ईरान युद्ध से झुलसने लगी दुनिया, फिलीपींस ने लागू की एनर्जी एमरजेंसी, कई और देशों का भी बुरा हाल

नई दिल्ली: ईरान युद्ध का असर अब पूरी दुनिया पर दिखने लगा है। इस लड़ाई के कारण दुनिया में एनर्जी की लाइफलाइन कही जाने वाली होर्मुज की खाड़ी से जहाजों की आवाजाही बंद है। इसे दुनिया के इतिहास में तेल और गैस का सबसे बड़ा संकट माना जा रहा है। इसकी वजह यह है कि दुनिया का 20 फीसदी तेल और एक तिहाई गैस इसी रास्ते से गुजरता है। इसके बंद होने से अब दुनिया में हाहाकार मचने लगा है। सबसे ज्यादा मुश्किल एशियाई देशों को हो रही है जिनका ज्यादातर तेल और गैस इसी रूट से आती है।

इसका पहला शिकार फिलीपींस हुआ है। इस देश ने नेशनल एनर्जी एमरजेंसी लागू कर दी है। साफ है कि देश में फ्यूल सप्लाई की स्थिति लगातर बद से बदतर होती जा रही है। फिलीपींस अपना 98 फीसदी तेल पश्चिम एशिया से मंगाता है। देश के राष्ट्रपति फर्निडाड मार्कोस जूनियर ने मंगलवार को एक एग्जीक्यूटिव आदेश जारी करते हुए नेशनल एनर्जी एमरजेंसी लागू कर दी। उन्होंने कहा कि देश की ऊर्जा स्थिरता, आर्थिक गतिविधियों और जरूरी सेवाओं के लिए ऐसा करना जरूरी था।

कई देशों का बुरा हाल

फिलीपीस में केवल 45 दिन की सप्लाई बाकी रह गई है। देश में पेट्रोल की कीमत 28 फरवरी से अब तक 100 फीसदी चढ़ चुकी है। फिलीपींस के अलावा वियतनाम, सिंगापुर, साउथ कोरिया, ताइवान, मलेशिया और थाईलैंड का भी 70 फीसदी से ज्यादा तेल वहीं से आता है। वियतनाम के 90 फीसदी कच्चा तेल मिडिल ईस्ट से आता है। इसके अलावा भारत और चीन भी पश्चिम एशिया से आने वाले तेल के बड़े खरीदार हैं।

भारत का 55 फीसदी तेल खाड़ी देशों से आता है जबकि चीन के मामले में यह 50 फीसदी है। हालांकि दोनों देशों ने हाल में दूसरे देशों खासकर रूस के खरीदारी बढ़ाई है। भारत ने इस महीने रूस से 60 मिलियन बैरल कच्चा तेल खरीदा और अगले महीने के लिए भी इतना ही कॉन्ट्रैक्ट किया है। साथ ही भारत वेनेजुएला जैसे देशों से भी तेल की खरीद कर रहा है। लेकिन अगर होर्मुज की खाड़ी में लंबे समय तक तनाव रहता है तो इससे भारत और चीन की इकॉनमी गड़बड़ा सकती है।

यूरोपीय देश फायदे में

इसकी वजह यह है कि कच्चे तेल की कीमत में काफी तेजी आई है और रूस प्रीमियम पर तेल बेच रहा है। ईरान युद्ध से पहले रूसी तेल डिस्काउंट पर मिल रहा था। एशियाई देशों की तुलना में बाकी देश मिडिल ईस्ट से कम तेल खरीदते हैं। मसलन तुर्की, साउथ अफ्रीका, ट्यूनीशिया तथा सेंट्रल और ईस्टर्न यूरोप के देश मिडिल ईस्ट से 20 फीसदी से भी कम तेल खरीदते हैं।

ईरान युद्ध शुरू होने के बाद कच्चे तेल की कीमत 120 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गई थी जो 2022 के बाद इसका उच्चतम स्तर है। हालांकि हाल में इसमें कई उतारचढ़ाव आए हैं लेकिन यह लगातार 100 डॉलर से ऊपर बना हुआ है। अभी ब्रेंट क्रूड करीब तीन डॉलर की गिरावट के साथ 101.5 डॉलर पर ट्रेड कर रहा है।

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