नई दिल्ली: पिछले महीने केंद्र सरकार ने राज्यों को आगाह किया था कि जमीन अधिग्रहण, पर्यावरण संबंधी मंजूरी, राज्य की अनुमतियों और यूटिलिटी शिफ्टिंग में देरी के कारण राष्ट्रीय लीनियर इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं की गति पर गंभीर असर पड़ रहा है। साथ ही, इससे परियोजनाओं की लागत भी काफी बढ़ रही है। मुख्य सचिवों के छठे राष्ट्रीय सम्मेलन से पहले राज्यों के साथ ये चिंताएं साझा की गईं। इस सम्मेलन में ‘लीनियर इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में तेजी लाने’ के विषय पर चर्चा की जाएगी।
दरअसल, भारत की 30 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य काफी हद तक केंद्रीय क्षेत्र की लीनियर इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं पर निर्भर है। ‘प्रगति’ ( PRAGATI ) प्लेटफॉर्म के जरिए किए गए परियोजनाओं के विश्लेषण से पता चलता है कि 75% देरी ‘निर्माण-पूर्व’ के चार कारकों की वजह से होती है, जिनमें जमीन अधिग्रहण/राइट ऑफ वे (काम के लिए रास्ता मिलना), पर्यावरण संबंधी मंजूरी, यूटिलिटी शिफ्टिंग और राज्य सरकार की अनुमतियां शामिल हैं।
राज्यों के साथ साझा किए गए बिंदु
- निर्माण-पूर्व चरणों में हुई देरी के कारण, केंद्रीय लीनियर परियोजनाओं की लागत 31 लाख करोड़ रुपये की मूल लागत से 3 लाख करोड़ रुपये बढ़ गई है।
- 85 लाख करोड़ रुपये मूल्य की 3300 से अधिक बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की ‘प्रगति’ समीक्षा से पता चला है कि भूमि अधिग्रहण से जुड़ी देरी सबसे बड़ी समस्या है, जो कुल समस्याओं का 35% है।
- वन मंजूरी , जो 150 दिनों के भीतर मिल जानी चाहिए, उसे मिलने में 500 दिन से अधिक का समय लग रहा है।
- वन्यजीव मंजूरी की प्रक्रिया में 1.5 से 3.5 साल तक का समय लग सकता है, जबकि पर्यावरण मंजूरी में 180 दिन से लेकर 2.5 साल तक लग सकते हैं।
- यूटिलिटी शिफ्टिंग को पूरा करने में औसतन 500-600 दिन लग रहे हैं, जबकि इसमें 200-300 दिन लगने की उम्मीद थी।
- ‘सिंगल विंडो’ व्यवस्था न होने के कारण, केंद्रीय लीनियर बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के डेवलपर्स को 16 अलग-अलग राज्य एजेंसियों से 22 तरह की मंजूरियां या परमिट लेने पड़ते हैं।
भूमि अधिग्रहण में गड़बड़ी
परियोजनाओं में देरी का सबसे बड़ा कारण भूमि अधिग्रहण है। सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय द्वारा राज्यों की ‘भूमि अधिग्रहण दक्षता’ को लेकर की गई रैंकिंग से पता चलता है कि हरियाणा 75.8 के स्कोर के साथ सबसे ऊपर है। इसके बाद मध्य प्रदेश (66.2), राजस्थान (65.9), आंध्र प्रदेश (63.8) का नंबर आता है, जबकि छत्तीसगढ़ और केरल 63 के स्कोर पर हैं। हैरानी की बात यह है कि तमिलनाडु (45.4), महाराष्ट्र (43.6) और गुजरात (30.5 के स्कोर के साथ) इस सूची में सबसे नीचे हैं। यह रैंकिंग राष्ट्रीय राजमार्गों के लिए भूमि अधिग्रहण की दक्षता के आधार पर तैयार की गई है।
ग्रीन टेप
पर्यावरण मंत्रालय के ‘परिवेश 2.0’ ( PARIVESH 2 .0) विश्लेषण से पता चलता है कि वन, वन्यजीव और पर्यावरण संबंधी मंजूरियां मिलने में राज्य और केंद्रीय एजेंसियों को मिलाकर कुल 2 से 4 साल का समय लग जाता है। केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने पर्यावरण मंजूरी के लिए अपने स्तर पर लगने वाले समय को 105 दिनों से घटाकर 61 दिन करने के लिए कई सुधार किए हैं, फिर भी ‘लीनियर प्रोजेक्ट्स’ (जैसे सड़कें, रेलवे लाइनें आदि) को मंजूरियां पाने में अभी भी ‘काफी देरी’ का सामना करना पड़ रहा है।
परमिट राज
पानी और सीवर की पाइपों, बिजली के तारों और टावरों जैसी यूटिलिटी (सुविधाओं) को हटाने का काम अभी भी एक बड़ी समस्या बना हुआ है। इसके लिए लगने वाला औसत समय 500-600 दिन है, जबकि उम्मीद 200-300 दिनों की होती है। इसके अलावा, प्रोजेक्ट साइटों, निर्माण सामग्री और उपकरणों के लिए राज्य सरकारों से लेनी पड़ने वाली ढेरों अनुमतियां भी एक और बड़ी अड़चन हैं।