नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने विमानन नियामक डीजीसीए से जवाब मांगा है। यह जवाब फेडरेशन ऑफ इंडियन पायलट्स (एफआईपी) और इंडियन पायलट्स गिल्ड की एक अवमानना याचिका पर मांगा गया है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि डीजीसीए ने एयरलाइंस को कुछ छूट दी है। ऐसी थकान स्कीमें मंजूर की हैं जो सिविल एविएशन रिक्वायरमेंट (सीएआर) 2024 के नियमों के मुताबिक नहीं हैं। जस्टिस अमित शर्मा ने डीजीसीए को नोटिस जारी किया है। मामले की अगली सुनवाई अप्रैल 2026 में तय की है।
यह मामला पायलटों की थकान को कम करने और हवाई सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उड़ान और ड्यूटी समय की सीमा (फ्लाइट एंड ड्यूटी टाइम लिमिटेशन – एफडीटीएल) के नियमों को लागू करने से जुड़ा है। मामला काफी समय से दिल्ली हाईकोर्ट में चल रहा है। इसकी शुरुआत 2012 में एक याचिका से हुई थी। इसमें भारत के थकान प्रबंधन ढांचे को वैश्विक सुरक्षा मानकों के अनुरूप बनाने की मांग की गई थी।
FIP ने दाखिल की थी अवमानना याचिका
नवंबर 2025 में एफआईपी ने यह अवमानना याचिका दायर की। इसमें आरोप लगाया गया कि डीजीसीए ने जानबूझकर कोर्ट के निर्देशों का पालन नहीं किया है। संघ का तर्क था कि कोर्ट के सामने दिए गए आश्वासनों के उलट डीजीसीए ने एयरलाइंस को छूट दी है या उनके नियमों में ढील दी है। ऐसी थकान योजनाएं मंजूर की हैं जो सीएआर 2024 के ढांचे और तय की गई समय-सीमा के अनुरूप नहीं हैं।
यह अवमानना याचिका पहली बार 18 नवंबर को जस्टिस अमित शर्मा के सामने आई थी। अतिरिक्त दस्तावेज दाखिल करने के लिए इसे 15 दिसंबर तक के लिए स्थगित कर दिया गया था।
मुख्य मुद्दा यह है कि क्या DGCA के कार्यों को जानबूझकर न्यायिक रूप से दर्ज की गई प्रतिबद्धताओं से डीविएशन माना जाए या वैधानिक विवेक का एक स्वीकार्य प्रयोग माना जाए।
पायलट यूनियनों का क्या है तर्क?
पायलट यूनियनों के वकील ने तर्क दिया कि कोर्ट की देखरेख में डीजीसीए, एयरलाइंस और पायलट संघों के बीच कई बैठकें हुई थीं। सीएआर की सामग्री के साथ इसके चरणबद्ध कार्यान्वयन पर एक व्यापक सहमति बनी थी। एफआईपी के अनुसार, एयरलाइंस ने पायलटों की कमी, सॉफ्टवेयर में बदलाव और उड़ान रद्द होने के जोखिम जैसी परिचालन संबंधी चिंताएं उठाई थीं। लेकिन, इन मुद्दों पर विचार-विमर्श किया गया और उन्हें कोर्ट के सामने पेश की गई चरणबद्ध रोलआउट योजना में शामिल किया गया था।
अवमानना याचिका में उठाई गई शिकायत यह है कि हलफनामे और समय-सीमा को कोर्ट की स्वीकृति मिलने के बाद डीजीसीए ने कथित तौर पर एयरलाइंस को पायलट निकायों को सूचित किए बिना और कोर्ट की अनुमति मांगे बिना व्यक्तिगत संचार के जरिये सीएआर प्रावधानों को चुनिंदा रूप से निलंबित या बदलने की अनुमति दी।
डीजीसीए ने क्या दी दलील?
डीजीसीए की ओर से पेश हुए वकील ने अवमानना याचिका का विरोध किया। तर्क दिया कि कोर्ट के सामने पेश किए गए सीएआर की सामग्री को फ्रीज करने का कोई विशिष्ट न्यायिक निर्देश नहीं था। यह तर्क दिया गया कि नियामक कार्यान्वयन समय-सीमाओं से बंधा हुआ था। लेकिन, उसे उपयुक्त मामलों में अस्थायी बदलाव या छूट देने के लिए एयरक्राफ्ट एक्ट, 1934 और एयरक्राफ्ट रूल्स के तहत वैधानिक शक्तियां प्राप्त थीं।
डीजीसीए ने आगे कहा कि दी गई छूटें अस्थायी, एयरलाइन-विशिष्ट थीं और आवधिक समीक्षा के अधीन थीं, और सीएआर अपने आप लागू रहा। यह भी बताया गया कि एयरलाइंस को दी गई छूटों का मुद्दा पहले से ही हाईकोर्ट की एक डिवीजन बेंच के सामने अलग कार्यवाही का विषय था।दोनों पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि हलफनामे के बाद दिए गए बदलावों को अवमानना माना जाएगा या नहीं, इसकी जांच की जानी चाहिए। कोर्ट ने उसी के अनुसार डीजीसीए को नोटिस जारी किया। अवमानना याचिका पर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया।