न चुनाव आयोग न ज्ञानेश कुमार; विपक्ष के लगातार आंदोलन के पीछे की ये है असली वजह

नई दिल्ली: दिल्ली में पिछले तीन दिनों से चल रहा प्रदर्शन पहली नजर में भले ही चुनाव आयोग और CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आंदोलन दिखता हो, लेकिन इसके पीछे विपक्ष की बड़ी राजनीतिक रणनीति भी आकार लेती दिख रही है। मकसद केवल मांगें रखना नहीं, बल्कि चुनाव आयोग और चुनावी प्रक्रिया को लेकर उठाए जा रहे सवालों को लगातार सार्वजनिक बहस में बनाए रखना है। पिछले कुछ समय में छात्र और युवा मुद्दों पर हुए आंदोलनों के बाद विपक्ष के सामने ऐसा मुद्दा आया है, जिसे लंबे समय तक राजनीतिक रूप से उठाया जा सकता है। जंतर-मंतर पर लेफ्ट के छात्र संगठनों और यूथ कांग्रेस का प्रदर्शन हो रहा है।

SIR पर साथ है विपक्ष

दूसरा पहलू I.N.D.I.A गठबंधन की राजनीति है। राज्यों में घटक दलों के बीच अलग-अलग राजनीतिक समीकरण होने के बावजूद चुनाव आयोग और SIR ऐसा साझा मुद्दा बन रहा है, जिस पर विपक्षी दल साथ आने की कोशिश कर रहे है। 30 सितंबर की बैठक में संयुक्त आंदोलन का फैसला हुआ और 6 अक्टूबर को विपक्षी सांसदों के ECI तक मार्च का कार्यक्रम बनाया गया। हालांकि सड़क पर आंदोलन अभी पूरी तरह एकजुट नहीं है। कांग्रेस, यूथ कांग्रेस और NSUI के अपने कार्यक्रम हैं. जबकि AISA और अन्य लेफ्ट छात्र संगठन भी अलग-अलग प्रदर्शन कर रहे हैं।

साझा राजनीतिक अभियान

6 अक्टूबर का मार्च विपक्ष के लिए अहम है। इसके जरिए जंतर-मंतर के अलग-अलग प्रदर्शनों को साझा राजनीतिक अभियान का रूप देने की कोशिश है। अक्टूबर में राज्यों में कार्यक्रमों और नवंबर में दिल्ली की बड़ी रैली के जरिए इस मुद्दे को आगे बढ़ाने की रणनीति है। अब देखना होगा कि यह आंदोलन कितना व्यापक राजनीतिक अभियान बन पाता है। विपक्ष के लिए इसका पहला लाभ यह है कि मुद्दा लगातार खबरों में बना हुआ है। एक प्रदर्शन के बाद दूसरा प्रदर्शन, फिर सांसदों का मार्च और बड़ी रैलियों का सिलसिला एक दिन के विरोध को अभियान में बदलने की कोशिश है।

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