सैंपल लेकर जांच कराता है। इसी तरह से कुछ तालाबों और अन्य नदियों में सीवेज मिल रहा है। उद्योगों की बात करें तो प्रदेश में कुल 32,823 उद्योगों में से 2,324 जल प्रदूषणकारी हैं। हालांकि, रिपोर्ट में प्रदूषण नियंत्रण मंडल ने दावा किया है कि इनसे 640 एमएलडी दूषित जल उत्पन्न होता है, जबकि उपचार करने की क्षमता 913 एमएलडी है। यानी उपचार के बाद ही पानी छोड़ा जा रहा है।

बड़ी चुनौती ग्रामीण क्षेत्र का सीवेज

नगरीय क्षेत्र से निकलने वाले सीवेज को उपचारित करने के लिए अमृत-2 परियोजना सहित अन्य प्रोजेक्ट के माध्यम से काम हो रहा है, पर बड़ी चुनौती ग्रामीण क्षेत्र का सीवेज है। यह लगभग 6,500 एमएलडी है। रिपोर्ट में भी कहा गया है कि प्रदेश में घरेलू दूषित जल (सीवेज) के पर्यावरण अनुकूल प्रबंधन के लिए सभी गांवों में भी एसटीपी लगाने की आवश्यकता है।

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