महात्मा गांधी के ग्राम-स्वराज और आत्मनिर्भर गांव की सोच को छत्तीसगढ़ में जमीन पर उतारने के लिए नवा रायपुर में सेवाग्राम बनाने की योजना शुरू हुई थी। इसके पीछे सोच थी कि यहां गांव की तस्वीर सिर्फ दिखाई नहीं जाएगी, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था, कारीगरों के हुनर और गांधीवादी विचारों से जुड़ी गतिविधियां भी चलेंगी।
नई पीढ़ी यहां आएगी, प्रशिक्षण होगा, स्थानीय हस्तशिल्प को बढ़ावा मिलेगा और सेवाग्राम एक जीवंत केंद्र के रूप में काम करेगा। लेकिन आज की तस्वीर इस सोच से बिल्कुल अलग है। नवा रायपुर का सेवाग्राम पूरी तरह खाली पड़ा है। परिसर में इमारतें तैयार हैं, लेकिन नियमित गतिविधियां नहीं हो रही हैं।
न कारीगरों की वर्कशॉप चल रही है, न प्रशिक्षण का माहौल है और न ही लोगों की वह मौजूदगी दिखाई देती है, जिसके लिए इतना बड़ा परिसर तैयार किया गया था।
गांधी जयंती यानी 2 अक्टूबर के दिन सेवाग्राम का यह खालीपन इसलिए भी बड़ा सवाल खड़ा करता है, क्योंकि जिस परियोजना को गांधी के विचारों को जमीन पर उतारने का केंद्र बनना था, वह अब भी शुरू होने का इंतजार कर रही है।
भूपेश सरकार में लिया गया था फैसला
नवा रायपुर में सेवाग्राम बनाने का फैसला 10 मार्च 2022 को तत्कालीन भूपेश बघेल सरकार ने लिया था। इसका मकसद महात्मा गांधी के स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े मूल्यों और विचारों को संरक्षित करना, आत्मनिर्भर गांव की अवधारणा को आगे बढ़ाना, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करना और कारीगरों को प्रशिक्षण देना था।
परियोजना को महाराष्ट्र के वर्धा स्थित सेवाग्राम की तर्ज पर विकसित करने की योजना थी। योजना काफी बड़ी थी। इसमें बायोडायवर्सिटी पार्क, इकोलॉजिकल पॉन्ड, विजिटर सेंटर, प्रेयर हॉल, म्यूजियम, एक्जीबिशन हॉल, लाइब्रेरी, स्थानीय हस्तशिल्प की दुकानें, एम्फीथिएटर, आवासीय क्षेत्र, कलाकारों और प्रशिक्षुओं के लिए आवास, कॉमन किचन, चिकित्सालय, क्लासरूम, वर्कशॉप और फ्रीडम वॉक जैसी सुविधाएं प्रस्तावित थीं।
यानी मकसद सिर्फ इमारतें खड़ी करना नहीं था। यहां ऐसी गतिविधियां शुरू करनी थीं, जिनसे गांव, कारीगर, स्थानीय हुनर और आत्मनिर्भरता की सोच सीधे जुड़ सके।
विधानसभा में उठा था सेवाग्राम का मुद्दा
सेवाग्राम के लिए 2022-23 से 2024-25 तक 129 करोड़ रुपए का बजट प्रावधान किया गया। इनमें से मल्टीपर्पज डाइनिंग हॉल, सामुदायिक किचन और प्रसाधन कक्ष पर 3.72 करोड़ और दूसरे निर्माण कार्यों पर 104.05 करोड़ रुपए खर्च हुए। यानी अब तक 107.77 करोड़ रुपए खर्च होने की जानकारी विधानसभा में दी गई।
जुलाई 2026 में विधायक अजय चंद्राकर ने सवाल उठाया कि इतनी बड़ी राशि खर्च होने के बाद सेवाग्राम का संचालन कैसे होगा और इसका इस्तेमाल कब शुरू होगा। उन्होंने योजना में ठोस प्लानिंग नहीं होने का मुद्दा भी उठाया।
जवाब में वित्त मंत्री ओपी चौधरी ने कहा कि निर्माण कार्य पूरे हो चुके हैं, लेकिन संचालन के लिए अलग प्रशासनिक सेटअप अब तक मंजूर नहीं हुआ है। उन्होंने कहा कि पुरानी फाइलों में भी संचालन की ठोस कार्ययोजना नहीं मिली। बिना प्लानिंग के पैसा खर्च होना लोकधन की बर्बादी है और सरकार आगे इसका संचालन सुनिश्चित करेगी।
इसी दौरान पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने योजना का बचाव करते हुए कहा कि सेवाग्राम वर्धा की तर्ज पर गांधीवादी गतिविधियों और आत्मनिर्भर गांव की सोच को आगे बढ़ाने के लिए बनाया गया है।
इस पर अजय चंद्राकर और बघेल के बीच तीखी बहस हुई। विधानसभा अध्यक्ष को हस्तक्षेप करना पड़ा। चंद्राकर की टिप्पणी पर आपत्ति के बाद उन्होंने अपने शब्दों पर खेद भी जताया।
सरकार बदली, लेकिन सेवाग्राम का सवाल नहीं बदला
सेवाग्राम की शुरुआत कांग्रेस सरकार के समय हुई थी। अब राज्य में भाजपा की सरकार है। विधानसभा में मौजूदा सरकार की ओर से यह कहा गया कि निर्माण का काम पूरा हो चुका है, लेकिन संचालन के लिए अलग व्यवस्था अभी मंजूर नहीं हुई है।
इसका मतलब साफ है कि सरकार बदलने के बाद भी परियोजना का सबसे जरूरी अगला चरण यानी इसे नियमित रूप से चलाना अभी पूरा नहीं हुआ है। यहां यह फर्क समझना जरूरी है कि किसी परियोजना का निर्माण पूरा होना और उसका शुरू होना दो अलग बातें हैं।
इमारत तैयार हो सकती है, लेकिन अगर वहां रोजाना गतिविधियां नहीं हैं, लोगों के आने-जाने की व्यवस्था नहीं है, प्रशिक्षण नहीं है, कारीगर नहीं हैं और संचालन की जिम्मेदारी तय नहीं है तो वह परिसर सिर्फ एक तैयार ढांचा बनकर रह जाता है।
गांधी जयंती पर सबसे बड़ा सवाल- सेवाग्राम कब बसेगा?
आज (2 अक्टूबर) गांधी जयंती है और इसी मौके पर नवा रायपुर के सेवाग्राम की तस्वीर सवाल खड़ा करती है। करोड़ों रुपए से तैयार यह परिसर आज पूरी तरह खाली है। न यहां नियमित गतिविधियां हैं, न कारीगरों का प्रशिक्षण और न गांधी के ग्राम-स्वराज की सोच को जमीन पर उतारने वाला कोई काम।
सरकार कह रही है कि आगे संचालन की व्यवस्था की जाएगी, लेकिन असली चुनौती अब इस परिसर को उसके उद्देश्य के मुताबिक आबाद और सक्रिय करना है।
छत्तीसगढ़ विधानसभा के मानसून सत्र के चौथे दिन की कार्यवाही जारी है। प्रश्नकाल में पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल फर्जी ग्रामसभाओं का मामला उठाया। कथित फर्जी ग्रामसभा प्रस्तावों के आधार पर उद्योगों की स्थापना के सवाल पर मंत्री ओपी चौधरी ने कहा कि पुलिस जांच कर रही है।