मानसून में कूनो से बाहर निकले चीते, 6 जिलों में अलर्ट, 18 टीमें कर रहीं राउंड-द-क्लॉक मॉनिटरिंग

श्योपुर: नामीबिया से भारत लाए गए चीतों ने अब कूनो नेशनल पार्क की सीमाओं को लांघना शुरू कर दिया है। ये चीते मध्य प्रदेश के केंद्रीय इलाकों में नए शिकारगाह और नए ठिकाने तलाशते हुए स्वतंत्र रूप से घूम रहे हैं। जैसे-जैसे ये चीते अपने तय आवास से बाहर निकल रहे हैं, वैसे-वैसे वन विभाग और प्रोजेक्ट चीता प्रशासन के सामने इनकी सुरक्षा और मॉनिटरिंग सबसे बड़ी चुनौती बनती जा रही है। इस चुनौती से निपटने के लिए प्रशासन ने एक अभूतपूर्व 24×7 मैदानी अभियान छेड़ दिया है।

कूनो नेशनल पार्क से बाहर निकले चीते

हाल ही में आई कूनो की नवीनतम न्यूजलेटर रिपोर्ट के अनुसार, भारत में चीता प्रोजेक्ट के चार साल पूरे होने के बाद अब स्थिति काफी बदल चुकी है। 17 सितंबर 2022 को नामीबिया से पहली खेप आने के बाद से अब कूनो और उसके आसपास के विस्तृत भू-भाग में कुल 30 कॉलर वाले चीतों की कड़ी निगरानी की जा रही है। इनमें से 18 चीते छह अलग-अलग जिलों में पूरी तरह खुले तौर पर (फ्री-रेंजिंग) घूम रहे हैं, जबकि 12 चीते बड़े बाड़े वाले प्राकृतिक जंगलों के सुरक्षित दायरे में रह रहे हैं। चीतों के इस तरह बाहर निकलने से स्थानीय इलाकों में रोमांच के साथ-साथ प्रशासनिक सतर्कता भी अपने चरम पर है।

18 विशेष टीमों का 24X7 पहरा

कूनो प्रशासन ने इस पूरी प्रक्रिया को एक अभूतपूर्व 24×7 फील्ड ऑपरेशन करार दिया है। वन्यजीव इतिहास में शायद ही कभी ऐसा उदाहरण मिलता है जहां इतने सारे व्यक्तिगत चीतों पर इतनी गहन और निरंतर निगरानी रखी जा रही हो। खुले में घूमने वाले 18 चीतों के लिए कुल 18 समर्पित टीमों को मैदान में उतारा गया है। हर टीम में 3 वन फील्ड कर्मचारी और 6 सुरक्षाकर्मी शामिल हैं। ये कर्मी अपनी आठ घंटे की शिफ्ट के दौरान विशेष रूप से तैयार गाड़ियों से पेट्रोलिंग करते हैं, साथ ही अपने साथ खाने-पीने का सामान और बुनियादी जरूरत की चीजें भी रखते हैं।

  • 30 कॉलर वाले चीते: कूनो और उसके विस्तारित लैंडस्केप में 30 चीतों की राउंड-द-क्लॉक मॉनिटरिंग हो रही है।
  • 6 जिलों में फ्री-रोमिंग: इनमें से 18 चीते 6 अलग-अलग जिलों में खुले तौर पर घूम रहे हैं।
  • 18 समर्पित टीमें: हर टीम में 9 सदस्य (3 वन कर्मी और 6 सुरक्षाकर्मी) 8 घंटे की शिफ्ट में तैनात हैं।
  • मानसून की मुश्किलें: भारी बारिश और घने बादलों के बीच ट्रैकिंग और कम्यूनिकेशन उपकरण चलाना सबसे बड़ी चुनौती है।

सैटेलाइट और जमीन का तालमेल

चीतों के गले में बंधे सैटेलाइट-सह-रेडियो कॉलर उनकी लोकेशन और मूवमेंट की जानकारी तो देते हैं, लेकिन वे मैदानी स्टाफ का विकल्प नहीं बन सकते। सैटेलाइट सिग्नल से यह पता चलता है कि चीता किस इलाके में गया है, लेकिन रेडियो ट्रैकिंग से उसकी सटीक स्थिति का अंदाजा लगाया जाता है। इसके बाद टीमें भौतिक रूप से उस क्षेत्र में पहुंचती हैं, चीते के व्यवहार का अध्ययन करती हैं और आसपास की परिस्थितियों का आकलन करती हैं। मानसून के मौसम में यह काम और भी ज्यादा कठिन हो जाता है, जब भारी बारिश, कीचड़ भरे रास्ते और घना बादलों का पहरा ट्रैकिंग डेटा में बाधा डालता है।

शावकों वाली मांओं पर सबसे सख्त पहरा

इस पूरी मॉनिटरिंग प्रक्रिया का सबसे संवेदनशील हिस्सा शावकों के साथ घूम रही चीता माताएं हैं। पशु चिकित्सकों के नेतृत्व वाली विशेष टीमें उनकी सेहत, शारीरिक स्थिति और गतिविधियों पर पैनी नजर रखती हैं, ताकि उन्हें किसी भी प्रकार की अनावश्यक परेशानी या मानवीय हस्तक्षेप का सामना न करना पड़े। जब ये चीते सड़कों या मानव बस्तियों के करीब पहुंचते हैं, तो उनकी सटीक लोकेशन को पूरी तरह गोपनीय रखा जाता है, ताकि किसी भी तरह की अप्रिय घटना या भीड़भाड़ से बचा जा सके।

भारत में वन्यजीव संरक्षण का नया इतिहास

प्रोजेक्ट चीता सिर्फ एक वन्यजीव पुनरुत्थान कार्यक्रम नहीं है, बल्कि यह भारत के कंजर्वेशन इतिहास में एक मील का पत्थर है। जब मांसाहारी वन्यजीव अपने ऐतिहासिक आवासों की ओर लौटते हैं, तो इकोसिस्टम में एक नया संतुलन स्थापित होता है। कूनो के इस विशाल प्रयोग ने यह साबित कर दिया है कि आधुनिक तकनीक और जमीनी मेहनत का मेल यदि सही अनुपात में हो, तो बड़े से बड़े लॉजिस्टिक और भौगोलिक अवरोधों को पार किया जा सकता है। आने वाले समय में मध्य प्रदेश का यह इलाका ग्लोबल वाइल्डलाइफ टूरिज्म का सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभर रहा है।

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