भोपाल। इतवारा की तंग गली आज जंगे आजादी के पहले हीरो मौलाना बरकतुल्लाह भोपाली को भूल चुकी है। इसी गली के कोने पर उनका खपरैल वाला मकान हुआ करता था, जो अब तीन मंजिला बन चुका है। पास में रहने वाले गुड्डू भाई बताते हैं कि यहां अमरूद के पेड़ हुआ करते थे। बचपन में हम अक्सर यहां अमरूद तोड़ने जाया करते थे और उनके परिवार के बुजुर्ग हमें समझाया करते थे।
उनके परिवार की एक महिला मकान बिकने के बाद भी यहां आई थी और इस मकान को मौलाना बरकतुल्लाह भोपाली के नाम से संग्रहालय बनाना चाहती थी, लेकिन यह संभव नहीं हो सका। समय के साथ, यहां कोई भी उन्हें सीधे तौर पर नहीं जानता है। उनके परिवार के कुछ सदस्य आज भी शाहजहांनाबाद और मोती मस्जिद के पास निवास करते हैं।
मौलाना बरकतुल्लाह पर दो किताबें लिखी गईं
मौलाना बरकतुल्लाह भोपाली पर दो किताबें लिखी गई हैं। एक एम. इरफान साहब ने और दूसरी कै. वजदुल हुसैनी ने। हाजी साहब लिखते हैं कि मौलाना ने जब पढ़ाई की शुरुआत की, तब पाठशालाओं का सिलसिला चल रहा था, लेकिन ब्रिटिश संस्कृति का प्रभाव पूर्वी सभ्यता तक नहीं पहुंचा था।
मौलाना ने कुरआन शरीफ भी हिफ्ज किया था। मुल्ला रमूजी ने अपनी किताब में एक दिलचस्प किस्सा लिखा है कि शिक्षण काल में उनकी याददाश्त बहुत अच्छी थी।
काजी अब्दुल हक़ साहब ने उन्हें कुरआन कंठस्थ करने का सुझाव दिया, जिसे मौलाना ने बिना किसी उस्ताद की निगरानी के किया। छह महीने बाद रमजान में तरावीह में कुरआन सुनाकर सबको हैरत में डाल दिया।
क्रांति के समय मौलाना बरकतुल्लाह को धर्मगुरुओं और विद्वानों की शागिर्दी प्राप्त हुई। एम. इरफान किताब में लिखते हैं कि जब नवाब सिद्दीक हसन खां पहली बार भोपाल आए, तो इसी हुज़रे में ठहरे थे।
भोपाल का नाम रोशन किया
मौलाना बरकतुल्लाह भी यहीं ठहरे और आगे चलकर भारत की अंतरिम निर्वासित सरकार के प्रधानमंत्री बने। मौलाना ने ज्ञान की प्यास और राजनीति के प्रति लगाव के साथ बड़े विद्वानों की श्रेणी में स्थान बनाया। उनके फ़ारसी के उस्ताद मौलाना सैय्यद अब्दुल्ला पंजाबी थे।
इमाम अब्दुल अजीज साहब से कुरआन की तफसीर पढ़ी। दर्शनशास्त्र की शिक्षा काजी अब्दुल हक़ साहब से प्राप्त की। आगे चलकर मौलाना बरकतुल्लाह भोपाली ने विभिन्न विश्वविद्यालयों में अध्यापन कार्य किया और भोपाल का नाम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रोशन किया।