नई दिल्ली: भारत दोराहे पर खड़ा है। इसके केंद्र में रूसी तेल है। अमेरिका चाहता है कि भारत रूस से तेल खरीदना पूरी तरह बंद कर दे। उसने प्रतिबंधों और बंदिशों के जरिये रूसी तेल पर गिरफ्त कसी है। इसका असर भारत की रूसी तेल खरीद पर भी पड़ा है। न चाहते हुए भी उसकी मॉस्को से तेल खरीदारी कम हो गई है। इस कश्मकश में एक सबसे बड़ा सवाल है। अगर भारत ने रूसी तेल खरीदना बंद किया तो उसका रूस पर कितना असर पड़ेगा। न्यूज एजेंसी रायटर्स ने विश्लेषकों और व्यापारियों के हवाले से इस बारे में बताया है। उनके मुताबिक, अगर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत को रूसी कच्चे तेल की खरीद कम करने या रोकने के लिए मजबूर करने में सफल हो जाते हैं तो रूस को तेल से होने वाली कमाई में भारी गिरावट का सामना करना पड़ सकता है। इससे मॉस्को को दूसरे खरीदारों को आकर्षित करने के लिए कीमतें कम करनी पड़ सकती हैं।
इस तरह के सवाल उठने के कारण हैं। ट्रंप ने कहा है कि अमेरिका-भारत व्यापार समझौते में भारत की ओर से रूसी तेल आयात रोकने से जुड़े प्रावधान शामिल हैं। वहीं, वाशिंगटन यूक्रेन शांति वार्ता के बीच मॉस्को पर दबाव बढ़ा रहा है। यह और बात है कि भारत ने गुरुवार को साफ किया कि अपने 1.4 अरब लोगों के लिए ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना उसकी शीर्ष प्राथमिकता है। पेट्रोलियम उत्पादों की खरीद को लेकर उसका नजरिया मुख्य रूप से इसी बात पर आधारित है।
क्या कहता है कैलकुलेशन?
रॉयटर्स के कैलकुलेशन के अनुसार, दिसंबर में भारत का रूसी तेल आयात नवंबर की तुलना में 22% घटकर 13.8 लाख बैरल प्रति दिन हो गया। यह जनवरी 2023 के बाद से सबसे निचला स्तर है। भारत के तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी कम होकर 27.4% रह गई। वहीं, OPEC की हिस्सेदारी बढ़कर 53.2% हो गई। यह जून 2025 में लगभग 20 लाख बैरल प्रति दिन के शिखर के बाद हुआ है।
विश्लेषकों ने कहा कि बढ़ती छूट और खरीदारों की संख्या में कमी पहले ही रूसी तेल की कीमतों को रिकॉर्ड निचले स्तर पर धकेल रही है। जबकि कमजोर ऊर्जा राजस्व के कारण मॉस्को का बजट दबाव में है।
प्रतिबंधों का भारी दबाव
रूस को 2024 से यूक्रेन युद्ध से जुड़े लगभग 30,000 पश्चिमी प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा है। लेकिन, उसने यूरोप से चीन, भारत और तुर्की की ओर तेल प्रवाह को मोड़ने में कामयाबी हासिल की है। हालांकि, तुर्की ने भी हाल के महीनों में खरीद कम कर दी है।
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार, दिसंबर में रूस का कुल तेल निर्यात 49.1 लाख बैरल प्रति दिन था। इसमें चीन का हिस्सा लगभग 23 लाख बैरल प्रति दिन था।
रूस के सरकारी फाइनेंशियल यूनिवर्सिटी के इगोर युशकोव ने कहा कि अगर भारत आयात में भारी कटौती करता है तो रूस को संभवतः सप्लाई को चीन की ओर अधिक छूट पर मोड़ना होगा या उत्पादन में कटौती करनी होगी। युशकोव ने कहा, ‘उत्पादन और निर्यात में कटौती से तेल की कमी होगी। इसलिए हम रूसी तेल आयात पर अमेरिका का पूरा बैन नहीं देख रहे हैं। उन्हें खुद ही ज्यादा तेल कीमतों से नुकसान होगा।’
कम समय में और घट सकती है सप्लाई
सूत्रों ने रॉयटर्स को बताया कि भारतीय रिफाइनरियों को रूसी तेल खरीदना बंद करने के लिए कोई औपचारिक निर्देश नहीं मिला है। मौजूदा कॉन्ट्रैक्ट्स को खत्म करने में समय लगेगा।
ट्रेडर्स ने कहा कि अप्रैल में आयात में और गिरावट आ सकती है, जब नायरा एनर्जी एक महीने के लिए तय मेंटेनेंस करेगी। यह एक रूसी समर्थित रिफाइनरी है। उसकी क्षमता 400,000 बैरल प्रति दिन है।
अप्रैल के बाद व्यापार प्रवाह शायद रूस-यूक्रेन शांति वार्ता की दिशा और भारत के व्यापक रणनीतिक रुख पर निर्भर करेगा।
ट्रंप ने सुझाव दिया है कि भारत रूसी कच्चे तेल की जगह अमेरिका या वेनेजुएला से खरीदारी बढ़ा सकता है। हालांकि, ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स की एलेक्जेंड्रा हरमन ने रॉयटर्स को बताया कि अमेरिकी कच्चे तेल की क्वालिटी अलग है। यह सीधे रूसी ग्रेड की जगह नहीं ले सकता, जबकि वेनेजुएला की निर्यात क्षमता सीमित है।
इसके बजाय सऊदी अरब, यूएई और इराक से कच्चा तेल ज्यादा व्यावहारिक विकल्प के रूप में सामने आ सकता है। हालांकि, विश्लेषकों ने कहा कि भू-राजनीतिक दबाव के बावजूद भारी छूट के कारण रूसी तेल भारतीय खरीदारों के लिए आकर्षक बना रह सकता है।