नेपाल में विदेश मंत्री बनाम वित्त मंत्री, बाढ़ पर मुआवजे को लेकर बालेन शाह प्रशासन में खटपट, चीन के दबाव में झुके?

काठमांडू: रसुवा में आए ‘हिमालयी सुनामी’ और 1200 से ज्यादा लोगों की मौत के बाद नेपाल में मुआवजे की मांग पर बालेन शाह सरकार में मतभेद की रिपोर्ट्स हैं। नवभारत टाइम्स ऑनलाइन को मामले की जानकारी रखने वाले दो सूत्रों ने बताया है कि मुआवजे को लेकर वित्त मंत्री डॉ. स्वर्णिम वाग्ले और विदेश मंत्री शिशिर खनाल के बीच मतभेद हैं। नेपाल इस त्रासदी के लिए मुआवजा चाहता है और विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने पहले चीन, अमेरिका और भारत से मुआवजे की मांग की थी लेकिन अब विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने मीडिया में आकर मुआवजे की बात से इनकार कर दिया।

नेपाल सरकार ने मुआवजा मांगने का तरीका अब बदल लिया है। नेपाल सरकार ने अब यूनाइटेड नेशंस के ‘लॉस एंड डैमेज फंड’ से मुआवजे की मांग की है। सरकार का कहना है कि रसुवा में आई बाढ़ और उससे हुई तबाही की वजह जलवायु परिवर्तन और उससे पैदा हुआ संकट था। नेपाल के वित्त मंत्री डॉ. स्वर्णिम वाग्ले ने यूएन को एक चिट्ठी लिखी है जिसमें उन्होंने मुआवजे की मांग की है। जबकि शिशिर खनाल मुआवजे की मांग से पीछे हट गये हैं।

नवभारत टाइम्स ऑनलाइन को पहले ये भी पता चला था कि प्रधानमंत्री बालेन शाह यूनाइटेड नेशंस की सलाना बैठक के दौरान जलवायु परिवर्तन की वजह से नेपाल पर पड़ने वाले असर की बात उठाने वाले हैं। वो इस दौरान चीन, अमेरिका, यूरोप और भारत जैसे देशों की शिकायत यूएनजीए में करने वाले हैं और मुआवजे की मांग करने वाले हैं। हालांकि शुक्रवार को नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने मीडिया में आकर बयान दिया और उन्होंने मुआवजे की रिपोर्ट्स को खारिज कर दिया।

नेपाल अब यूएन के जरिए मांग रहा है मुआवजा

सूत्रों के मुताबिक वित्त मंत्री डॉ. स्वर्णिम वाग्ले मुआवजे को लेकर सख्ती दिखा रहे हैं जबकि ऐसा लग रहा है कि विदेश मंत्री शिशिर खनाल चीन की दबाव में आ गये हैं। शिशिर खनाल ने पहले स्थानीय मीडिया से बात करते हुए कहा था कि चीन, अमेरिका और भारत जैसे बड़े औद्योगिक उत्सर्जक देशों की ‘नेपाल जैसे कमजोर देशों को मुआवजा देने की ऐतिहासिक जिम्मेदारी’ है। इस बयान की मीडिया में काफी आलोचना हुई जिसके बाद खनाल ने 4 सितंबर को एक अलग बयान जारी किया।

नेपाल का अनुमान है कि रसुवा जिले और भोटे कोशी नदी के किनारे हाल ही में आए बर्फ और चट्टानों के एवलांच से हुई तबाही के बाद उसे फिर से बसने के लिए लगभग 4 से 5 अरब डॉलर की जरूरत होगी। इसीलिए नेपाल अप मदद नहीं मांग रहा है बल्कि वह ‘न्याय और मुआवजा’ मांग रहा है। इस मांग का असर ‘लॉस एंड डैमेज फंड’ (FRLD) तक भी पहुंचा है जिसे 20 नवंबर 2022 को मिस्र में COP27 के दौरान बनाया गया था। तब से 27 सहयोगी देशों ने इस फंड के लिए कुल 822.06 मिलियन डॉलर देने का वादा किया है जिसमें से अब तक सिर्फ एक-तिहाई रकम ही मिल पाई है।

मुआवजे की मांग पर क्या बंटा हुआ है बालेन शाह का प्रशासन?

एक सूत्र ने नवभारत टाइम्स ऑनलाइन को नेपाल सरकार के इरादे को साफ करते हुए बताया कि बात भारत चीन और अमेरिका जैसे कुछ देशों से मुआवजा मांगने की नहीं है। बल्कि नेपाल दुनिया को यह बताना चाहता है कि जो (जिसमें यूरोप भी शामिल है) सबसे ज्यादा कार्बन उत्सर्जन करने वाले देश हैं और उन्हें नेपाल के पुनर्निर्माण में मदद करनी चाहिए। यह दान के तौर पर नहीं बल्कि जिम्मेदारी के तौर पर होना चाहिए। सूत्र ने बताया कि इसका मकसद कुछ देशों से पैसे वसूलना नहीं है और ऐसा करने का कोई कानूनी आधार भी नहीं है।

सूत्र ने बताया कि इसे अलग अलग मीडिया रिपोर्ट में अलग अलग तरीके से पेश किया जा रहा है। भारतीय मीडिया चीन और अमेरिका का नाम ले रहा है जबकि अमेरिकी मीडिया ने भारत और चीन का जबकि चीनी मीडिया भारत और अमेरिका का। लेकिन असल में बात इससे अलग है। उन्होंने बताया कि यह उनसे गुजारिश करने जैसा है और बात को इस तरह रखना है कि उन्हें लगे कि यह उनका फर्ज और जिम्मेदारी है। न तो नेपाल को जुर्माना देना है और न ही नेपाल के लिए दान करना है बल्कि एक जिम्मेदार देश के तौर पर ऐसा करना है जो इस नुकसान का हिस्सा रहा है।

क्या चीनी दबाव से सामने शिशिर खनाल बैकफुट पर आए?

दूसरे सूत्र ने नवभारत टाइम्स ऑनलाइन को बताया है कि विदेश मंत्री शिशिर खनाल पहले चीन, अमेरिका और भारत से मुआवजे की बात कर रहे थे। लेकिन अब वो चीन के दबाव की वजह से इससे मुकर गये हैं। जबकि वित्त मंत्री डॉ. स्वर्णिम वाग्ले चीन के प्रेशर में आने वाले नहीं हैं। उन्होंने बताया है वित्त मंत्री मुआवजे को लेकर यूनाइटेड नेशंस को चिट्ठी लिखते हैं लेकिन कल शाम को विदेश मंत्री मुआवजे की बात से इनकार करते हैं तो निश्चित तौर पर इसका मतलब है कि वित्त मंत्री और विदेश मंत्री एक टेबल पर नहीं हैं।

नवभारत टाइम्स ऑनलाइन से बात करते हुए सार्क इंटरनेशनल जर्नलिस्ट फोरम के प्रेसिडेंट राजू लामा ने कहा कि ‘मुआवजे को लेकर बालेन शाह के मंत्रियों के बीच मतभेद वास्तव में है।’ उन्होंने कहा कि ‘मंत्रिमंडल में चीन और अमेरिका के बीच ये मतभेद साफ तौर पर दिख रहा है। चीन समर्थक जो गुट है वो मुआवजे की बात से पीछे हटना चाहता है जबकि अमेरिका समर्थक जो गुट है वो मुआवजे के पक्ष मे हैं।’ उन्होंने कहा कि वित्त मंत्री अमेरिका से पढ़े लिखे हैं और वो अमेरिका के करीबी हैं।

नेपाल क्या यूएन के रास्ते मुआवजा हासिल कर पाएगा?

नेपाल में त्रासदी के बाद FRLD बोर्ड के कुछ सदस्यों ने आपदा से जूझ रहे देश के लिए पैसे जुटाने के मकसद से एक खास बैठक बुलाने की मांग की है। फिर भी नेपाल को इतना मुआवजा मिलना काफी मुश्किल लग रहा है। FRLD के पूर्व को-चेयर और दक्षिण अफ्रीका के क्लाइमेट नेगोशिएटर रिचर्ड शर्मन ने ‘द प्रिंट’ को बताया ‘अगर बोर्ड सहमत भी हो जाता है तो भी यह एक सांकेतिक कदम ही होगा। हम शायद 20 मिलियन डॉलर अलग रख पाएं। यह 5 बिलियन डॉलर तो नहीं हो सकता लेकिन इससे पुनर्निर्माण के काम के लिए कुछ तत्काल राहत जरूर मिल सकती है।’

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