व्हाइट कोट फीयर के कारण ब्लड प्रेशर की रीडिंग बिगड़ सकती है। यह एक अहम संकेत के रूप में सामने आया है, जिससे कई मरीज बेवजह बीपी की दवाइयों के सेवन और बीमारी के तनाव से बच सकते हैं। यह जानकारी एम्स भोपाल, पांडिचेरी मेडिकल कॉलेज, नोएडा मेडिकल कॉलेज और अमेरिका के कॉटनवुड स्थित यूनिवर्सिटी जीएमई कंसोर्टियम रेजिडेंसी प्रोग्राम के विशेषज्ञों की संयुक्त स्टडी में सामने आई है।
स्टडी में बताया गया है कि अगर किशोरावस्था में ब्लड प्रेशर ज्यादा रहता है, तो आगे चलकर युवावस्था में यह स्थायी हाई ब्लड प्रेशर का रूप ले सकता है। इससे दिल का आकार बढ़ना, किडनी की कार्यक्षमता कम होना और पेशाब में प्रोटीन आना जैसी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं। इससे बचाव के लिए कई किशोर दवाइयों का सेवन शुरू कर देते हैं।
भारत में किशोरों में हाई ब्लड प्रेशर की औसत दर करीब 7.6% बताई गई है। वहीं, इस स्टडी के दौरान मध्यप्रदेश में खासतौर पर भोपाल के सरकारी और निजी स्कूलों के 800 से अधिक स्वस्थ बच्चों की पहली जांच की गई। इसमें 4% बच्चों का ब्लड प्रेशर तय मानक से अधिक पाया गया।
कुछ दिनों के अंतराल पर जब इन्हीं बच्चों की दूसरी जांच की गई, तो यह आंकड़ा घटकर 2.7% रह गया। तीसरी बार जांच करने पर यह और घटकर 1.9% पर आ गया।
डॉक्टरों का कहना है कि सही ब्लड प्रेशर रीडिंग के लिए कुछ समय के अंतराल पर तीन बार जांच करना जरूरी है। इससे अनावश्यक दवाइयों के सेवन को रोका जा सकता है और बच्चों व उनके परिजनों को बीमारी के बेवजह तनाव से बचाया जा सकता है।
यह कारण बढ़ा देते हैं BP
विशेषज्ञों के मुताबिक बच्चों और किशोरों में ब्लड प्रेशर स्थिर नहीं रहता। स्कूल का माहौल, परीक्षा का तनाव, अजनबी डॉक्टर या जांच का डर, ये सभी कारण पहली बार में बीपी बढ़ा सकते हैं। इसे मेडिकल भाषा में व्हाइट कोट इफेक्ट कहा जाता है।
इसी वजह से इस स्टडी में हर बच्चे का ब्लड प्रेशर तीन अलग-अलग दिनों में, एक एक हफ्ते के अंतर से मापा गया। हर विजिट में भी तीन-तीन रीडिंग ली गईं। इससे यह साफ हो सका कि वास्तव में किन बच्चों में ब्लड प्रेशर लगातार ऊंचा रहता है और किसमें यह अस्थायी बदलाव होता है।
10 से 18 साल के बच्चों पर हुई स्टडी भोपाल के स्कूलों में हुई इस वैज्ञानिक और गहन जांच में 10 से 18 साल के किशोरों को शामिल किया गया, जिसमें सामने आया कि हर 100 में से एक से दो बच्चे ऐसे हैं, जिसे बार-बार जांच करने पर हाई ब्लड प्रेशर की समस्या पाई गई।
अध्ययन से यह भी साफ हुआ कि पहली बार जांच में दिखने वाला हाई ब्लड प्रेशर कई बार तनाव या घबराहट का नतीजा होता है, जो दोबारा जांच में सामान्य हो जाता है। यही वजह है कि डॉक्टर अब किशोरों में हाई बीपी की पहचान के लिए नई रणनीति की जरूरत बता रहे हैं।
800 स्कूली बच्चों पर एक साल की निगरानी यह अध्ययन जून से दिसंबर के बीच भोपाल के हरी इलाके के अलग अलग दिशाओं के सरकारी और निजी स्कूलों में किया गया। इसमें 10 से 18 साल के 824 छात्र-छात्राएं शामिल किए गए। सभी बच्चों की लंबाई, वजन और बीएमआई दर्ज किया गया, ताकि मोटापे और ब्लड प्रेशर के बीच संबंध को भी समझा जा सके।
अध्ययन की खास बात यह रही कि हर बच्चे को एक यूनिक कोड दिया गया, ताकि तीनों विजिट की रिपोर्ट को आपस में जोड़ा जा सके। जिन बच्चों की रीडिंग बार-बार हाई आई, उनके अभिभावकों को भी इसकी जानकारी दी गई।
लड़के ज्यादा खतरे में अध्ययन में यह भी सामने आया कि हाई ब्लड प्रेशर की समस्या लड़कों में ज्यादा देखी गई। लड़कों में यह दर करीब 2.6% रही। जबकि, लड़कियों में यह केवल 0.2% पाई गई। डॉक्टरों के अनुसार, इसके पीछे हार्मोनल बदलाव, शरीर में फैट का वितरण और किशोरावस्था में लड़कों पर ज्यादा मानसिक-शारीरिक दबाव जैसे कारण हो सकते हैं।
इसके अलावा स्टडी इस बात पर जोर देती है कि सिर्फ एक बार की जांच के आधार पर बच्चों को बीमार घोषित करना गलत हो सकता है।
सामान्य वजन वाले बच्चों में भी खतरा आम धारणा यह है कि हाई ब्लड प्रेशर केवल मोटे बच्चों में होता है, लेकिन यह स्टडी इस सोच को भी तोड़ती है।रिसर्च में पाया गया कि कई ऐसे बच्चे भी हाई बीपी की श्रेणी में आए, जिनका बीएमआई पूरी तरह सामान्य था।
इसका मतलब साफ है सिर्फ वजन देखकर बच्चों के ब्लड प्रेशर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
किशोरावस्था में हाई ब्लड प्रेशर घातक डॉक्टरों का कहना है कि अगर किशोरावस्था में हाई बीपी को नजरअंदाज किया गया, तो आगे चलकर यह गंभीर बीमारियों की वजह बन सकता है। कम उम्र में हार्ट डिजीज हो सकती हैं। किडनी पर असर पड़ने के साथ युवावस्था में स्थायी हाई ब्लड प्रेशर की समस्या हो सकती है। यही कारण है कि समय रहते पहचान और जीवनशैली में सुधार बेहद जरूरी है।
स्कूल हेल्थ प्रोग्राम में हो बदलाव यह अध्ययन नीति-निर्माताओं के लिए भी अहम संकेत देता है। विशेषज्ञों का कहना है कि स्कूलों में होने वाली हेल्थ स्क्रीनिंग में सिर्फ एक बार नहीं, बल्कि बार-बार ब्लड प्रेशर जांच का प्रावधान होना चाहिए। साथ ही, बच्चों में फिजिकल एक्टिविटी, स्क्रीन टाइम कंट्रोल और तनाव प्रबंधन पर भी ध्यान देना जरूरी है।
एम्स भोपाल से जुड़े शोधकर्ताओं का कहना है कि यह अध्ययन भारत में अपनी तरह का पहला बड़ा प्रयास है। इससे यह तय करने में मदद मिलेगी कि बच्चों में हाई ब्लड प्रेशर की सही परिभाषा क्या होनी चाहिए और किन मामलों में इलाज की जरूरत है।