‘US की 3 शर्तों को भारत ने नकारा’, चीनी ग्लोबल टाइम्स ने मार्को रुबियो के दौरे से पहले की तारीफ

बीजिंग: अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो के मुंबई और जामनगर दौरे से ठीक पहले चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स ने भारत को ‘सलाह’ देने वाला एक संपादकीय लिखा है। इसमें कहा गया है ‘वाशिंगटन भारत के साथ एक पुराना खेल खेल रहा है’।

ग्लोबल टाइम्स ने अपने संपादकीय में लिखा है ‘अमेरिका-भारत संबंधों ने एक बार फिर दिखा दिया है कि कैसे एक बड़ी ताकत अपने प्रभाव का इस्तेमाल करती है। वाशिंगटन एक पुराना खेल खेल रहा है- पहले रणनीतिक वादों के जाल में फंसाकर आपको बंधक बनाना और फिर आर्थिक दबाव डालकर आपको दबाना।’

भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर चीनी मीडिया का तंज

इसने लिखा है कि मार्को रुबियो इस साल दूसरी बार भारत का दौरा कर रहे हैं। वाशिंगटन ‘रणनीतिक साझेदारी’ पर बात करना चाहता है जबकि नई दिल्ली टैरिफ के मुद्दे पर चर्चाकरना चाहती है। दोनों पक्षों के एजेंडे पूरी तरह से अलग-अलग हैं। इसने लिखा है कि नौ महीने बीत चुके हैं और फरवरी में हुआ अमेरिका-भारत व्यापार ढांचा समझौता (ट्रेड फ्रेमवर्क एग्रीमेंट) अभी तक हस्ताक्षरित नहीं हुआ है।

इसने लिखा है कि ‘इंडो-पैसिफिक रणनीति’ साझा मूल्यों और ‘क्वाड’ का जिक्र करते हुए वाशिंगटन भारत को एशिया-पैसिफिक क्षेत्र में अपना सबसे भरोसेमंद साझेदार बताता है। लेकिन जब व्यापार की असलियत की बात आती है तो उनका रुख बदल जाता है। भारतीय स्टील पर भारी शुल्क, भारतीय फार्मास्यूटिकल (दवा) उद्योग पर लगातार दबाव और भारतीय आईटी सेवाओं के लिए रुकावटें। वहीं दूसरी तरफ इसी दौरान जापान, दक्षिण कोरिया और ऑस्ट्रेलिया के साथ अमेरिका ज्यादा बेहतर सलूक कर रहा है।

‘जरूरत के आधार पर इस्तेमाल करने की है अमेरिका की नीति’

ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है कि वाशिंगटन अपने रणनीतिक साझेदारों को उनकी उपयोगिता के आधार पर प्राथमिकता देता है। जब उसेइंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भारत का साथचाहिए होता है तो वह उसे ‘साझेदार’ कहता है लेकिन जब उसे अपने उद्योगों को बचाना होता है तो वह बेझिझक टैरिफ का हथियार इस्तेमाल कर लेता है। जापान और दक्षिण कोरिया उसके सैन्य सहयोगी हैं। ऑस्ट्रेलिया ‘फाइव आइज’ का हिस्सा है जबकि वाशिंगटन की नजर में भारत बस एक ऐसा ‘मोहरा’ है जिसकी अहमियत को कभी भी बदला जा सकता है।

‘अमेरिका की शर्तों को स्वीकार नहीं कर रहा भारत’

ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है कि अमेरिका भारत से तीन चीजें चाहता है। 1- रूसी तेल खरीदना बंद हो, 2- भारत अपना कृषि क्षेत्र खोले और 3- अमेरिका से ऊर्जा आयात बढ़ाए। लेकिन भारत ने अमेरिका द्वारा तय की गई इन शर्तों को पूरी तरह से स्वीकार नहीं किया है।

इसने आगे लिखा है कि भारत के लिए अमेरिका का ‘रणनीतिक साझेदार’कहलाने का महत्व अब कम होता जा रहा है। इसके अलावा टैरिफ नीतियों के कानूनी विवादों में उलझे होने के कारण भारत कोई भी पक्का वादा करने से हिचकिचा रहा है कि क्या पता अगले साल फिर से नीति बदल जाए? 2026 में भारत का निर्यात काफी तेजी से बढ़ा है। अगर अमेरिकी टैरिफ वापस 25 प्रतिशत तक बढ़ जाते हैं तो यह विकास की गति पूरी तरह खत्म हो जाएगी। भारत ऐसी शर्तें मानने के बजाय जिनसे उसके दीर्घकालिक हितों को नुकसान पहुंचे किसी भी समझौते पर हस्ताक्षर न करना ही बेहतर समझेगा।

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