मौत की सजा के 90% आदेश ऊपरी अदालत में पलटे:2025 में निचली अदालतों ने 10 महिलाओं को मौत की सजा सुनाई; 10 लोग बरी हुए

यूपी के मेरठ में अक्टूबर में दो अलग-अलग मामलों में महिलाओं और उनके साथियों को पति की हत्या के लिए मौत की सजा सुनाई गई। इसके बाद सवाल उठ रहा है कि भारत में अब तक कितनी महिलाओं को मौत की सजा मिली है और कितनी महिलाओं को वास्तव में फांसी दी गई है।

नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, 2016 से 2025 के बीच निचली अदालतों द्वारा सुनाई गई मौत की सजाओं में से कई फैसले ऊपरी अदालतों में बदल गए।

भारत में सिर्फ एक महिला को लगी फांसी

रिपोर्ट के मुताबिक रतन बाई जैन आजादी के बाद देश में कानूनी फांसी पाने वाली एकमात्र महिला है। उसे तीन बच्चियों की हत्या के मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद 3 जनवरी 1955 को दिल्ली की तिहाड़ जेल में फांसी दी गई थी। अभी तक कोई दूसरी महिला भारत में फांसी नहीं चढ़ी है।

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 407 के तहत, निचली अदालत से मिली मौत की सजा को मंजूरी के लिए हाईकोर्ट भेजना जरूरी है। 2016 से 2025 के बीच हाईकोर्ट ने मौत की सजा के सिर्फ 9.77% मामलों में सजा बरकरार रखी।

निचली अदालत से मौत की सजा मिलने के बाद दोषी को तुरंत फांसी नहीं दी जा सकती। सत्र न्यायालय की सजा पर हाईकोर्ट की मंजूरी जरूरी है। इसके बाद दोषी सुप्रीम कोर्ट में अपील, समीक्षा याचिका और क्यूरेटिव याचिका दायर कर सकता है। वह राष्ट्रपति या राज्यपाल के पास दया याचिका भी लगा सकता है।

2016-25 के बीच 1,085 में से सिर्फ 106 मौत की सजा कायम

31 दिसंबर 2025 तक देश में कुल 574 लोग मृत्युदंड का इंतजार कर रहे थे। इनमें 24 महिलाएं थीं। उत्तर प्रदेश की शबनम को सात परिजनों की हत्या के लिए 2010 में मौत की सजा मिली। दया याचिकाएं भी खारिज हो चुकी हैं, पर अब तक फांसी नहीं दी गई है। सुप्रीम कोर्ट ने 2023 से 2025 के बीच किसी भी मामले में मौत की सजा की पुष्टि नहीं की।

547 दिन बाद रविता और प्रेमी को फांसी की सजा

पति की हत्या कर उसे सांप से डसवाने वाली रविता और उसके प्रेमी अमरदीप को वारदात के 547 दिन बाद मेरठ जिला कोर्ट ने फांसी की सजा सुनाई है।

इससे पहले 14 अक्टूबर को नीले ड्रम मामले में मुस्कान और उसके प्रेमी साहिल को भी फांसी की सजा सुनाई गई थी।

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