पाकिस्तान के पाले में जा रहा भारत का दोस्त रूस? 10 सालों में सुरक्षा से व्यापार तक में किए समझौते, अब ट्रेन भी दौड़ेगी

इस्लामाबाद: दुनिया के दो देशों के बीच रिश्ते में बदलाव आना कोई नई बात नहीं है। कई देशों में वक्त के साथ रिश्ते बेहतर होते हैं या फिर किसी मुद्दे पर तनाव आ जाता है। कई दफा ऐसा होता है कि रिश्ते में बदलाव बहुत साफ होता है लेकिन कई बार चीजें चर्चा से दूर चलती रहती हैं और मजबूती से अपना काम करती रहती हैं। रूस और पाकिस्तान के बीच कुछ ऐसा ही हो रहा है। रूस और पाकिस्तान के बीच बीते दस सालों में लगातार भरोसा बढ़ा है, जो सुर्खियों से परे रहा है।

आरटी की रिपोर्ट बताती है कि इस साल कई ऐसे घटनाक्रम हुए, जो रूस-पाकिस्तान में सुरक्षा, कूटनीति, ऊर्जा और व्यापार में बढ़ते सहयोग को दिखाते हैं। दोनों देशों के बीच खासतौर से अफगानिस्तान साझा चिंता का विषय बना हुआ है। ये घटनाक्रम इसलिए अहम है क्योंकि पाकिस्तान दशकों तक अमेरिकी कैंप का हिस्सा रहा है। वहीं रूस के लिए भारत भरोसेमंद सहयोगी रहा। ऐसे में रूस-पाकिस्तान की नजदीकी भारत के लिए भी कई लिहाज से फिक्र का सबब है।

पर्दे के पीछे की गतिविधियां

इस साल 23 जून को रूस और पाकिस्तान के अधिकारी इस्लामाबाद में ‘आतंकवाद के खिलाफ वर्किंग ग्रुप’ की बैठक के लिए इकट्ठा हुए। इस बैठक में विशेष रूप से अफगानिस्तान से पैदा होने वाले खतरों पर जोर दिया गया। यह इस तरह की 12वीं बैठक थी। यह संख्या बताती है कि इस रिश्ते में एक निरंतरता है। एक ऐसा रिश्ता जो सरकार बदलने और भू-राजनीतिक माहौल में बदलाव के बावजूद कायम रह सके। इसमें दोनों पक्षों ने माना कि आपस में खुफिया जानकारी साझा करना और अंतरराष्ट्रीय सहयोग बहुत जरूरी होगा।

इस तरह के द्विपक्षीय चैनल उस कमी को पूरा करते हैं, जिसे शंघाई सहयोग संगठन (SCO) और संयुक्त राष्ट्र (UN) जैसे धीमे और नौकरशाही वाले बहुपक्षीय संगठन अकेले पूरा नहीं कर सकते हैं। पाकिस्तान ‘आतंकवाद से निपटने’ में रूस के अनुभव को महत्व देता है। जबकि रूस को अपनी पश्चिमी सीमा पर पाकिस्तान के अपने ऑपरेशनल अनुभव में दिलचस्पी है। यह कोई औपचारिक गठबंधन नहीं है लेकिन इससे दोनों पक्षों को फायदा होता है। 6 जून को पाकिस्तान के गृह मंत्री मोहसिन नकवी बिश्केक में अपने रूसी समकक्ष व्लादिमीर कोलोकोल्त्सेव से मिल चुके हैं।

साझा समस्याएं, अलग-अलग नजरिए

दोनों देशों की कुछ चिंताएं एक जैसी हैं। इस द्विपक्षीय एजेंडे में अफगानिस्तान टॉप में है। हालांकि पाकिस्तान और रूस का इसे देखने का नजरिया अलग-अलग है। इस्लामाबाद की मुख्य चिंता वे समूह हैं, जिनके बारे में उसका दावा है कि वे अफगानिस्तान की जमीन से पाकिस्तान के ठिकानों पर हमले करते हैं।

पाकिस्तान की चिंता में खासतौर से बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी और तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) का नाम है। वहीं मॉस्को की सबसे बड़ी चिंता इस्लामिक स्टेट खोरासान प्रोविंस (ISKP) है। इस गुट ने अफगानिस्तान की सीमाओं से दूर, यहां तक ​​कि रूस के अंदर भी हमले करने का दावा किया है।

अर्थव्यवस्था और व्यापार

रूस और पाकिस्तान की अफगानिस्तान के मुद्दे पर साझा सुरक्षा चिंता हैं तो दोनों देश आर्थिक संबंध भी मजबूत कर रहे हैं। दोनों देशों की सरकारें अब जून में 2030 तक चलने वाले आर्थिक सहयोग कार्यक्रम पर काम करने के लिए सहमत हुई। इस कार्यक्रम का मकसद व्यापार और निवेश को बढ़ाना और आपसी कारोबार में लंबे समय से चली आ रही बाधाओं को दूर करना है।

पाकिस्तान के ऊर्जा मंत्री ने रूस से आर्थिक संबंधों पर कहा है कि व्यापार, ऊर्जा, रक्षा और टेक्नोलॉजी के क्षेत्रों में रूस से रिश्ता सोवियत-युग के ‘दोस्त ना होने वाले देश’ के दर्जे से बदलकर ‘भरोसेमंद दोस्त’ का हो गया है। उन्होंने दोनों देशों के बेहतर होते रिश्ते के उदाहरण के लिए पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और राष्ट्रपति पुतिन के बीच हाल ही में हुई चार मुलाकातों का जिक्र किया।

कनेक्टिविटी पर खास ध्यान

पाकिस्तान और रूस सीधे संपर्क पर खास ध्यान दे रहे हैं। पाकिस्तान, रूस के ‘इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर’ में शामिल होने की संभावनाओं पर विचार करने के लिए सहमत हो गया है। यह 7,200 किलोमीटर लंबा समुद्री, रेल और सड़क नेटवर्क है। यह नेटवर्क भारत, ईरान, अजरबैजान, रूस और मध्य एशिया को जोड़ता है। इसमें पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट को एक संभावित लिंक पॉइंट के तौर पर देखा जा रहा है।

रूस ने एक ऐसे रेलवे रूट का पता लगाने का प्रस्ताव दिया है, जो उसे हिंद महासागर से जोड़ सके और भारत तक पहुंचने का रास्ता बना सके। जो संभावित रूट बताया गया है, वह रूस से शुरू होकर तुर्कमेनिस्तान, ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान से होते हुए भारत तक पहुंचता है। रेलवे कनेक्टिविटी से रूस को पूरी तरह समुद्री रास्तों पर निर्भर रहे बिना हिंद महासागर की ओर सामान भेजने का एक जरिया मिल जाएगा।

धीरे-धीरे हो रही प्रगति

रूस और पाकिस्तान में वर्किंग ग्रुप की बैठकें, समझौते, चेयरमैनशिप का हस्तांतरण और बातचीत एक दशक से चल रही हैं। इसकी रफ्तार बहुत धीमी लगती है लेकिन इन सबके पीछे एक ठोस पैटर्न है। पाकिस्तान और रूस का एक ऐसा डिप्लोमैटिक कैलेंडर है, जो 2027 तक पाकिस्तान को एक बड़ा क्षेत्रीय मंच देता है।

पाकिस्तान और रूस के संबंध पहले काफी हद तक इतिहास से तय होते थे लेकिन अब वे नियमित बातचीत और व्यावहारिक सहयोग से आगे बढ़े हैं। आज उनके संबंध राजनीतिक बातचीत तक सीमित नहीं हैं। इसमें सुरक्षा, व्यापार, ऊर्जा, शिक्षा और सांस्कृतिक संपर्क शामिल हैं। ये प्रगति धीरे-धीरे हुई है लेकिन संबंधों में गहराई और मजबूती आई है।

भारत की बढ़ेगी चिंता!

रूस और पाकिस्तान के बीच बढ़ते कूटनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा संबंध भारत के लिए रणनीतिक चिंता का सबब हो सकते हैं। रूस का चीन-पाकिस्तान धुरी के साथ तालमेल भारत के दीर्घकालिक हितों को प्रभावित कर सकता है। खासतौर से अफगानिस्तान में रूस की एंट्री मुश्किल का सबब बन सकती है क्योंकि भारत भी काबुल में दखल बढ़ा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि रूस का पाकिस्तान को सामरिक महत्व देना दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकता है।

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