लंदन: पूर्वी इंग्लैंड में सफोक तट का दूर-दराज इलाका ऑरफोर्ड नेस , मिलिट्री इतिहास और सुरक्षित वन्यजीवों का संगम है। 2,000 एकड़ में फैला यह कंकड़-पत्थर वाला इलाका कभी कड़ी सुरक्षा वाला टेस्टिंग ग्राउंड था। यहां ब्रिटिश रिसर्चर एयरक्राफ्ट, रडार और परमाणु हथियारों की टेक्नोलॉजी पर काम करते थे। इन प्रयोगों के बाद छोड़ी हुई कंक्रीट की लैब, पुराने एयरफील्ड के दलदली इलाके और नाजुक तटीय आवास शामिल हैं, जो पक्षियों, खरगोशों और हिरणों का घर हैं। नेशनल ट्रस्ट अब इस नेचर रिजर्व का प्रबंधन करता है।
ऑरफोर्ड नेस हमेशा से मिलिट्री का ठिकाना नहीं था। नेशनल ट्रस्ट बताता है कि मध्यकाल में बढ़ते कंकड़-पत्थर वाले इलाके के पीछे खारे पानी के दलदल बन गए, जो बाद में स्थानीय समुदायों के लिए चरागाह बन गए। ज्वार के पानी को नियंत्रित करने के लिए दलदल के कुछ हिस्सों के चारों ओर दीवारें बनाई गईं, जबकि सदियों तक भेड़ें और मवेशी वहां चरते रहे।
100 साल पहले हुए टेस्ट
तटीय स्थिति के कारण इस इलाके का रणनीतिक महत्व बढ़ गया। सफोक के समुद्र तट और गहरी खाड़ियां इस क्षेत्र को हमले के प्रति संवेदनशील बनाती थीं और पास का तट संघर्षों के दौरान मिलिट्री की तैयारियों में शामिल था। निर्णायक बदलाव 1913 में आया, जब युद्ध विभाग ने ऑरफोर्ड नेस का एक बड़ा हिस्सा खरीदा और उसके तुरंत बाद पूरी साइट का अधिग्रहण कर लिया।
नेशनल ट्रस्ट के रिकॉर्ड बताते हैं कि यह जमीन मिलिट्री टेस्टिंग ग्राउंड बन गई, जहां हो रहे काम की सुरक्षा के लिए लोगों की आवाजाही पर रोक लगा दी गई। 1913 और 1916 के बीच एयरफील्ड बनाने के लिए किंग्ज मार्श के कुछ हिस्सों का पानी निकालकर जमीन को समतल किया गया। पहला एयरक्राफ्ट 1915 में आया, जिससे दशकों तक चलने वाले मिलिट्री प्रयोगों की शुरुआत हुई।
कौन-कौन से प्रयोग हुए
यह जगह हवाई जहाज की परफॉर्मेंस, हथियारों और मिलिट्री डिटेक्शन सिस्टम से जुड़े प्रयोगों के लिए अहम केंद्र थी। यहां की एक खास इमारत बॉम्ब बैलिस्टिक्स बिल्डिंग है, जो 1933 में बनकर तैयार हुई। रिसर्चर वहां बमों की उड़ान को रिकॉर्ड करने के लिए खास उपकरणों का इस्तेमाल करते थे, जिससे उन्हें यह समझने में मदद मिलती थी कि बम हवा में कैसे चलते हैं और निशाना लगाने के लिए इस्तेमाल होने वाले कैलकुलेशन को बेहतर बनाने में मदद मिलती थी।
हथियार टेस्टिंग का यह काम चार दशकों तक चला और बाद में परमाणु हथियारों से जुड़ी रिसर्च में भी योगदान दिया गया। रडार के विकास में भी ओर्फोडो नेस ने अहम भूमिका निभाई। 1935 में रॉबर्ट वॉटसन-वॉट और उनकी टीम वहां पहुंची और एक आयनोस्फेरिक रिसर्च स्टेशन स्थापित किया। इन गतिविधियों के कारण ऐसी इमारतें और इंफ्रास्ट्रक्चर बने जो आज इस जगह के पुराने मकसद बताते हैं, भले ही ज्यादातर काम कड़ी गोपनीयता के तहत किया गया था।
वन्यजीव क्यों वापस आए
ऑर्फोर्ड नेस को अब इसके इतिहास के साथ-साथ इसके इकोलॉजिकल महत्व के लिए जाना जाता है। नेशनल ट्रस्ट इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण तटीय नेचर रिजर्व बताता है, जिसमें 10 मील समुद्र तट और 2,000 एकड़ जमीन शामिल है। यह इलाका खास तौर पर अपनी वेजिटेटेड शिंगल (वनस्पति वाली कंकड़-पत्थर की जमीन) के लिए जाना जाता है। यह एक दुर्लभ तरह का प्राकृतिक आवास है, जो तब बनता है जब समुद्र लंबे समय तक पत्थरों को टीलों और घाटियों के रूप में जमा करता रहता है।
यूरोप की कुल वेजिटेटेड शिंगल का 20% हिस्सा ऑर्फोर्ड नेस में है। कंकरीले इलाकों के अलावा, तटीय चरागाह और वेटलैंड वन्यजीवों का घर हैं। नेशनल ट्रस्ट इस रिजर्व में पाए जाने वाले जानवरों में वेटलैंड और पानी के किनारे रहने वाले पक्षियों, चीनी वॉटर डियर और खरगोशों को शामिल करता है। पुराने एयरफील्ड की जमीन अब चरागाह बन गई है। यह वन्यजीवों के लिए सुरक्षित ठिकाना बताता है और हैवरगेट आइलैंड और बड़े एल्ड-ओर मुहाने के साथ जुड़ाव को उजागर करता है।
रिजर्व संरक्षण और ऐतिहासिक खोज का मेल
सैन्य इस्तेमाल खत्म होने के बाद नेशनल ट्रस्ट ने ओर्फोर्ड नेस का मालिकाना हक ले लिया, जिससे दशकों तक आम लोगों की पहुंच से दूर रही जगह को नया मकसद मिला। अब इसके कामों में आवासों का प्रबंधन, नाजुक कंकरीले इलाके की सुरक्षा और पर्यटकों को जगह के इतिहास को समझने में मदद शामिल है।
पर्यटक पुराने एयरफील्ड, दलदली इलाकों और तटीय आवासों से होकर बने तय रास्तों पर घूम सकते हैं। पौधों से ढके कंकरीले इलाके की ओर जाने से पहले पुराने एयरफील्ड वाले इलाकों से होकर गुजरता है। प्रजनन करने वाले पक्षियों की सुरक्षा के लिए कुछ अन्य रास्ते मौसम के हिसाब से खोले जाते हैं।