आजकल जिसे देखो, हाथ में स्मार्टवॉच बांधे घूम रहा है. पहले तो लोग सिर्फ कदम नापने या कॉल देखने के लिए इसे पहनते थे, पर अब बात दिल की धड़कन से आगे निकलकर सीधे ब्लड प्रेशर तक जा पहुंची है. दफ्तर में बैठे-बैठे अचानक स्क्रीन पर 150/95 दिखा नहीं कि इंसान पसीने-पसीने होकर यह सोचने लगता है कि कहीं आज ही हार्ट अटैक तो नहीं आ जाएगा.
लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि जिस कलाई पर आप घड़ी बांधते हैं, क्या वह वाकई आपके दिल का सही हाल बता सकती है? क्या बांह पर पट्टा लपेटने वाली उस भारी-भरकम मशीन की जगह अब यह पतली सी स्क्रीन ले सकती है? लेकिन दिल के डॉक्टरों की मानें तो स्मार्टवॉच पर दिखने वाली BP रीडिंग को मेडिकल जांच का विकल्प मान लेना सही नहीं है.
कलाई की रीडिंग पर आंख मूंदकर भरोसा करना क्यों जोखिम भरा है?
सर्वोदय हॉस्पिटल, मथुरा के सीनियर कंसल्टेंट और कार्डियोलॉजी हेड डॉ. अमित कुमार गुप्ता के पास हाल ही में ऐसे कई मरीज पहुंचे जो सिर्फ घड़ी की रीडिंग देखकर अपनी बीपी की गोलियां खुद ही घटा-बढ़ा चुके थे. उनका कहना है कि स्मार्टवॉच लोगों को अपनी सेहत पर नजर रखने के लिए प्रेरित तो करती है, पर जब बात सीधे ब्लड प्रेशर की हो, तो यह कोई अस्पताल वाली जांच नहीं है.
अस्पताल वाली मशीन बांह की नस को बाकायदा दबाकर खून का असली प्रेशर नापती है. वहीं ज्यादातर घड़ियों के पीछे लगी छोटी हरी लाइट सिर्फ त्वचा के नीचे खून के बहाव का एक मोटा-मोटा अंदाज लगाती है.
अब सोचिए, अगर आपकी घड़ी कलाई पर जरा सी भी ढीली रह गई, रीडिंग लेते वक्त आपकी उंगली हल्की सी भी हिल गई, या सर्दियों में हाथ ठंडा पड़ गया तो घड़ी का सेंसर पूरी तरह चकरा जाता है. यही वजह है कि स्क्रीन पर दिखने वाला नंबर केवल एक रफ आइडिया भर होता है, उसे मेडिकल रिपोर्ट समझ लेना अपनी सेहत के साथ खिलवाड़ करने जैसा है.
ShardaCare – Healthcity के डायरेक्टर और कार्डियोलॉजी हेड डॉ. विवेक टंडन का कहना है कि जब तक तकनीक बिल्कुल सटीक न हो, तब तक किसी नतीजे पर पहुंचना खतरनाक है.
डॉक्टर जिस कफ मॉनिटर का इस्तेमाल करते हैं, वह बांह की उस बड़ी नस (ब्रेकियल आर्टरी) पर काम करता है जो सीधे दिल से जुड़ी होती है. इसलिए वहां से मिलने वाली रीडिंग को मेडिकल की दुनिया में सबसे भरोसेमंद माना गया है.
इसके उलट, कलाई की नसें बहुत पतली होती हैं और दिल से उनकी ऊंचाई भी बार-बार बदलती रहती है. कलाई की स्थिति और उसका दिल के मुकाबले किस ऊंचाई पर होना जैसी बातें रीडिंग को प्रभावित कर सकती हैं. बाजार में कुछ ऐसी घड़ियां जरूर आ रही हैं जिनमें हवा भरने वाले छोटे कफ लगे होते हैं, पर वे भी अभी तक क्लीनिक वाली मशीनों की बराबरी नहीं कर पाई हैं.
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स्क्रीन पर बीपी बिगड़ा दिखे तो घबराने के बजाय क्या करें?
मान लीजिए आपने काम करते-करते घड़ी देखी और उस पर बीपी बहुत ज्यादा या कम नजर आया. सबसे पहले गहरी सांस लीजिए और घबराइए बिल्कुल मत, क्योंकि घबराहट से बीपी अपने आप बढ़ जाता है.
- चुपचाप कुर्सी पर पीठ टिकाकर 5 मिनट बिल्कुल शांत बैठ जाएं.
- पैर जमीन पर सीधे रखें और किसी से बात न करें.
- अब घर में रखी बांह वाली प्रमाणित डिजिटल या मैनुअल मशीन से बीपी नापें.
- ध्यान रहे कि नापते वक्त आपकी बांह मेज पर टिकी हो, ताकि वह आपके सीने की सीध में रहे.
- अगर रीडिंग फिर भी गड़बड़ आती है, तो 10 मिनट रुककर एक बार दोबारा चेक करें.
घड़ी देखकर कभी न बदलें अपनी दवा
सबसे खतरनाक गलती लोग तब करते हैं जब वे घड़ी पर बीपी कम देखकर डॉक्टर की लिखी बीपी की गोली खुद ही बंद कर देते हैं या फिर बढ़ा हुआ देखकर डबल डोज खा लेते हैं.
कार्डियोलॉजिस्ट्स की सलाह है कि स्मार्टवॉच की एक रीडिंग देखकर बीपी की दवा न तो बंद करें, न उसकी खुराक खुद से बढ़ाएं या घटाएं. अगर पारंपरिक मशीन और घड़ी दोनों पर लगातार कई दिनों तक बीपी असामान्य बना रहता है, तो अपने मन से डॉक्टर बनने के बजाय सीधे अस्पताल जाएं और अपनी डायरी में नोट की गई रीडिंग फिजिशियन को दिखाएं.
स्मार्टवॉच आपकी दिनचर्या सुधारने, आपको रोज 8 हजार कदम चलाने और समय पर पानी की याद दिलाने के लिए एक शानदार गैजेट है. इसे एक फिटनेस साथी की तरह इस्तेमाल कीजिए, अपनी मेडिकल फाइल या डॉक्टर की जगह इसे कभी मत दीजिए.
एक्सपर्ट्स के बारे में :
डॉ. अमित कुमार गुप्ता सर्वोदय हॉस्पिटल, मथुरा में सीनियर कंसल्टेंट एवं हेड, कार्डियोलॉजी हैं. वह हृदय रोगों से जुड़ी समस्याओं के विशेषज्ञ हैं.
डॉ. विवेक टंडन ShardaCare – Healthcity में डायरेक्टर एवं हेड, कार्डियोलॉजी हैं. वह हृदय रोगों से जुड़ी समस्याओं के विशेषज्ञ हैं.