इस्लामाबाद: पाकिस्तान इजरायल को मान्यता नहीं देता है और वर्षों से कई पाकिस्तानी एक्सपर्ट्स मानते आए हैं कि देश की ये नीति बदलनी चाहिए। इमरान खान जब प्रधानमंत्री थे उस वक्त पाकिस्तान, इजरायल को मान्यता देने के काफी करीब पहुंच गया था। लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। पाकिस्तान में इजरायल को मान्यता देने की बात करना ‘राजनीतिक तौर पर खुद को खत्म करना’ माना जाता है। इमरान खान इसीलिए ‘अब्राहम अकॉर्ड’ में शामिल होने से पीछे हट गये थे।
पाकिस्तानी जियो पॉलिटिकल एक्सपर्ट खुर्रम अली रजा ‘पाकिस्तान अब्राहमिक मूवमेंट’ के चेयरमैन हैं उन्होंने ‘जरूशलम पोस्ट’ में लिखे एक लेख में इस बात पर जोर दिया है कि पाकिस्तान को इजरायल को मान्यता देने की दिशा में कदम बढ़ानी चाहिए। उन्होंने लिखा है कि कुछ राजनीतिक प्रश्न इसलिए जटिल बने रहते हैं क्योंकि पीढ़ियां उन तर्कों को विरासत में पाती हैं जिन पर पुनर्विचार करने से पहले वे स्वयं ही प्रचलित होते हैं। पाकिस्तान और इजरायल के संबंध ऐसा ही एक प्रश्न है।
क्या कभी सुधरेंगे पाकिस्तान और इजराइल के रिश्ते?
उन्होंने लिखा है कि सितंबर महीने में इस्लामाबाद ने 1967 से पहले की सीमाओं पर आधारित दो-राज्य समाधान के लिए अपने समर्थन की पुष्टि की थी जिसमें पूर्वी यरुशलम को फ़िलिस्तीन के भावी राज्य की राजधानी बनाया जाना था। यह रुख रातोंरात नहीं बदलेगा। लेकिन एक और प्रश्न ध्यान देने योग्य है कि क्या पाकिस्तान फिलिस्तीनी अधिकारों का समर्थन कर सकता है जबकि वह मध्य पूर्व में इजरायल को एक स्थायी वास्तविकता के रूप में स्वीकार करता है और यह मानता है कि इजरायली नागरिकों की सुरक्षा संबंधी वैध चिंताएं हैं?
‘खत्म नहीं होने वाला है इजरायल का अस्तित्व’
खुर्रम अली रजा ने तर्क दिया है कि इजरायल कहीं जाने वाला नहीं है और उसका अस्तित्व भी खत्म होने वाला नहीं है। और इजरायलियों ने युद्ध, आतंकवाद, रॉकेट हमलों और बंधक बनाए जाने जैसी स्थितियों का सामना किया है जिससे उनमें गहरी असुरक्षा की भावना पैदा हुई है। इसीलिए पाकिस्तान एक साथ दो बातें मान सकता है। पहला- फिलिस्तीनी आजादी, सम्मान और अपने देश (स्टेटहुड) के हकदार हैं और दूसरा- इजरायली सुरक्षा और बिना किसी लगातार डर के जीने के हकदार हैं।
फिलिस्तीन को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता
उन्होंने लिखा है कि फिलिस्तीनियों के आत्म-निर्णय के अधिकार के लिए पाकिस्तान का समर्थन उसकी विदेश नीति और जनता की सोच का हिस्सा है। इस्लामाबाद ने बार-बार कहा है कि न्यायपूर्ण शांति के लिए एक स्वतंत्र और संप्रभु फिलिस्तीनी देश की जरूरत है। ऐसी कोई भी बात जिसमें ‘इजरायल को मान्यता दो और फिलिस्तीन को भूल जाओ’ का सुझाव हो पाकिस्तान में विश्वसनीय नहीं मानी जाती। फिर भी फिलिस्तीनियों का समर्थन करने का मतलब ऐसे राजनीतिक समाधान का समर्थन करना भी होना चाहिए जो लगातार संघर्ष से आगे का रास्ता दे। जैसे संविधान, सुरक्षा, शिक्षा, पुननिर्माण, स्वास्थ्य और नौकरी।
‘बातचीत करना और मान्यता देना एक ही बात नहीं’
खुर्रम अली रजा सलाह देते हैं कि इजरायल से बातचीत करना और मान्यता देना एक बात नहीं है। राजनयिक संपर्क का मतलब राजनीतिक तौर पर घुटने टेकना या गद्दारी करना नहीं है। देश उन सरकारों से भी बातचीत करते हैं जिनसे उनकी असहमति होती है जैसे युद्ध के दौरान, मध्यस्थों के जरिए या बैक-चैनल से। पाकिस्तान औपचारिक मान्यता दिए बिना भी नियंत्रित बातचीत का रास्ता अपना सकता है।