पाकिस्तान संग मिलकर अरब सागर में सऊदी का नया खेल, ग्वादर पोर्ट में रणनीतिक ठिकाना या सैन्य अड्डा? खुलासा

इस्लामाबाद/रियाद: नवभारत टाइम्स ने 13 दिसंबर को अपनी एक्सक्लुसिव रिपोर्ट में खुलासा किया था कि कैसे सऊदी अरब ने पाकिस्तान के साथ मिलकर ग्वादर बंदरगाह को रणनीतिक हब बनाने का प्लान बनाया है। सऊदी अरब इसमें भारी भरकम निवेश करेगा और आशंका है कि भविष्य में इसे सैन्य बंदरगाह की तरफ इस्तेमाल किया जा सकता है। नवभारत टाइम्स को खुफिया सूत्रों से सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच किए जाने वाले इस समझौते को लेकर कई खुफिया जानकारियां मिली हैं, जिससे पता चलता है कि पाकिस्तान के ग्वादर-कराची कोस्टल हाईवे के दोहरे इस्तेमाल का प्रस्ताव रखा गया है, जिससे कार्गो मूवमेंट बढ़ेगा और ग्वादर पोर्ट को लॉजिस्टिक सपोर्ट मिलेगा।

हमें मिली जानकारी के मुताबिक, सऊदी अरब की कार्गो के लिए कराची, ग्वादर, जेद्दाह और दम्माम में इंटीग्रेटेड लॉजिस्टिक्स पार्क डेवलप करने की भी योजना है। इसके अलावा एक ज्वाइंट क्रूज और मैरिटाइम टूरिज्म कॉरिडोर का सुझाव दिया गया है, जो कराची, ग्वादर, जेद्दाह और सऊदी अरब के महत्वाकांक्षी NEOM प्रोजेक्ट को जोड़ेगा। आपको बता दें कि NEOM प्रोजेक्ट, सऊदी अरब के प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के विजन-2030 से जुड़ा हुआ है। यानि सऊदी अरब, ग्वादर पोर्ट के जरिए ना सिर्फ अपनी क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को बढ़ावा देने वाला कदम बताया गया है।

ग्वादर को लेकर सऊदी-पाकिस्तान का प्लान क्या है?
नवभारत टाइम्स को इस प्रस्ताव के बारे में कई बातें पता चली हैं। इस प्रस्ताव में समुद्री सुरक्षा और रणनीतिक सहयोग से जुड़े प्रस्ताव भी शामिल हैं। ग्वादर में एक "रीजनल मैरिटाइम फ्यूजन एंड रिस्पॉन्स सेंटर" स्थापित करने की बात कही गई है, जो ईरान, ओमान, GCC देशों और अन्य क्षेत्रीय नौसेनाओं के साथ संयुक्त अभ्यास, ट्रेनिंग और कोऑर्डिनेशन का केंद्र बनेगा। यह सेंटर आपदा प्रबंधन और आपातकालीन प्रतिक्रिया हब के रूप में भी काम करेगा। इसके अलावा नवभारत टाइम्स से खुफिया सूत्रों से बताया है कि इस प्लान के तहत जेद्दाह और दम्माम के साथ सिस्टर पोर्ट एग्रीमेंट्स के जरिए सऊदी अरब को रणनीतिक पोर्ट में पैठ और पाकिस्तान को कारोबारी फायदा पहुंचाने योजना है। इस प्रस्ताव में मछली पालन, एक्वाकल्चर एक्सपोर्ट हब और सऊदी के फंड से सीफूड प्रोसेसिंग यूनिट्स का प्रस्ताव भी ग्वादर फ्री जोन में रखा गया है
इस प्रस्ताव के तहत नवभारत टाइम्स को पता चला है कि इसके यह सेंटर ईरान, ओमान, GCC देशों और क्षेत्रीय नौसेनाओं को शामिल करके मल्टीनेशनल समुद्री अभ्यास करने के लिए ऑफिस, ऑपरेशन रूम और ट्रेनिंग सुविधाएं मुहैया कराएगा। पाकिस्तान मरीन एकेडमी के साथ सहयोग से क्षमता निर्माण और स्पेशलाइज्ड ट्रेनिंग को बढ़ावा मिलेगा। यह सेंटर इमरजेंसी और आपदा प्रतिक्रिया केंद्र के रूप में भी काम करेगा। इसके अलावा, मकरान तट पर सऊदी अरब के फंड से सीफूड एक्सपोर्ट टर्मिनल की स्थापना की जाएगी। वहीं, झींगा और टूना मछली पालन में जॉइंट वेंचर, जिसमें हैचरी और प्रोसेसिंग प्लांट शामिल हैं, उसका भी निर्माण होगा
सऊदी अरब की अरब सागर में घुसने की मंशा क्या है?
नवभारत टाइम्स से बात करते हुए भारत कि लेफ्टिनेंट कर्नल जेएस सोढ़ी (रिटायर्ड) ने कहा कि "निश्चित तौर पर सऊदी अरब अरब सागर में सैन्य हब चाहता है और इसके पीछे चीन शामिल है। अगर सऊदी अरब की ऐसी मंशा नहीं होती तो फिर सऊदी अरब सितंबर महीने में पाकिस्तान के साथ सैन्य समझौता क्यों करता?" उन्होंने कहा कि "भारत के लिए चिंता की बात इसलिए है, क्योंकि ये सिर्फ व्यापार तक शामिल नहीं है। सऊदी अरब और चीन के बहुत अच्छे संबंध हैं और अगले 8-10 सालों तक, जब तक शी जिनपिंग चीन के राष्ट्रपति रहेंगे, उन्हें तीन युद्ध करने हैं, जिनमें एक युद्ध ताइवान के खिलाफ और दूसरा युद्ध भारत के खिलाफ टू फ्रंट वॉर होगा। ऐसे में मलक्का स्ट्रेट को काउंटर करने के लिए चीन पाकिस्तान के रास्ते इकोनॉमिक कॉरिडोर बना रहा है।"

जेएस सोढ़ी का कहना है कि इसके पीछे साफ तौर पर चीन का हाथ है, क्योंकि बिना चीन की सहमति के पाकिस्तान में एक मच्छर भी नहीं उड़ सकता है। ग्वादर में सऊदी अरब की बढ़ती भूमिका सिर्फ निवेश या व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अरब सागर, होर्मुज जलडमरूमध्य और हिंद महासागर क्षेत्र में दीर्घकालिक रणनीतिक हितों से जुड़ा है। ऐसे में अब सऊदी अरब की भागीदारी इस बंदरगाह को एक नए बहु-ध्रुवीय समुद्री केंद्र में बदल सकती है, जिससे भविष्य में भारत के लिए खतरा बढ़ सकता है।
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