भोपाल। महज 32,792 रुपये की वसूली का विवाद खत्म होने में 47 साल लग गए। वर्ष 1979 में एमपी स्टेट एग्रो और पीडी महेश्वरी के बीच शुरू हुआ यह मामला जिला अदालत से लेकर हाई कोर्ट तक पहुंचा। वर्ष 2000 में अदालत ने एमपी स्टेट एग्रो के पक्ष में फैसला देते हुए 32,792 रुपये पर 12 प्रतिशत ब्याज सहित भुगतान का आदेश भी दिया, लेकिन इसके बाद भी मामला खत्म नहीं हुआ। आखिरकार 12 अगस्त 2026 को दोनों पक्षों की सहमति से मेडिएशन के जरिए विवाद का अंत हुआ और 90 हजार रुपये के भुगतान पर समझौता हो गया।
यह भोपाल जिला न्यायालय के पुराने मामलों में से एक रहा। एमपी स्टेट एग्रो ने वर्ष 1979 में पीडी महेश्वरी के खिलाफ वसूली का मुकदमा शुरू किया था। उस समय मामले की पैरवी आरके श्रीवास्तव, अधिवक्ता एवं लॉयर्स हाउस के संपादक, ने की थी। मुकदमा शुरू होने के बाद सुनवाई चलती रही और करीब डेढ़ दशक बाद वर्ष 1993 में मामले में एकतरफा सुनवाई शुरू हुई।
2000 में फैसला आया, लेकिन विवाद नहीं थमा
25 फरवरी 2000 को अदालत ने 32,792 रुपये पर 12 प्रतिशत ब्याज सहित भुगतान का आदेश दिया। इसके बावजूद मामला समाप्त नहीं हुआ। पीडी महेश्वरी ने इस फैसले को चुनौती दी और वर्ष 2004 में जिला अदालत में मामला पहुंचा। अदालत ने इसे 20 अक्टूबर 2005 को खारिज कर दिया। इसके बाद भी कानूनी लड़ाई जारी रही। पीडी महेश्वरी की ओर से हाई कोर्ट, जबलपुर में चुनौती दी गई। करीब 20 साल बाद 13 अक्टूबर 2025 को हाई कोर्ट ने मामले को दोबारा सुनवाई के लिए भोपाल की नवम अपर जिला अदालत भेज दिया। तब तक मूल मुकदमे को शुरू हुए करीब 46 साल बीत चुके थे।
47 साल बाद बातचीत से निकला समाधान
मामला नवम अपर जिला न्यायाधीश आशुतोष शुक्ला के सामने पहुंचने के बाद दोनों पक्षों के बीच बातचीत के जरिए विवाद खत्म करने की कोशिश हुई। एमपी स्टेट एग्रो की ओर से अधिवक्ता हार्दिक श्रीवास्तव और पीडी महेश्वरी की ओर से अधिवक्ता अर्पित महेश्वरी ने मेडिएशन की प्रक्रिया में हिस्सा लिया। लंबे समय से चल रहे मामले को आगे बढ़ाने के बजाय दोनों पक्ष समझौते पर सहमत हो गए। इसके तहत एमपी स्टेट एग्रो को 90 हजार रुपये का डिमांड ड्राफ्ट दिया गया। इसके साथ ही 12 अगस्त 2026 को 47 साल पुराने मुकदमे का अंत हो गया।
मुकदमा शुरू करने वाले अधिवक्ता अब नहीं रहे
इस मामले की लंबी अवधि का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1979 में इसकी पैरवी करने वाले आरके श्रीवास्तव अब जीवित नहीं हैं। यानी जिस समय विवाद अदालत पहुंचा था, उस समय मौजूद व्यक्ति भी 47 साल बाद इसके अंतिम नतीजे को देखने के लिए मौजूद नहीं रहे। इतने लंबे समय तक मामला चलने के बाद आखिरकार इसका समाधान किसी एक पक्ष की जीत हार से नहीं, बल्कि आपसी सहमति से हुआ।
उस समय के 32 हजार, आज करीब 9 लाख के बराबर
महंगाई के हिसाब से देखें तो 1979 के 32,792 रुपये की खरीद क्षमता आज करीब 9.2 लाख रुपये के बराबर हो सकती है। वहीं यदि इसी रकम को 47 साल तक 9 प्रतिशत सालाना चक्रवृद्धि ब्याज से बढ़ाया जाए तो यह करीब 18.83 लाख रुपये होती है। 12 प्रतिशत सालाना चक्रवृद्धि के हिसाब से यही रकम करीब 67.46 लाख रुपये तक पहुंचती। हालांकि ये केवल गणना के आंकड़े हैं।