MBBS छात्रा के पिता बोले- बेटी सुसाइड नहीं कर सकती

भोपाल, मैंने शव देखा, तो उसमें एसिड या जहर पीने के कोई स्पष्ट निशान नहीं दिखे। न कपड़े खराब थे, न उल्टी-घबराहट के कोई संकेत दिखे। मौके पर एसिड बोतल तक नहीं दिखी। हमें वॉशरूम जाने भी नहीं दिया जा रहा था। कहा कि पुलिस ने सील कर दिया है।

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ये गंभीर आरोप भोपाल में 10 फरवरी को सुसाइड करने वाली MBBS छात्रा रोशनी के पिता वंतर सिंह ने लगाए हैं। उनका कहना है कि बेटी इतनी कमजोर नहीं थी कि आत्महत्या जैसा कदम उठा ले।

वंतर सिंह ने कहा- हमें पीजी के वार्डन और कॉलेज प्रबंधन की दी जानकारी पर भरोसा नहीं है। घटना की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, जिससे भविष्य में किसी और रोशनी की जिंदगी यू खत्म न हो।

रोशनी के पिता के आरोप इसलिए भी गंभीर हैं, क्योंकि 31 जुलाई 2022 से 5 जनवरी 2026 के बीच ऐसे ही 6 ऐसे मामले एम्स, हमीदिया और निजी कॉलेज के सामने आ चुके हैं।

रोशनी से पहले एम्स भोपाल के ट्रॉमा और इमरजेंसी मेडिसिन विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. रश्मि वर्मा की मौत ने चौंका दिया था। उनका आत्महत्या के प्रयास के बाद करीब 24 दिन तक एम्स भोपाल में इलाज चला था।

इधर, कॉलेज प्रबंधन का कहना है कि स्टूडेंट्स में बीते 2 सालों में 40 डिप्रेशन के केस आए थे। हमने उन्हें बचाया है। अगर रोशनी के बारे में पता होता तो उसे भी बचा लेते।

फुटेज के नाम पर सिर्फ एक क्लिप दिखाई

पिता वंतर सिंह ने कहा कि बेटी ने गांधी मेडिकल कॉलेज का चयन खुद किया था। पढ़ाई का दबाव था, यह वह मानती थी, लेकिन सुसाइड कर लेगी, हमें स्वीकार नहीं। जिस तरह से घटना के बाद पूरा नैरेटिव गढ़ा गया, उसमें कई विरोधाभास हैं। परिवार को जो जानकारी दी गई, वह संदेह पैदा करती है।

मैंने पूरी सीसीटीवी फुटेज देखने की मांग की, लेकिन मुझे सिर्फ रात की एक छोटी क्लिप दिखाई गई। हमसे कहा कि पूरी फुटेज पुलिस को दे दी गई है। हमें सिर्फ इतना दिखाया गया कि बच्ची वॉशरूम की तरफ जा रही है। उसके बाद क्या हुआ, यह हमें नहीं बताया गया।

जब हम गांधी मेडिकल कॉलेज पहुंचे और अपनी बात रखनी चाही, तो सीनियर स्टूडेंट्स हमें ही शांत कराने लगे। हम सवाल पूछ रहे थे। उनकी तरफ से गोल-गोल जवाब दिए जा रहे थे। हमें नहीं लगता कि हमारी बेटी सुसाइड कर सकती है। पूरी घटना की गंभीरता से जांच होनी चाहिए।

आगे GMC में यह होगा एक्शन प्लान

  • हर माह की 10 तारीख को विभागवार संवाद कार्यक्रम होंगे।
  • रोल प्ले और समूह गतिविधियों के जरिए छात्रों से बातचीत की जाएगी।
  • ‘लेट्स शेयर एंड केयर’ नाम से एक विशेष कक्ष बनाया जा रहा है।
  • मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारी गोपनीय रखी जाएगी।

एडमिशन से पहले हो मेंटल स्क्रीनिंग

साइकोलॉजिस्ट डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी का कहना है कि मेडिकल छात्रों में बढ़ती आत्महत्याएं चेतावनी हैं। 40 से 45 प्रतिशत मामलों में पारिवारिक माहौल भी जिम्मेदार होता है। अगर परिवार जजमेंटल हो या अपेक्षाएं बहुत ज्यादा हों, तो तनाव बढ़ता है। मोबाइल मददगार भी हो सकता है और नुकसानदायक भी। ज्यादा स्क्रीन टाइम नींद खराब करता है, जिससे मानसिक तनाव बढ़ता है।

मेडिकल क्षेत्र में लगातार हो रहीं आत्महत्या

रोशनी का मामला चिकित्सा क्षेत्र से जुड़ी आत्महत्याओं की लंबी कड़ी का हिस्सा बन गया है। एम्स भोपाल, हमीदिया अस्पताल और अन्य मेडिकल कॉलेजों में पिछले कुछ वर्षों में कई छात्र और डॉक्टर आत्महत्या कर चुके हैं। अधिकतर मामलों में वजह पढ़ाई और काम का अत्यधिक दबाव सामने आया है। साल 2022 से अब तक ऐसे 6 से ज्यादा मामले दर्ज हो चुके हैं।

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