नई दिल्ली: राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ( NHRC ) के स्थापना दिवस कार्यक्रम में, भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत ने बड़ी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि जब संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन हो, तो अदालतों को दखल देना चाहिए। मानवाधिकार आयोगों को शिकायतों की जांच करनी चाहिए, सिस्टम की कमियों की पहचान करनी चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जिन मुद्दों पर आम तौर पर ध्यान नहीं जाता, उन पर संस्थागत स्तर पर ध्यान दिया जाए।
चीफ जस्टिस ने एनएचआरसी के कार्यों की सराहना की
उन्होंने स्पष्ट किया कि मानवाधिकार कोई अमूर्त अवधारणा नहीं हैं, बल्कि ये स्वास्थ्य, भोजन, आश्रय, आजीविका और एक स्वच्छ पर्यावरण तक पहुंच से जुड़े हैं। उन्होंने एनएचआरसी के कार्यों की सराहना करते हुए बताया कि आयोग ने पिछले 33 वर्षों में 24 लाख से अधिक मामलों का पंजीकरण किया और 98 फीसदी से अधिक की दर से 23 लाख से ज्यादा मामलों का निपटारा किया है। साथ ही, उन्होंने ‘एनएचआरसी इंडिया’ मोबाइल ऐप की शुरुआत का भी जिक्र किया, जिससे नागरिकों के लिए शिकायत दर्ज करना और ट्रैक करना आसान होगा।
मानवाधिकार आयोग संविधान के वादों का संरक्षक
मानवाधिकार आयोग को संविधान के वादों का संरक्षक बताते हुए उन्होंने कहा कि उन लोगों तक पहुंचने में इसकी भूमिका बहुत अहम है, जिन्हें अदालतों तक पहुंचने में मुश्किल होती है। उन्होंने कहा कि अगर संविधान एक वादा है, तो आयोग उसके संरक्षकों में से एक है। यह वहां तक पहुंचता है जहां अदालत आसानी से नहीं पहुंच सकती; यह उनकी बात सुनता है जो आसानी से अपनी बात नहीं कह पाते, और यह बिना किसी के कहे खुद भी कार्रवाई कर सकता है। CJI ने हाशिए पर रहने वाले समुदायों, विचाराधीन कैदियों, प्रवासी मजदूरों, बुज़ुर्गों, दिव्यांगों और महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करने के महत्व पर भी जोर दिया।