आज से क्या बदलेगा, कैसा होगा सफर; निजी ऑपरेटर क्यों दे रहे धमकी?

21 साल बाद मध्य प्रदेश में सरकारी बस सेवा लौट रही है। 25 सितंबर यानी आज मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा के तहत CM मोहन यादव और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी भोपाल से 351 बसों को हरी झंडी दिखाएंगे। लेकिन बस सेवा का मॉडल इस बार अलग है।

ये बसें चलाएगा कौन- सरकार खुद या निजी ऑपरेटर, प्राइवेट बसों का क्या होगा और नई बसें आपके शहर/गांव तक कब पहुंचेंगी; समझेंगे मध्य प्रदेश एक्सप्लेनर में…

सवाल 1: 21 साल बाद सरकार को बस सेवा फिर शुरू करने की जरूरत क्यों पड़ी?

जवाब- 2005 में तत्कालीन मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर ने मध्य प्रदेश राज्य परिवहन निगम को बंद कर दिया था।

  • वजह थी करीब ₹756 करोड़ का कर्ज और हर महीने करीब ₹5 करोड़ का घाटा। इसके बाद प्रदेश पूरी तरह निजी बसों पर निर्भर हो गया।
  • कम यात्री वाले दूर-दराज के रूटों पर नियमित बस सेवा बनाए रखना निजी ऑपरेटरों के लिए मुश्किल रहा, इससे कई गांव और आदिवासी इलाके नियमित बस सेवा से कटे रह गए। नई सेवा का लक्ष्य आने वाले सालों में नेटवर्क बढ़ाकर हजारों बसों तक पहुंचाना और सभी 89 आदिवासी विकासखंडों को जोड़ना है। कुल 1,036 रूट तय हैं, 150 शहरी, 450 इंटरसिटी और 436 अंतरराज्यीय।
  • CM मोहन यादव के मुताबिक, प्रदेश के पास पांच लाख किलोमीटर का सड़क नेटवर्क है, जिस पर 15,000 से ज्यादा बसें चलाई जा सकती हैं, और यह सिर्फ मुनाफे का नहीं, लोक-कल्याण का जरिया है।

सवाल 2: नई बस सेवा का मॉडल कैसे काम करेगा?

जवाब- बस सेवा सरकारी होगी, लेकिन बसें चलाने का काम निजी ऑपरेटर करेंगे।

  • मध्य प्रदेश यात्री परिवहन एवं अधोसंरचना लिमिटेड (MPYPIL) नाम की एक राज्य-स्तरीय कंपनी बनी है। इसके अध्यक्ष खुद मुख्यमंत्री हैं, परिवहन मंत्री और मुख्य सचिव उपाध्यक्ष। परिवहन सचिव मनीष सिंह के मुताबिक, MPYPIL बस संचालन और परिवहन इंफ्रास्ट्रक्चर को पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल के तहत एक साथ जोड़ने का काम करेगी।
  • इसके नीचे भोपाल, इंदौर, जबलपुर, ग्वालियर, उज्जैन, सागर और रीवा में 7 क्षेत्रीय कंपनियां बनी हैं, जो इंटरसिटी संचालन संभालेंगी। बसें दौड़ाने का असली काम इनसे जुड़े निजी ऑपरेटर करेंगे। यानी सरकार खुद हर बस का स्टेयरिंग नहीं संभालेगी, सिर्फ रूट, किराया और सिस्टम का ढांचा तय करेगी।
  • नए बस टर्मिनल भी PPP मॉडल पर बनेंगे। निगरानी सिर्फ राज्य स्तर तक सीमित नहीं रहेगी, हर जिले में एक परिवहन सलाहकार समिति बनेगी, जिसकी अध्यक्षता कलेक्टर करेंगे और इसमें जनप्रतिनिधि भी शामिल होंगे।
  • सवाल 3: अभी जो निजी बसें चल रही हैं, उनका क्या होगा?

    जवाब- फिलहाल सरकार ने इसे लेकर कोई जानकारी साझा नहीं की है।

    • निजी ऑपरेटरों का दावा है कि प्रदेश में उनके पास करीब 15,000 मौजूदा परमिट हैं, लेकिन कई रूटों पर पर्याप्त यात्री नहीं मिलते, जिससे कारोबार पहले से दबाव में है। यह विवाद नया नहीं, करीब डेढ़-दो साल से चल रहा है। बस ओनर्स एसोसिएशन इस मुद्दे पर ग्वालियर हाईकोर्ट में तीन मामले लेकर गई है, जिनमें से दो में फिलहाल स्टे मिला हुआ है।
    • एसोसिएशन के महामंत्री जय कुमार जैन का आरोप है कि सरकार की मंशा धीरे-धीरे सभी निजी परमिट अपने नाम कर, फिर उन्हीं रूटों को ऑपरेटरों को किराए पर लौटाने की है, ताकि हर बस से एक तय रॉयल्टी वसूली जा सके।
    • एसोसिएशन इसे 2005 के दौर से जोड़कर देखती है, जब निगम बंद होने पर परमिट निजी ऑपरेटरों को मिले थे और उसके एवज में टैक्स बढ़ाया गया था। एसोसिएशन का कहना है कि यह मुद्दा परिवहन सचिव, मंत्री और परिवहन आयुक्त तक लगातार उठाया जा रहा है।
    • सरकार ने ऑपरेटरों की मांगों पर विचार के लिए मंत्री समूह बनाया है- परिवहन मंत्री उदय प्रताप सिंह, जल संसाधन मंत्री तुलसीराम सिलावट और राज्य मंत्री नरेंद्र शिवाजी पटेल, जो सिफारिश देंगे।

    सवाल 4: 15 साल पुरानी बस फिट है तो फिर उसे चलाने की अनुमति क्यों नहीं?

    जवाब- 15 साल की उम्र पूरी होने के बाद सिर्फ फिटनेस प्रमाणपत्र होना पर्याप्त नहीं रह गया।

    • 14 नवंबर 2025 को सरकार ने एक आदेश जारी कर 15 साल पुराने कमर्शियल वाहनों, खासकर बसों, के संचालन पर रोक लगा दी थी, चाहे उनके पास वैध फिटनेस सर्टिफिकेट और परमिट ही क्यों न हों।
    • ऑपरेटरों ने हाईकोर्ट में 10 याचिकाएं दायर कीं, तर्क था कि नियम सिर्फ नए परमिट पर लागू होना चाहिए, जिन बसों का फिटनेस टेस्ट और टैक्स नियमित जमा हो रहा है, उन पर नहीं। अप्रैल 2026 में हाईकोर्ट ने सरकार का आदेश बरकरार रखा। नतीजा, प्रदेश की करीब 899 बसें अब सड़क पर नहीं उतर सकतीं। एसोसिएशन के मुताबिक इस आदेश के खिलाफ अपील पेंडिंग है।
    • ऑपरेटरों की दलील यह है कि वही बस रिजर्व परमिट पर 20 साल तक देश में कहीं भी, यहां तक कि 1,000-2,000 किलोमीटर दूर मुंबई या कोलकाता तक जा सकती है, तो फिर वह अपने ही राज्य में 50-100 किलोमीटर के रूट पर क्यों नहीं चल सकती।
    • बस ओनर्स एसोसिएशन का कहना है कि लॉन्च के लिए दिखाई जा रही 351 बसों में कुछ नई (जैसे प्रधानमंत्री ई-बस योजना की) हैं, तो कुछ पहले से शहर में या सूत्र-सेवा में चल रही पुरानी गाड़ियां हैं, जिन पर सिर्फ रंग-रोगन कर लॉन्च के लिए खड़ा किया गया है। बता दें कि, भोपाल के भेल मैदान में खड़ी बसों में ऐसी पुरानी बसें दिखाई जरूर दी हैं। हालांकि, इन बसों की संख्या कितनी है, इसकी जानकारी नहीं दी गई है।

    दतिया एक साल में चौथी बार चर्चा में है। पहले राजेंद्र भारती की सदस्यता खत्म होने से उपचुनाव घोषित हुए। भाजपा ने नरोत्तम मिश्रा का टिकट काट दिया, फिर उपचुनाव हुआ और अब जीते हुए विधायक घनश्याम सिंह के निर्वाचन को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। 


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