नेहरू और इंदिरा के कार्यकाल से तुलना क्यों न हो, नरेंद्र मोदी ने राजनीति को दी नई भाषा

लेखक: स्वपन दासगुप्ता

राजनीतिक सत्ता में लंबे समय तक बने रहना और उस दौरान कोई सार्थक प्रभाव छोड़ना, ये दोनों बातें जरूरी नहीं कि एक-दूसरे से जुड़ी हों। मुहम्मद शाह ‘रंगीला’ 1719 से 1748 तक नाममात्र के मुगल सम्राट रहे, यानी करीब 29 साल उनके बाद आने वाले शासकों में से एक, बदकिस्मत और अक्सर मजाक का पात्र बनाए गए शाह आलम द्वितीय भी 1760 से 1806 तक यानी 46 साल तक तैमूरी साम्राज्य की गद्दी पर रहे। दोनों ही मामलों में ऐसी सत्ता पर लंबे समय तक बैठे रहना, जिस पर कभी अकबर और औरंगजेब जैसे शक्तिशाली शासक बैठे थे, केवल प्रतीकात्मक रह गया था। इतिहास के पतन का अध्ययन करने वाले कुछ गिने- चुने लोगों को छोड़ दें तो इन बाद के मुगल शासकों का प्रभाव लगभग वैसा ही था, जैसे कोई व्यक्ति बर्फ पर चले, लेकिन पीछे अपने पैरों के निशान न छोड़े।

भविष्य के इतिहासकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस तरह नजरअंदाज करेंगे, ऐसा संभव नहीं लगता। बेहद प्रतिस्पर्धी लोकतंत्र में लगातार जनता का समर्थन हासिल करते रहना हमेशा चुनौतीपूर्ण होता है। मोदी के लंबे कार्यकाल की तुलना जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी से करने का आकर्षण स्वाभाविक है। खासकर वे नेता और बुद्धिजीवी, जो राजनीतिक पक्ष के साथ अपनी राय रखते हैं, इस तुलना से बच नहीं पाएंगे। लेकिन, जैसे इतिहास की तुलना अपने आप में आकर्षक होती है, वैसे ही अगर ऐसा होता तो क्या होता’ वाली कल्पनाओं का भी अपना महत्व है फिर भी मोदी की विरासत को समझने के लिए उनकी अपनी अलग पहचान और परिस्थितियों के संदर्भ में देखा जाए।

आशंकाएं दूर हुई

2014 में प्रधानमंत्री पद संभालने के दिन से ही मोदी ने भारत की कहानी को नए तरीके से गढ़ा है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली दो लगातार कमजोर गठबंधन सरकारों के बाद मोदी को जो भारत मिला, वह अलग स्थिति वाला देश था मनमोहन सिंह एक ईमानदार और सीधे-सादे व्यक्ति थे, पर दुर्भाग्य से सरकार के फैसलों पर उनका पूरा नियंत्रण नहीं था। 2004 से 2014 की अवधि को इस बात से समझा जा सकता है कि भारतीय दुनिया में अच्छा प्रदर्शन कर रहे थे, पर भारत देश के रूप में उतनी तेजी से आगे नहीं बढ़ पा रहा था। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में 13 वर्षों तक मोदी ने जिस तरह राज्य को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया था, उससे प्रधानमंत्री के रूप में उनसे बड़ी उम्मीदें होना स्वाभाविक था। लेकिन, इन उम्मीदों के साथ एक डर भी जुड़ा हुआ था। दुनिया के निवेशकों को डर था कि भारत वैश्वीकरण की दिशा से पीछे हट जाएगा।

2014 में युवाओं की एक बड़ी लहर ने नरेंद्र मोदी को चुनावी राजनीति की पुरानी सीमाओं को निर्णायक रूप से तोड़ने में मदद की। लेकिन, सवाल था कि वह युवाओं की व्यापक और महत्वाकांक्षी सोच को भारत के उस बड़े मध्यम वर्ग और आम समाज के साथ कैसे संतुलित करेंगे, जो बदलाव को लेकर कुछ हद तक सावधान और पारंपरिक सोच रखता था? मोदी की सफलता इस बात में रही कि उन्होंने राजनीति की भाषा और सोच, दोनों को नए तरीके से गढ़ा। उनके नेतृत्व में भारतीयों ने अपनी सांस्कृतिक पहचान पर गर्व करने के साथ-साथ नई तकनीक को अपनाया और कारोबार की भावना को भी आगे बढ़ाया।

विरोधाभासों के बीच संतुलन

मोदी ने राजनीति में मौजूद कई पुराने विरोधाभासों को खत्म किया। उन्होंने आर्थिक सुधारों और गरीबों के कल्याण के बीच की दूरी कम की । इससे ‘अंत्योदय’ और ‘डिजिटल इंडिया’ जैसे विचार एक ही बड़े लक्ष्य के लिए साथ-साथ आगे बढ़ सके। प्रत्यक्ष लाभ अंतरण, उज्ज्वला, आयुष्मान भारत, आधार जैसी योजनाओं के पीछे बनाई गई विस्तृत और तकनीक आधारित व्यवस्था, जो आगे चलकर AI का भी इस्तेमाल करने लगी, कल्याणकारी व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी। लेकिन, पिछली सरकारों की मुफ्त सुविधाएं बांटने वाली राजनीति से ये योजनाएं अलग थीं। इनका लाभ वास्तविक जरूरतमंद लोगों तक पहुंचाने पर जोर था । सरकार के कामकाज में दक्षता महत्त्वपूर्ण रही। सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के काम करने के तरीके में भी बदलाव आया है।

आज इन कंपनियों के शेयर निवेशकों के पोर्टफोलियो का महत्त्वपूर्ण हिस्सा हैं। दिखने वाले विरोधाभासों के बीच संतुलन बनाना और साथ ही राष्ट्रीय हित पर लगातार ध्यान केंद्रित रखना, मोदी के नेतृत्व में भारत की विदेश नीति की प्रमुख विशेषता रही है। भारत ने इस्राइल और ईरान दोनों के साथ अच्छे संबंध बनाए रखे हैं। अरब दुनिया के बाकी देशों के साथ भी दोस्ती है। इसी तरह भारत ने रूस के साथ भी अपने पुराने और मजबूत संबंध बनाए रखे, लेकिन इसके कारण यूरोपीय संघ या अमेरिका के साथ उसके रिश्ते खराब नहीं हुए। इस स्वतंत्र विदेश नीति के कारण राष्ट्रपति ट्रंप जैसे नेताओं की ओर से भारत को आलोचना और कुछ जवाबी कदमों का सामना भी करना पड़ा। लेकिन, इस रणनीतिक स्वतंत्रता ने पश्चिम एशिया संकट में भी भारत के ऊर्जा क्षेत्र को बड़े झटकों और अनिश्चितताओं से बचाने में मदद की है।
विरोधाभासों को संभालकर साथ लेकर चलना भारतीय सामाजिक व्यवस्था की हमेशा से एक विशेषता रही है। शायद यही वजह है कि जो लोग हर चीज को निश्चित और स्पष्ट खांचों में देखने के आदी हैं, उनके लिए हिंदू परंपरा और उसकी सोच को पूरी तरह समझना मुश्किल होता है। मोदी ने सार्वजनिक नीतियों और विदेश नीति में इसी सोच को और व्यापक स्तर तक पहुंचाने की कोशिश की है। इसका असर यह हुआ कि राजनीति में पहले जिस तरह विचारधारा के आधार पर ध्रुवीकरण पर जोर दिया जाता था, उसका महत्व कम हुआ है।
BJP के एक ऐसे नेता के लिए यह बात कुछ अलग जरूर लग सकती है, जिसकी पार्टी को कभी उसकी अलग और स्पष्ट विचारधारा के कारण राजनीतिक रूप से अलग-थलग माना जाता था। लेकिन, मोदी ने अपने तरीके से, बिना किसी बड़े दिखावे के राजनीति में विचारधारा की उस विशिष्ट पहचान को कमजोर किया है। उन्होंने राजनीति से ऊपर उठकर भारत की राजनीति को एक नए तरीके से परिभाषित किया है।
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