व्योमश चन्द्र जुगरान: उत्तराखंड के हिमालय क्षेत्र में वृक्ष रेखा और हिमरेखा के बीच की खूबसूरत भौगोलिक संरचनाएं ‘बुग्याल’ कहलाती है। 10 से 13 हजार फीट की ऊंचाई पर मीलों तक फैले हरी मखमली घास के ये मैदान आज कुदरत और इंसानी कारणों से संकट में हैं। संकट का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि टिहरी जिले के सबसे बड़े बुग्याल पंवालीकांठा में भू-क्षरण की गति पिछले दो साल में करीब डेढ़ गुना बढ़ गई है। यह जानकारी अध्ययन, पशुचारकों, वनकर्मियों और ग्रामीणों से बातचीत में सामने आई। बुग्याल में गड्ढे और गहरी दरारें तेज बारिश और कम जलधारण क्षमता के लक्षण हैं। इससे उपजाऊ मिट्टी, अनूठी बुग्गी घास, वनस्पति और दुर्लभ जड़ी-बूटियों का अस्तित्व खतरे में है।
13 हजार फीट पर 78 बुग्याल बुग्याल उच्च हिमालयी क्षेत्र में जैव विविधता और मृदा संरक्षण के कुदरती कवच हैं। निचले इलाकों में बहती जलधाराओं के प्रमुख स्रोत भी बुग्याल हैं। जाड़ों में बर्फ से ढके ये मैदान मई में बर्फ पिघलने पर घास, औषधियों और फूलों से निखर उठते हैं। पशुचारण, पर्यटन, ट्रैकिंग और धार्मिक-सांस्कृतिक यात्राओं के लिहाज से भी इनका खासा महत्व है। वन विभाग के अनुसार, उत्तराखंड के छह जिलों में 11 से 13 हजार फीट की ऊंचाई पर कुल 78 बुग्याल हैं। वेदनी, आली, दयारा और पंवालीकांठा प्रमुख हैं। ये अंतिम मोटर मार्ग से औसतन 18 से 25 किमी दूर हैं।
पारंपरिक ज्ञान का लाभ
वन विभाग के मुताबिक, अतिशय पर्यटन, कैंपिंग, पशुचारण और भारी खुरों वाले जानवर बुग्यालों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। अनुपयोगी पशुओं को यहां छोड़ने का चलन बढ़ रहा है। पंवालीकांठा में करीब 200 गाय-बैल और भैंस हैं। गूजर समुदाय भी दर्जनों भैंस और घोड़े खच्चरों के साथ यहां रहता है। जानवरों के खुर और घोड़े खच्चरों की लोहे की नाल बुग्याल को नुकसान पहुंचा रही है।
ग्रामीणों के अनुसार, भौरे, तितलियां और अन्य परागणकारी कीट लुप्त हो रहे हैं। फसलों, फलों और सब्जियों में परागण घटने से फफूंद लग रही है। ‘बुग्याल संरक्षण’ में बफर क्षेत्र की बस्तियों और उनकी चिंताओं को शामिल करना जरूरी है। समुदायों को प्रमुख हितधारक बनाकर उनके पारंपरिक ज्ञान का लाभ लिया जाए। कैंपिंग की बजाय सतत पर्यटन को बढ़ावा मिले। अनुपयोगी पशुओं के लिए अलग बाड़े बनें। धार्मिक-सांस्कृतिक मॉडल से दोहन सीमित हो और शोध संस्थानों की मदद से डेटाबेस तैयार किया जाए।