भोपाल। भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) लागू होने के दो वर्ष पूरे होने जा रहे हैं, लेकिन प्रदेश में ई-एफआईआर व्यवस्था अपेक्षित गति नहीं पकड़ सकी है। एक जुलाई 2024 से अब तक मध्य प्रदेश में केवल 5,843 ई-एफआईआर ही दर्ज हो सकी हैं। यह औसतन प्रतिमाह 250 से भी कम है।चिंताजनक तथ्य यह है कि इस अवधि में 19 हजार से अधिक ई-एफआईआर आवेदन प्राप्त हुए, लेकिन उनमें से अधिकांश एफआईआर में परिवर्तित नहीं हो पाए। पुलिस मुख्यालय की समीक्षा में सामने आया है कि शिकायतकर्ताओं द्वारा नियमानुसार तीन दिन के भीतर थाने पहुंचकर सत्यापन न कराने और पुलिस की सीमित रुचि इसके प्रमुख कारण हैं।
दो साल में आवेदन 19 हजार, पर एफआईआर सिर्फ 5,843; जानिए डिजिटल युग में भी क्यों फेल हो रहा है पुलिस का ‘ई-एफआईआर’ सिस्टम
वर्ष 2026 में जनवरी से जून के बीच 4,290 ई-एफआईआर आवेदन प्राप्त हुए, लेकिन इनमें से केवल 324 आवेदन ही एफआईआर में तब्दील हो सके।
कुछ जिलों की स्थिति
– नर्मदापुरम: कुल आवेदनों में सिर्फ 2% एफआईआर में परिवर्तित।
– इंदौर: 432 आवेदनों में केवल 12 एफआईआर दर्ज।
– बालाघाट: 50 आवेदनों में सिर्फ 5 एफआईआर।
– भोपाल: 56 आवेदनों में मात्र 5 एफआईआर दर्ज।
रेलवे पुलिस (जीआरपी) में ई-एफआईआर की सफलता दर अपेक्षाकृत बेहतर रही। जीआरपी जबलपुर में प्राप्त आवेदनों में लगभग 18 प्रतिशत मामलों में एफआईआर दर्ज की गई। विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रेन में यात्रा कर रहे यात्रियों के लिए ऑनलाइन शिकायत दर्ज कराना अधिक सुविधाजनक होता है।
– ऑनलाइन आवेदन दर्ज करने के बाद शिकायतकर्ता को तीन दिन के भीतर थाने पहुंचना अनिवार्य होता है।
– दस्तावेजों पर हस्ताक्षर और साक्ष्य प्रस्तुत किए जाते हैं।
– पुलिस फोन कर संपर्क करती है, फिर नोटिस भी जारी किया जाता है।
– 30 दिन तक शिकायतकर्ता के उपस्थित न होने पर आवेदन निरस्त कर दिया जाता है।
– त्वरित कार्रवाई के लिए लोग सीधे थाने जाकर शिकायत दर्ज कराना बेहतर समझते हैं।
– आवेदन करने के बाद बड़ी संख्या में लोग सत्यापन के लिए नहीं पहुंचते।
– कई मामलों में ऑनलाइन आवेदन के साथ ही ऑफलाइन एफआईआर भी दर्ज करा दी जाती है, जिससे ई-एफआईआर निरस्त हो जाती है।