‘हर आहट पर चौंक जाना कोई जिंदगी नहीं है’

‘दृश्यम द कन्क्लूजन’ की चर्चा सब जगह है। ये मूवी बॉक्सऑफिस पर लगातार सफलता के नए रेकॉर्ड्स बना रही है। इसके पहले के दोनों पार्ट्स भी लोगों का दिल जीतने में पूरी तरह से कामयाब रहे थे। इन तीनों फिल्मों की सफलता की बड़ी वजह मजबूत स्टोरी लाइन और उसके किरदारों की नैचुरल एक्टिंग एंड डायलॉग डिलीवरी रही। तीनों ही सीरीज में थ्रिल के साथ ही जबरदस्त साइकोलॉजिकल एंगल्स देखने को मिले। इनमें मेंटल हेल्थ से जुड़े इतने सारे पक्ष दिखाए गए कि वो जाने अनजाने ही ऑडियंस के दिमाग के साथ कनेक्ट हो गए। एंग्जायटी, स्ट्रेस, पैनिक अटैक, पीटीएसडी, एक्यूट रिस्पॉन्स जैसी चीजों से जुड़े इस सीरीज की तीनों फिल्मों के डायलॉग्स से लिए गए कुछ कोट्स यहां पर शेयर किए जा रहे हैं।

जब इंसान पर कोई मुसीबत आती है…

स्ट्रेस, एंग्जायटी और पैनिक अटैक को दिखाती नंदिनी की स्थिति को विजय सलगांवकर इन शब्दों में साझा करता है: ‘जब इंसान पर कोई मुसीबत आती है या वो किसी डर के साए में जीता है ना… तब वो अपनी सूझबूझ खो बैठता है। वो सही और गलत का फर्क भूल जाता है।’

हम ठीक होने का नाटक कर सकते हैं…

घटना से जुड़ी रात का विजय की बेटी अंजू की मानसिक सेहत पर इतना गहरा असर पड़ता है कि वो उसे ट्रॉमा और पोस्ट ट्रॉमेटिक डिसऑर्डर की चपेट में ले लेता है। इसकी झलक नंदिनी के इन शब्दों में दिखी: ‘हम ठीक होने का नाटक कर सकते हैं, पर सो नहीं सकते। वो रात आज भी हमारी नींद छीन लेती है।’

साहब। मैंने अपने परिवार को सुरक्षित तो कर लिया, लेकिन…

मेंटल बर्नआउट, क्रॉनिक एंग्जायटी और पैरानोया विजय के पूरे परिवार की मेंटल हेल्थ पर किस कदर हावी हो गया था, इसका सबूत विजय के इन शब्दों में दिखा: ‘सुरक्षा और शांति में बहुत फर्क होता है साहब। मैंने अपने परिवार को सुरक्षित तो कर लिया, लेकिन उनकी मानसिक शांति हमेशा के लिए छीन ली। हर आहट पर चौंक जाना कोई जिंदगी नहीं है।’

मैं यहीं खड़ा हूं, चौकीदार बनकर…

परिवार को बचाने के लिए विजय का दिमाग हमेशा एंग्याटी से भरा रहा, जिसने उसकी मेंटल स्टेट को हाइपर-प्रोटेक्टिव शील्ड के स्टेट में पहुंचा दिया। उसके लिए नॉर्मल लोगों जैसा सोचना या जीना मुश्किल हो गया, क्योंकि वो 24 घंटे बस एक दीवार की तरह परिवार को बचाने की सोच में लगा रहा। ‘जब तक सब थक नहीं जाते, जब तक सब हार नहीं जाते… मैं यहीं खड़ा हूं, चौकीदार बनकर, पहरेदार बनकर, एक दीवार बनकर। क्योंकि कहानी अभी खत्म नहीं हुई है… आखिरी हिस्सा अभी बाकी है।’

जब किसी पर अचानक मुसीबत आती है, तो उसका दिमाग…

एक्यूट स्ट्रेस रिस्पॉन्स में फ्रीजिंग की स्थिति को बयां करते हुए विजय कहता है: ‘जब किसी पर अचानक मुसीबत आती है, तो उसका दिमाग काम करना बंद कर देता है… वही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी होती है।’

मम्मी, बाहर फिर से पुलिस की गाड़ी खड़ी है…

पिता को थाने में पीटा जाना, पुलिस का बार-बार घर आना, धमकी से भरी बातें होना आदि विजय की छोटी बेटी की मानसिक सेहत पर काफी क्रूर साबित होती है। उस पर फोबिया और हाइपरविजिलेंस कैसे हावी हो गया था, ये इन शब्दों से झलकता है:’मम्मी, बाहर फिर से पुलिस की गाड़ी खड़ी है… वो लोग हमारे घर की तरफ ही देख रहे हैं। क्या वो फिर से अंदर आएंगे?’

आज जो हुआ उससे अंजू की कंडिशन…

कोई घटना कैसे लॉन्ग टर्म में मानसिक स्थिति को बिगाड़ सकती है, इसकी झलक विजय की बड़ी बेटी के बार-बार होने वाले पैनिक अटैक में देखी जा सकती है।

जब अंजू को पुलिस की हरकतों की वजह से दोबारा पैनिक अटैक और मिर्गी का दौरा पड़ता है, तो इलाज करने वाला डॉक्टर कहता है: ‘अनफॉर्चूनेटली, आज जो हुआ उससे अंजू की कंडिशन दोबारा ट्रिगर हो गई है। मैंने मेडिकेशन दे दिया है लेकिन इस बात का खास ध्यान रखें कि उसके आस-पास का माहौल स्ट्रेस फ्री रहे… वरना ये उसके लिए काफी खतरनाक साबित हो सकता है।’

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