नोगाया: एशियन गेम्स 2026 में कुमकुम ने धीरज बोम्मादेवरा के साथ मिलकर मिश्रित रिकर्व टीम स्पर्धा में भी ऐतिहासिक रजत पदक हासिल किया। फाइनल में भारतीय जोड़ी को चीन के हाथों 3-5 (34-38, 35-37, 37-36, 37-37) से हार का सामना करना पड़ा। पूरे दिन शानदार प्रदर्शन कर रही कुमकुम फाइनल में अपने सर्वश्रेष्ठ लय में नहीं दिखीं। उन्होंने केवल एक बार 10 अंक हासिल किए, जबकि कई बार आठ और एक बार सात अंक भी हासिल किए। वहीं चीन की मेंगकी ली ने पांच बार 10 अंक हासिल कर अपनी टीम की जीत पक्की की।
सेमीफाइनल में जापान को हराया
कुमकुम और धीरज ने इससे पहले मिश्रित रिकर्व स्पर्धा के सेमीफाइनल में जापान को 5-3 से हराकर फाइनल में प्रवेश किया था। भारतीय जोड़ी ने धीमी शुरुआत करते हुए पहला सेट 37-38 से गंवाया, लेकिन दूसरे सेट में बराबरी हासिल की। इसके बाद तीसरा सेट जीतकर भारत ने स्कोर 3-3 कर दिया। चौथे सेट में जापान की ओर से सात अंक का एक खराब निशाना भारतीय जोड़ी के लिए निर्णायक साबित हुआ। धीरज और कुमकुम ने 37-35 से सेट जीतकर रिकर्व मिश्रित टीम स्पर्धा में पहली बार एशियाई खेलों के फाइनल में भारत की जगह पक्की की।
कौन हैं कुमकुम?
कुमकुम अनिल मोहोद का जन्म महाराष्ट्र में हुआ था। उन्होंने देश के कॉम्पिटिटिव आर्चरी सिस्टम में आगे बढ़कर खुद को इंडिया की होनहार रिकर्व आर्चर में से एक बनाया। उन्होंने नेशनल लेवल की ट्रेनिंग से अपनी स्किल्स डेवलप कीं और डोमेस्टिक रैंकिंग टूर्नामेंट और सिलेक्शन ट्रायल में लगातार इम्प्रेस किया, जिससे उन्हें इंडियन नेशनल रिकर्व विमेंस टीम में जगह मिली। उन्होंने 2025 में अपना इंटरनेशनल डेब्यू किया और तब से आर्चरी वर्ल्ड कप स्टेज और कॉन्टिनेंटल इवेंट्स सहित बड़े इंटरनेशनल कॉम्पिटिशन में इंडिया को रिप्रेजेंट किया है। अपने पूरे इंटरनेशनल करियर में, कुमकुम अनिल मोहोद ने 2 इंटरनेशनल मेडल जीते हैं और दोनों गोल्ड रहे हैं।
रामायण देखकर आर्चरी में आए धीरज
धीरज का जन्म 3 सितंबर 2001 को विजयवाड़ा, आंध्र प्रदेश में हुआ था। बचपन में टीवी पर रामायण और महाभारत में तीरंदाजी देखकर उनके मन में इस खेल का शौक जगा। इसे देख उनके पिता श्रवण कुमार ने उन्हें मात्र 5 साल की उम्र में बांस का पहला धनुष-बाण लाकर दिया था। साल 2017 में धीरज के परिवार के सामने एक बड़ा आर्थिक संकट आया, जब उनके परिवार द्वारा चलाया जा रहा छोटा स्कूल बंद हो गया। उस समय प्रोफेशनल तीरंदाजी के उपकरण (बो) बहुत महंगे थे, और पैसों की तंगी के कारण धीरज खेल छोड़ने वाले थे। तब उनकी मां रेवती ने अपना मंगलसूत्र और गहने बेच दिए ताकि धीरज को ₹56,000 का पुराना (सेकंड-हैंड) रिकर्व बो दिलाया जा सके।
मां को लौटाए गहने
विजयवाड़ा की ‘चेरुकुरी वोल्गा आर्चरी एकेडमी’ में शुरुआती ट्रेनिंग के दौरान हालात इतने खराब थे कि तीन आर्चर्स को सिर्फ 24 तीरों को आपस में शेयर करके अभ्यास करना पड़ता था। इसके बाद उन्होंने पुणे के ‘आर्मी स्पोर्ट्स इंस्टीट्यूट’ में ट्रेनिंग ली। साल 2021 में धीरज भारतीय सेना में शामिल हुए, जिससे उनकी आर्थिक समस्या खत्म हुई और उन्होंने अपने माता-पिता के त्याग को बेकार नहीं जाने दिया। बाद में उन्होंने अपनी पहली कमाई से मां के बिके हुए गहने वापस खरीदे और माता-पिता को एक नया घर भी उपहार में दिया।