रायपुर। विवेकानंद नगर स्थित ज्ञानवल्लभ उपाश्रय में जारी सर्वमंगलमय वर्षावास 2026 में धर्म, ध्यान, भक्ति, तप और आराधना का क्रम जारी है। बुधवार को धर्मसभा में मुनि संवेगरत्न सागर ने रक्षाबंधन पर्व के आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए इसे साधर्मियों की सेवा और धर्म-संस्कृति की रक्षा का संकल्प लेने का पर्व बताया।
मुनिश्री ने कहा कि रक्षाबंधन केवल भाई-बहन के रिश्ते तक सीमित त्योहार नहीं, बल्कि साधर्मियों के प्रति वात्सल्य और सेवा की भावना को मजबूत करने का अवसर है। इस दिन संकल्प लेना चाहिए कि जीवनभर धर्म, संस्कृति और साधर्मियों की रक्षा के लिए तत्पर रहेंगे। साधर्मियों की जरूरत के समय उनके साथ खड़े रहना और उनके प्रति वात्सल्य एवं निश्छल प्रेम रखना चाहिए। इसी पवित्र भावना के कारण रक्षाबंधन को वात्सल्य पर्व भी कहा जाता है।
मुनिश्री ने कहा कि धर्म, संस्कृति, राष्ट्र, प्रकृति, स्वजन और स्वयं की रक्षा का संकल्प तभी सार्थक हो सकता है, जब इनके प्रति हमारे भीतर प्रेम हो। जिससे प्रेम होता है, उसकी रक्षा के लिए व्यक्ति हर परिस्थिति में खड़ा रहता है। इसलिए अपने धर्म, संस्कृति, राष्ट्र, प्रकृति, स्वजनों और आत्मा के प्रति प्रेम की भावना विकसित करना जरूरी है।
मुनिश्री ने कहा कि रक्षाबंधन के अवसर पर प्रत्येक व्यक्ति को आत्मचिंतन करते हुए यह विचार करना चाहिए कि वह अपने धर्म और संस्कृति के संरक्षण के लिए क्या योगदान दे सकता है। साधर्मियों के प्रति वात्सल्य और सेवा की भावना को व्यवहार में उतारना ही इस पर्व की वास्तविक सार्थकता है।