इस्लामाबाद: हेग स्थित ‘परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन’ (PCA) ने सर्वसम्मति से यह फ़ैसला सुनाया है कि सिंधु जल संधि (IWT) को ‘स्थगित’ (abeyance) करने का भारत का फैसला अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत जायज नहीं था और इसका कोई कानूनी असर नहीं था। इस ट्रिब्यूनल की अध्यक्षता प्रोफेसर शॉन डी. मर्फी कर रहे थे जिसमें बेल्जियम, अमेरिका, जॉर्डन और ऑस्ट्रेलिया के जज शामिल थे। इसने 31 अगस्त को कहा कि न तो संधि और न ही अंतरराष्ट्रीय कानून एकतरफा तौर पर इसे रोकने या खत्म करने का कोई आधार देते हैं।
इसने कहा कि संधि पूरी तरह से लागू रहेगी। लेकिन भारत ने आधिकारिक तौर पर कहा है कि वह ‘कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन’ के अस्तित्व को नहीं मानता है और इसलिए उसका मानना है कि इसके आदेशों का कोई असर नहीं है। भारत ने पाकिस्तान के साथ सिंधु जल संधि को रोकने के फैसले को रद्द करने वाले ‘परमानेंट कोर्ट ऑफ़ आर्बिट्रेशन’ के आदेश को खारिज कर दिया। भारत का कहना है कि ‘गैर-कानूनी ढंग से गठित’ इस संस्था को नई दिल्ली के संप्रभु फैसलों पर टिप्पणी करने का कोई अधिकार नहीं है।
सिंधु जल संधि पर क्यों बेबस हो चुका है पाकिस्तान?
पाकिस्तान ने खूब हाथ पैर मारे हैं लेकिन भारत का रूख साफ है कि ‘खून और पानी साथ नहीं बह सकते।’ इसीलिए पाकिस्तान के पास कोई और विकल्प नजर नहीं आ रहे हैं। कोर्ट ने पाया है कि संधि किसी एक पक्ष को इसे एकतरफा रूप से सस्पेंड या खत्म करने की इजाजत नहीं देती है। इसके बजाय यह तब तक लागू रहती है जब तक भारत और पाकिस्तान दोनों किसी नई संधि के जरिए इसमें बदलाव करने या इसे खत्म करने पर सहमत न हों।
सिंधु संधि पर भारत के कड़े रुख से पाकिस्तान परेशान
पाकिस्तान के नेता और सरकार ने भारत के फैसले को ‘युद्ध की कार्रवाई’ बताया है। पाकिस्तानी नेताओं ने मिसाइल मारकर बांधों को तोड़ने की धमकी दी है। लेकिन वो ऐसा करने की गुस्ताखी नहीं कर सकते हैं। वो ऑपरेशन सिंदूर में भारत का रौद्र रूप देख चुके हैं। इसीलिए पाकिस्तान बेबस है कि अब आखिर वो क्या करे। पाकिस्तान के रिटायर्ड सैन्य अधिकारी पहले ही कह चुके हैं कि भारत अगर हेग कोर्ट के फैसले को मानने से इनकार कर देता है तो देश के सामने कोई और विकल्प नहीं बचेंगे।