भोपाल, एलएनसीटी यूनिवर्सिटी, भोपाल में ‘रूमा समिट 2026’ का आयोजन किया गया। एलएनसीटी ऑडिटोरियम में हुए इस सम्मेलन में देशभर से आए विशेषज्ञों ने रूमेटोलॉजी से जुड़ी बीमारियों की पहचान और इलाज पर चर्चा की।
जोड़ों और मांसपेशियों की बीमारियों के इलाज पर चर्चा
रूमेटोलॉजी चिकित्सा की वह शाखा है, जिसमें जोड़ों और मांसपेशियों से जुड़ी बीमारियों के साथ-साथ शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता से जुड़ी कुछ बीमारियों का इलाज किया जाता है। समिट की थीम ‘प्रैक्टिकल रूमेटोलॉजी फॉर एवरीडे क्लिनिकल प्रैक्टिस’ थी। यानी रोजाना मरीजों के इलाज में रूमेटोलॉजी की जानकारी का बेहतर इस्तेमाल कैसे किया जाए, इस पर विशेषज्ञों ने अपने अनुभव साझा किए।
उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता एलएनसीटी ग्रुप के सचिव डॉ. अनुपम चौकसे, एलएनसीटी ग्रुप के डायरेक्टर श्री धर्मेंद्र गुप्ता, डीन डॉ. नलिनी मिश्रा, एलएनएमसी एवं जेके हॉस्पिटल के मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष डॉ. डी. पी. सिंह और आईआरए एमपी चैप्टर के अध्यक्ष डॉ. अपूर्व खरे ने की। इस दौरान प्रदेशभर से आए वरिष्ठ डॉक्टर और शिक्षाविद भी मौजूद रहे।
मरीजों के मामलों से समझाया इलाज
कार्यक्रम की शुरुआत ‘क्लिनिकल ग्रैंड राउंड्स’ से हुई। इसमें मरीजों के वास्तविक मामलों के आधार पर बीमारी की पहचान और इलाज से जुड़े जरूरी पहलुओं पर चर्चा की गई।
मास्टरक्लास में डॉक्टरों से इलाज के दौरान होने वाली सामान्य गलतियों, बच्चों में रूमेटिक बीमारियों की शुरुआती पहचान और शरीर की कई नसों व अंगों में सूजन पैदा करने वाली ‘सिस्टमिक वेस्कुलाइटिस’ जैसी बीमारियों के शुरुआती संकेतों पर चर्चा की गई।
इसके अलावा ‘सिस्टमिक ल्यूपस एरिथेमेटोसस’ यानी एसएलई पर भी बात हुई। यह ऐसी बीमारी है, जिसमें शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता गलती से अपने ही शरीर के अंगों और ऊतकों पर असर डालने लगती है।
स्टेरॉयड और खून की जांच से जुड़े भ्रम दूर किए
‘रूमेटोलॉजी मिथबस्टर्स’ सत्र में स्टेरॉयड के इस्तेमाल, शरीर में यूरिक एसिड बढ़ने, एएनए की जांच पॉजिटिव आने, ईएसआर जांच और रूमेटॉइड फैक्टर पॉजिटिव होने का क्या मतलब है, जैसे सवालों पर चर्चा की गई।
विशेषज्ञों ने इन जांचों और इलाज को लेकर आम तौर पर होने वाले भ्रमों पर भी बात की।
पुरानी दवाएं या नई दवाएं, किसे कब देना बेहतर?
दोपहर में हुए ‘ग्रेट डिबेट’ में रूमेटोलॉजी की बीमारियों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली पारंपरिक दवाओं और नई तरह की ‘बायोलॉजिक्स’ दवाओं को लेकर चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने इस बात पर विचार किया कि मरीज की स्थिति के अनुसार इलाज की रणनीति कैसे तय की जाए।
कई विभागों के डॉक्टर एक साथ जुड़े
‘क्रॉस-स्पेशलिटी क्लिनिकल कॉन्क्लेव’ में फेफड़ों, किडनी, हृदय, पाचन तंत्र और नसों से जुड़ी बीमारियों के विशेषज्ञ शामिल हुए। इसमें ऐसी बीमारियों पर चर्चा हुई, जिनका असर शरीर के एक से ज्यादा अंगों पर हो सकता है और जिनके इलाज के लिए अलग-अलग विशेषज्ञों के बीच तालमेल जरूरी होता है।
वैज्ञानिक कार्यक्रम में डॉ. सीमा बालन (एआईएमएस, कोच्चि), डॉ. योगेश प्रीत सिंह (एआईआईएमएस, बिलासपुर), डॉ. अविनाश जैन (एसएमएस, जयपुर) और डॉ. आर. सुब्रमणियन (जेएसएस मेडिकल कॉलेज एवं हॉस्पिटल, मैसूरु) समेत विशेषज्ञों ने विभिन्न सत्रों में भाग लिया।
कार्यक्रम का समापन ‘रूमा क्विज 2026’ और धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।