दूसरी तिमाही में धीमी पड़ी इकॉनमी की रफ्तार! सरकारी रिपोर्ट में जताया गया अनुमान

नई दिल्ली: देश की आर्थिक वृद्धि दर चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में 7.3 प्रतिशत रहने का अनुमान है। हालांकि, यह जून तिमाही में दर्ज 7.8 प्रतिशत की वृद्धि दर से कम होगी। वित्त मंत्रालय की एक रिपोर्ट में बृहस्पतिवार को यह अनुमान लगाया गया। सितंबर महीने की मासिक आर्थिक समीक्षा में कहा गया कि वैश्विक माहौल में बढ़ती अनिश्चितता के बावजूद वित्त वर्ष 2026-27 की शुरुआत मजबूत आधार पर हुई।

रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम एशिया संघर्ष ने ऊर्जा बाजार और व्यापार मार्ग को प्रभावित किया है, जिससे दुनियाभर की अर्थव्यवस्थाओं के सामने चुनौतियां बढ़ी हैं। भारत की वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि दर पहली तिमाही में 7.8 प्रतिशत रही थी, जो मौजूदा श्रृंखला में पहली तिमाही की सबसे अधिक वृद्धि है।

रफ्तार पड़ी धीमी

इसमें कहा गया, ‘इस साल की शुरुआत में आर्थिक समीक्षा में पेश किए गए हमारे तात्कालिक अनुमान के अनुसार, वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही (जुलाई-सितंबर) में वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर 7.3 प्रतिशत रहने की संभावना है।’

रिपोर्ट के मुताबिक, जून तिमाही की वृद्धि की गति 2026-27 की दूसरी तिमाही में भी जारी रही। हालांकि, इसकी रफ्तार कुछ धीमी हुई है। ई-वे बिल जारी होने और विनिर्माण क्षेत्र के खरीद प्रबंधक सूचकांक (पीएमआई) में वृद्धि की गति धीमी हुई, जबकि अगस्त में नई मांग और रोजगार में मजबूती से सेवा क्षेत्र की गतिविधियों में सुधार हुआ।

जीएसटी कलेक्शन

बिजली और ईंधन की खपत में लगातार वृद्धि दर्ज की जा रही है तथा बैंक ऋण में वृद्धि भी मजबूत बनी हुई है। पूंजीगत और बुनियादी ढांचा क्षेत्र के सामान के उत्पादन से निवेश गतिविधियों में मजबूती जारी रहने के संकेत मिलते हैं। ग्रामीण और शहरी दोनों बाजारों में वाहन बिक्री की गति अच्छी रही है, जो खपत के व्यापक आधार को दर्शाती है।

रिपोर्ट में कहा गया कि निर्यात आंकड़ा, जीएसटी संग्रह समेत उच्च आवृत्ति वाले ज्यादातर संकेतकों से दूसरी तिमाही की शुरुआत में आर्थिक गतिविधियों के जारी रहने का संकेत मिलता है। हाल में भारत की साख में सुधार भी अर्थव्यवस्था की मजबूत बुनियाद को बताता है। जापान क्रेडिट रेटिंग एजेंसी ने सितंबर, 2026 में भारत की रेटिंग को ‘बीबीबी प्लस’ से बढ़ाकर ‘ए माइनस’ कर दिया।

मॉनसून की स्थिति

रिपोर्ट में कहा गया कि मॉनसून की स्थिति पहले के अनुमान से बेहतर रही है। कई फसलों की खरीफ बुवाई पिछले साल के स्तर के करीब रही। इससे कृषि उत्पादन और ग्रामीण मांग की संभावनाओं को समर्थन मिलता है। हालांकि, रबी फसल की संभावनाओं पर नजर रखने की जरूरत होगी।

इसके बावजूद बाहरी जोखिम बने हुए हैं। नए सिरे से बढ़े वैश्विक तनाव और आपूर्ति श्रृंखलाओं के बढ़ते रणनीतिक इस्तेमाल से ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव, वैश्विक वित्तीय परिस्थितियों में सख्ती और व्यापार मार्गों में समस्या जारी है। इसलिए वृद्धि को बनाए रखने के लिए वृहद आर्थिक स्थिरता बनाए रखना और अर्थव्यवस्था की मजबूती बढ़ाना जरूरी होगा।
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