भोपाल, प्रदेश के सरकारी एवं निजी क्षेत्र के लाखों श्रमिक कर्मचारियों के हित में कोर्ट द्वारा दिए गए आदेश की राज्य सरकार लगातार अवहेलना कर रही है। इसको लेकर जिलों में कलेक्टर श्रम आयुक्त का आदेश भी नहीं मान रहे हैं। तीन साल में दर्जन भर आदेश जारी कर चुके श्रम आयुक्त ने एक बार फिर आदेश जारी कर श्रमिकों को हाईकोर्ट के आदेश के आधार पर न्यूनतम वेतन और एरियर देने के आदेश जारी किए हैं।
मध्य प्रदेश अस्थायी, आउटसोर्स कर्मचारी मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष वासुदेव शर्मा ने बताया कि 10 साल बाद अप्रैल 2024 में न्यूनतम वेतन पुनरीक्षित हुआ था। इसके पश्चात एक साल की लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद मार्च 2025 में हाईकोर्ट की इंदौैर खंडपीठ ने प्रदेश के सरकारी एवं निजी क्षेत्र के लाखों श्रमिक कर्मचारियों के हित में फैसला देते हुए अप्रैल 2024 से पुनरीक्षित न्यूनतम वेतन एवं एरियर के भुगतान का आदेश दिया था।
इस आधार पर न्यूनतम वेतन देना है सरकार को
कर्मचारी नेता शर्मा ने बताया कि हाल ही में 18 फरवरी को भी श्रमायुक्त इंदौर ने न्यूनतम वेतन और एरियर देने के लिए सभी कलेक्टर को पत्र भेजा है। उन्होंने बताया कि अप्रैल 2024 से पहले न्यूनतम वेतन (महंगाई भत्ता) सहित अकुशल श्रमिक के लिए 10,500 रुपए, अर्द्धकुशल श्रमिक के लिए 11382, कुशल श्रमिक के लिए 12760 एवं उच्च कुशल श्रमिक के लिए 14060 था। इसके बाद जो कोर्ट के आदेश पर यह न्यूनतम वेतन अप्रैल 2024 से बढ़क़र अकुशल श्रमिक के लिए 12,150, अर्द्धकुशल श्रमिक के लिए 13,146, कुशल श्रमिक के लिए 14869 एवं उच्च कुशल श्रमिक के लिए 16,494 हो गया है। इसे लागू कराने के लिए श्रमायुक्त इंदौर कलेक्टरों को दर्जनों आदेश कर चुके हैं, लेकिन जिलों में बढ़े हुए न्यूनतम वेतन एवं एरियर से लाखों ठेका श्रमिक कर्मचारी वंचित हैं।
श्रमिक कर्मचारियों को हो चुका है लाखों का नुकसान
पुनरीक्षित न्यूनतम वेतन नहीं मिलने से औद्योगिक क्षेत्रों, कोयला खदानों, नगरीय निकायों, सरकारी विभागों के अस्थाई, आउटसोर्स, ठेका, दैनिकवेतनभोगी, दैनिक मजदूरी श्रमिक कर्मचारियों को अब तक लाखों रुपए का नुकसान हो चुका है, यदि प्रशासन श्रमायुक्त के आदेश पर अमल कराने का काम कर दे तो एक श्रमिक कर्मचारी को एक लाख रुपए से अधिक तो एरियर ही मिल जाएगा और वेतन में 2 से 4 हजार रुपए महीने की बढ़ोतरी हो जाएगी।
निजी कारखानों, नगरीय निकायों, फारेस्ट में स्थिति खराब
सरकार का तय न्यूनतम वेतन 12150 से 16,494 प्रत्येक श्रमिक कर्मचारी को मिलना है, यह दिलाना प्रशासन का काम है, निजी कारखानों में ठेका श्रमिकों से 7 से 8 हजार मिलते हैं, नगरीय निकायों में तो समय पर वेतन भी नहीं मिलता, फारेस्ट विभाग 4 से 5 हजार रुपए महीने में काम करा रहा है, कोयला उद्योग की भी यही स्थिति है, उच्च कुशल के श्रमिक को अकुशल का वेतन मिलता है। शापिंग माल, शोरूम, आटो मोबाईल सैक्टर, कंपनी आउटलेटों, निजी अस्पतालों, स्कूल, पेट्रोल पंप सहित अधिकांश निजी क्षेत्र के श्रमिक कर्मचारी न्यूनतम वेतन से कम पर काम करने को मजबूर है, श्रम विभाग को न्यूनतम वेतन लागू कराना है, लेकिन वहां के अधिकारी आफिस से बाहर ही नहीं निकलते।
सरकारी विभागों में भी न्यूनतम वेतन नहीं
वासुदेव शर्मा ने कहा कि सरकारी विभागों में काम करने वाले चतुर्थ श्रेणी अस्थाई आउटसोर्स कर्मचारी भी न्यूनतम वेतन से कम पर काम कर रहे हैं। ग्राम पंचायतों के नल जल चालक, चौकीदार, सफाईकर्मी, भृत्यों को महज 3 से 4 हजार रुपए महीने दिए जाते हैं, स्कूलों छात्रावासों के चतुर्थ श्रेणी अंशकालीन, अस्थाई कर्मचारियों से महज 4 से 5 हजार रुपए में 10-12 घंटे काम लिया जा रहा है, इसी तरह नगरीय निकायों के कर्मचारियों से भी न्यूनतम से कम पर काम लिया जा रहा है।
न्यूनतम वेतन से वंचित लाखों श्रमिक कर्मचारी, एरियर भुला दिया
आल डिपार्ट अस्थाई, आउटसोर्स श्रमिक कर्मचारी मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष वासुदेव शर्मा का कहना है कि हमारे संगठन द्वारा न्यूनतम वेतन पुनरीक्षित कराने के लिए लंबा संघर्ष किया गया, उसके बाद अप्रैल 2024 से वह लागू हुआ। पहली श्रमिक कर्मचारियों के वेतन में 2 से 4 हजार रुपए की वेतन वढ़ोतरी हुई तथा एक मुश्त एरियर मिलने का रास्ता खुला, लेकिन कंपनियां, ठेकेदार, अधिकारियों की मिली भगत से वेतन बढ़ोतरी का लाभ श्रमिक कर्मचारियों को नहीं मिल पा रहा है, जिसके खिलाफ हम निरंतर संघर्ष भी कर रहे हैं।