चीन ने लगा दिया अड़ंगा, रुक गया रिलायंस का बड़ा प्रोजेक्ट, मुकेश अंबानी ने किया है बड़ा निवेश

नई दिल्ली: देश की सबसे वैल्यूएबल कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज ने भारत में लिथियम-आयन बैटरी सेल बनाने की अपनी योजना फिलहाल रोक दी है। ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट में यह दावा किया गया है। इसकी वजह यह है कि उसे चीन से ज़रूरी तकनीक नहीं मिल पाई। सूत्रों के मुताबिक रिलायंस इस साल से बैटरी सेल बनाने की शुरुआत करना चाहती थी। इसके लिए वह चीन की कंपनी Xiamen Hithium Energy Storage Technology Co. से सेल बनाने की तकनीक लाइसेंस पर लेने की बात कर रहे थी। लेकिन, ये बातचीत रुक गई। चीन की कंपनी ने इस साझेदारी से हाथ खींच लिया।

सूत्रों ने बताया कि रिलायंस ने बैटरी एनर्जी स्टोरेज कंटेनर असेंबली और सेल प्रोडक्शन दोनों के लिए कुछ मशीनरी आयात की है। लेकिन चीनी तकनीक तक पहुंच न होने के कारण सेल बनाने का काम रुका हुआ है। चीन ने कुछ खास सेक्टरों में अपनी तकनीक को बाहर जाने से रोकने के लिए नए नियम बनाए हैं। इस झटके के बाद रिलायंस अब बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) बनाने पर ध्यान दे रही है, जिनमें उसकी रिन्यूएबल पावर परियोजनाओं के लिए बिजली स्टोर की जा सके। चीन अब क्लीन एनर्जी से जुड़ी टेक्नोलॉजी के सौदों पर ज्यादा ध्यान दे रहा है। वह अपनी रणनीतिक बढ़त को बनाए रखना चाहता हैं। इससे विदेशी कंपनियों के लिए भारत में लोकल मैन्युफैक्चरिंग करना मुश्किल हो रहा है।

कंपनी ने क्या कहा

रिलायंस के एक प्रवक्ता ने ईमेल के जरिए बताया कि कंपनी की योजनाओं में कोई बदलाव नहीं आया है। उन्होंने कहा, ‘आप देखेंगे कि BESS मैन्युफैक्चरिंग, बैटरी पैक मैन्युफैक्चरिंग और सेल मैन्युफैक्चरिंग हमेशा से हमारी एनर्जी स्टोरेज योजनाओं का हिस्सा रहे हैं और हम इन्हें लागू करने में अच्छी प्रगति कर रहे हैं।’
उन्होंने चीनी कंपनी के साथ अपने रिश्ते के बारे में पूछे गए सवालों का जवाब नहीं दिया। चीनी कंपनी ने भी टिप्पणी के अनुरोध पर कोई जवाब नहीं दिया।भारत और एशिया के सबसे बड़े रईस मुकेश अंबानी ने पिछले अगस्त में शेयरधारकों को बताया था कि रिलायंस की बैटरी बनाने की गीगाफैक्ट्री 2026 में शुरू हो जाएगी। रिलायंस ने साल 2021 में चार गीगाफैक्ट्री बनाने की घोषणा की थी। यह ग्रीन एनर्जी बिजनेस पर 10 अरब डॉलर के निवेश का हिस्सा था। सूत्रों का कहना है कि रिलायंस की अंदरूनी टीमों ने यह निष्कर्ष निकाला है कि अगर चीन की भरोसेमंद सेल तकनीक नहीं मिली, तो लागत बहुत बढ़ जाएगी और काम पूरा करने में भी ज्यादा जोखिम होगा।

दूसरे विकल्प

सूत्रों ने यह भी बताया कि जापान, यूरोप और दक्षिण कोरिया की वैकल्पिक तकनीकों का भी मूल्यांकन किया गया था, लेकिन उन्हें बड़े पैमाने पर भारत में इस्तेमाल के लिए बहुत महंगा और कम प्रतिस्पर्धी पाया गया। भारत लंबे समय से अपनी खुद की बैटरी बनाने की क्षमता विकसित करना चाहता है। 2022 में रिलायंस की रिन्यूएबल एनर्जी यूनिट, रिलायंस न्यू एनर्जी उन तीन कंपनियों में से एक थी जिसने भारत सरकार के प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव प्रोग्राम के तहत बैटरी सेल प्लांट बनाने की बोली जीती थी। यह इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए आयातित सेल पर निर्भरता कम करने की सरकार की कोशिश का हिस्सा था।

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