छात्र आत्महत्याएं: हम किनके लक्ष्य ढो रहे है?

आचार्य प्रशांत : IIT बॉम्बे में इस साल छात्र आत्महत्या का यह तीसरा मामला है। इसमें जातिगत भेदभाव के आरोप भी हैं और जाँच चल रही है। जाँच में क्या तथ्य सामने आते हैं, इसे लेकर मैं पहले से कोई कयास नहीं लगाऊँगा। लेकिन विभिन्न IIT परिसरों के साथ मेरा एक लंबा जुड़ाव रहा है, और पिछले एक साल में एक दर्जन से अधिक IIT परिसरों की मेरी यात्राओं के दौरान, छात्रों ने बार-बार एक ख़तरनाक ढर्रे का ज़िक्र किया है। 2014 से 2021 के बीच, 34 IIT छात्रों ने आत्महत्या की, यानी साल में औसतन चार। 2025 में अगस्त की शुरुआत तक ही, दस IIT छात्र आत्महत्या कर चुके थे, जिनमें से चार अकेले IIT खड़गपुर से थे। इस साल अब तक कम से कम आठ IIT छात्रों की आत्महत्या की ख़बरें आ चुकी हैं, और दो अन्य मौतों की भी आत्महत्या के रूप में जाँच की जा रही है।

RTI के जवाबों और मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर IIT के एक पूर्व छात्र ने जो आँकड़े जुटाए हैं, वे बताते हैं कि 2006 से सितंबर 2026 के बीच आत्महत्या या अन्य अप्राकृतिक कारणों से कम से कम 171 IIT छात्रों की मौत हुई, जिनमें से 120 की मौत अकेले 2016 के बाद हुई है। दिसंबर 2024 से मई 2026 के बीच, BITS पिलानी के गोवा कैंपस से जुड़ी सात आत्महत्याओं की सूचना दी गई।

NCRB के अनुसार, 2024 में भारत में 14,488 छात्रों ने आत्महत्या की, जो अब तक का सबसे बड़ा आँकड़ा है, और यह 2014 में हुई 8,068 मौतों के मुकाबले लगभग 80 प्रतिशत अधिक है। पिछले एक दशक में ये आँकड़े और भी भयानक हुए हैं। सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित एक राष्ट्रीय टास्क फ़ोर्स ने पाया कि जिन संस्थानों का उसने सर्वेक्षण किया, उनमें से लगभग 65 प्रतिशत में मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों तक छात्रों की कोई पहुँच ही नहीं थी। और हर बार जब किसी छात्र की जान जाती है, तो लगभग हमेशा एक ही कारण गिनाया जाता है: बहुत ज़्यादा दबाव।
जो छात्र भेदभाव का भी सामना करता है, या जिसके पास बात करने के लिए कोई नहीं है, वह इस दबाव की दोहरी मार झेलता है। सरकार ने संसद को बताया कि 2014 से 2021 के बीच आत्महत्या करने वाले केंद्रीय संस्थानों के 122 छात्रों में से 68 अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और OBC समुदायों से थे।

अगर आप कहते हैं कि IIT और अन्य जगहों के भारी दबाव वाले माहौल के कारण बच्चे अपनी जान दे रहे हैं, तो आप केवल आधी हकीकत ही देख रहे हैं। जो छात्र JEE या कोई अन्य प्रवेश परीक्षा पास करके आया है, वह भारी दबाव का काफ़ी हद तक अभ्यस्त होता है; वरना वह कैंपस तक पहुँच ही नहीं पाता।

केवल दबाव समस्या नहीं है; समस्या वह जानलेवा स्थिति है जहाँ बाहरी दबाव का शोर भीतर की गहरी उद्देश्यहीनता के ख़ालीपन से टकराता है।

छात्र को ऐसे लक्ष्य हासिल करने के लिए मजबूर किया जा रहा है जिनसे उसे कोई लगाव नहीं है। अगर बिना दबाव के एक उद्देश्यहीन जीवन हो, तो इंसान बस किसी तरह घिसटता रहता है। बिना उद्देश्य और बिना दबाव के इंसान बस एक कटी पतंग की तरह है। ज़्यादा से ज़्यादा, जीवन व्यर्थ जाता है, लेकिन इंसान जीता रहता है, जैसा कि दुनिया की बड़ी आबादी जी रही है। अब मान लीजिए कि यह उद्देश्यहीनता तो है ही, और उसके साथ-साथ भारी दबाव भी आ जाए। यहीं आत्महत्याएँ होती हैं।

केवल दबाव जान नहीं लेता

एक ऐसे युवा के बारे में सोचिए जिसके पास कोई महान उद्देश्य हो और भारी दबाव भी हो। ऐसे व्यक्ति में जीवन के प्रति गहरा उत्साह होगा। वहाँ दबाव तो बहुत होगा, लेकिन वह कहेगा, "मैं जिऊँगा, क्योंकि मुझे अपना उद्देश्य पता है।" उद्देश्य के साथ दबाव आना तय है, और वह उस दबाव का स्वागत करेगा। जब भी कोई महान उद्देश्य चुनता है, तो वह कुछ ऐसा असाधारण काम हाथ में लेता है जिसे समाज अक्सर स्वीकार नहीं करता, समर्थन देना तो दूर की बात है। इसलिए दबाव तो होगा ही। एक महान उद्देश्य का स्वभाव ही ऐसा है कि वह अपने साथ दबाव लेकर आता है, लेकिन ऐसा दबाव जीवन-रक्षक ही नहीं, बल्कि जीवनदायी होता है, क्योंकि व्यक्ति जानता है कि उसके पास जीने के लिए कुछ बहुत बड़ा है।

सही उद्देश्य आंतरिक बोध से आता है। यह उद्देश्य किसी बच्चे को बड़ा करना हो सकता है, या किसी संस्था को खड़ा करना। दोनों ही काम बेहद कठिन हैं, लेकिन इनका दबाव उठाने लायक है। अगर ऐसे उद्देश्य वाले इंसान के सामने साक्षात मौत भी खड़ी हो, तो वह उसे भी टालने की ज़िद करेगा; असल में, वह ख़ुद को स्वस्थ रखना चाहेगा, सिर्फ़ अपने लिए नहीं, बल्कि उस लक्ष्य के लिए। यदि आपका उद्देश्य गहरा है, तो भारी दबाव कोई समस्या नहीं है। वास्तव में बिना दबाव के कोई महान उद्देश्य हो ही नहीं सकता। अगर उद्देश्य महान है, तो वह अपने आप एक दबाव पैदा करता है, और ऐसा दबाव शुभ होता है।
आज कैंपस में बैठा छात्र भारी दबाव में है, लेकिन उसे अपने उद्देश्य की कोई स्पष्ट समझ नहीं है। किसी ने कभी उससे पूछा ही नहीं कि वह यह सब क्यों कर रहा है।

यह दबाव केवल बाहरी माहौल से नहीं आ रहा। इसे भीतर उतार लिया गया है, इसलिए अब यह भीतर से भी उठ रहा है। दूसरों की उम्मीदों को इस कदर अपना मान लिया गया है कि वे अपनी ही लगने लगती हैं, और वे उसे बता रही हैं: यह हासिल करो, 9 CGPA लाओ, बेस्ट प्लेसमेंट लो। प्लेसमेंट से पहले इंटर्नशिप का मसला है; इंटर्नशिप से पहले कोर्स चुनने की होड़ है।

थोपा गया उद्देश्य

क्या यह उद्देश्यहीनता छात्र के कैंपस में प्रवेश करते ही शुरू होती है? नहीं। यह पूरी व्यवस्था ही उसका सहज आंतरिक उद्देश्य छीन लेती है।

और यह कैसे किया जाता है? उसे बाहरी, बनावटी और झूठे लक्ष्य थमाकर। जन्म से ही उसे बताया जाता है कि क्या करना है। परिवार कहता है, "अब तुम 15 साल के हो गए हो, तुम्हारे बोर्ड्स हैं, और इस साल तुम्हारा लक्ष्य 99 प्रतिशत लाना होना चाहिए।" और इस तरह वह एक तयशुदा उद्देश्य, एक थोपे गए लक्ष्य का इतना अभ्यस्त हो जाता है कि भीतर सब सुन्न पड़ जाता है।

उसे कभी यह आज़ादी ही नहीं दी गई कि वह ख़ुद से पूछ सके, "मैं कौन हूँ, और मैं यहाँ क्यों हूँ?" माता-पिता और शिक्षक शायद ही कभी इस सवाल पर बात करते हैं, इसका संतोषजनक जवाब देना तो दूर की बात है। इसके बजाय, वे उसे एक बना-बनाया और रद्दी जवाब पकड़ा देते हैं। वे कहते हैं, "तुम दुनिया में कुछ हासिल करने आए हो।" क्या हासिल करना है? "वह जो हम तुम्हें बताएँगे।" उसे किसने बताया कि किसी MNC में काम करना और मोटा पैकेज कमाना ही जीवन का लक्ष्य है? अगर उसे उसके हाल पर छोड़ दिया जाता, तो क्या वह कभी JEE में बैठने की ज़हमत उठाता? फिर भी हर कोई उससे एक ही बात कह रहा है: हासिल करो।
और यह भी ठीक होता, अगर किसी ने उसके भीतर ख़ुद जानने और सवाल पूछने की क्षमता को जगाने में मदद की होती। अगर वह क्षमता जग जाए, तो फिर इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि पूरी दुनिया उसे क्या बता रही है। तब वह सबकी राय को किनारे रखकर कह सकता है, "मैं ख़ुद जानता हूँ। मुझे आँख मूँदकर मानने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि मुझे बोध है।" लेकिन उसे दुनियादारी रटा दी जाती है, और उसे अपने दम पर कुछ भी जानने से रोका जाता है।

कैंपस में, अक्सर छात्रों को यह कहते सुना जाता है, "अरे, मुझे तो पता ही नहीं कि मुझे करना क्या है।" ऐसा इसलिए है क्योंकि उनके भीतर जो चेतना देख सकती थी, चुनाव कर सकती थी और फ़ैसले ले सकती थी, वह पंगु हो गई है। अगर आप बरसों तक किसी मांसपेशी का उपयोग नहीं करेंगे, तो उस मांसपेशी का क्या होगा? ख़त्म। जो मांसपेशी काम में नहीं लाई जाती, वह सुन्न पड़ जाती है, सिकुड़ जाती है। वह अपनी ताकत खो देती है। अब, जब सच में उस मांसपेशी को इस्तेमाल करने की ज़रूरत पड़ती है, तो वह काम नहीं करती।

यहीं से हमारी उद्देश्यहीनता आती है। इसीलिए लोग इतने भटके हुए लगते हैं। और जब इंसान भटका हुआ होता है, तो कोई भी उसे अपने हिसाब से किसी भी दिशा में हाँक सकता है। "मुझे नहीं पता क्या करना है। चलो भीड़ के पीछे चलते हैं।" मार्गदर्शन के लिए दूसरों का मुँह ताकना स्वभाव बन जाता है, जैसे कि दूसरों को सब पता हो, जैसे भीड़ में चल रहे किसी भी आदमी को पता हो कि कहाँ जाना है। और यदि आप दूसरों के बताए रास्ते पर नहीं चलते, तो आपको प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तरीकों से सज़ा दी जाती है। "ज़्यादा सयानी बन रही है, इसी में मारी जाएगी।" "यह लड़का बहुत बाग़ी हो रहा है। इसे इसकी औकात याद दिलानी पड़ेगी।"
छात्र कहता है, "अगर जीने का मतलब किसी अनजान मालिक के लिए पसीना बहाना है, तो यह कैसा अपमान है। मुझ पर थोपा गया लक्ष्य मेरा अपना नहीं है। तो, एक ग़ुलाम की तरह, मुझे उस चीज़ के लिए घिसटने को कहा जा रहा है जिसकी मुझे कोई परवाह नहीं है। मुझे मैकेनिकल इंजीनियरिंग से कोई प्यार नहीं है। सीधी सी बात है। लेकिन मुझसे 9 CGPA लाने को कहा जा रहा है।" समझा जा सकता है कि यह सब कहाँ से आ रहा है। यह प्रक्रिया जन्म से ही शुरू हो जाती है।
बच्चा दूसरों पर बहुत निर्भर होता है, इसलिए उसका बड़ी आसानी से शोषण कर लिया जाता है। हम बच्चे से कहते हैं, "अगर तुम फ़लाँ लक्ष्य हासिल नहीं करते तो तुम्हारा जीवन व्यर्थ है।" और फिर हर बच्चे को एक ही बात बताकर हम उन लक्ष्यों को इतना अवास्तविक और प्रतिस्पर्धा को इतना कड़ा कर देते हैं कि हकीकत में केवल एक प्रतिशत बच्चे ही उन्हें पा सकते हैं। बाकी 99 प्रतिशत का क्या होगा?

तो अब छात्र कैंपस आता है, उसे हासिल करने के लिए असंभव लक्ष्य दिए गए हैं, और उसे बताया गया है कि अगर वह इन्हें हासिल नहीं करता, तो जीवन अर्थहीन है। बहुत दुख की बात है कि कुछ छात्र इस बोझ तले टूट जाते हैं। अगर आप किसी ज़ंजीर के सिरों को ज़रूरत से ज़्यादा खींचेंगे, तो कोई न कोई कड़ी टूट ही जाएगी।

उम्मीद का दूसरा छोर

शीर्ष संस्थानों में असीम प्रतिभा है, लेकिन उस प्रतिभा से क्या करवाया जा रहा है? कोई कंप्यूटर साइंस में बी.टेक करके जूते बेच रहा है। इसमें कैसी सफलता है? बस इतना कि कंपनी जूते बनाने वाली एक बहुत बड़ी MNC है, इसलिए वह इस पर गर्व करता है। असल में, वह गर्व नहीं करता; उसके माता-पिता गर्व करते हैं, और पूरा समाज गर्व करता है। हम इसे सफल रोज़गार कहते हैं। हम इस पर इतराते हैं। हम कहते हैं, "मेरे बेटे को तीन करोड़ का पैकेज मिला है," और यह बात कभी-कभी अख़बारों में भी छपती है।

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