एमपी हाईकोर्ट की SIT को फटकार, आदिवासियों के शोषण पर कागजी रिपोर्ट देख बोले जज- ‘एसी कमरों से बाहर निकलें अफसर’

श्योपुर: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने राज्य के श्योपुर, गुना और अशोकनगर जिलों में अनुसूचित जनजाति समुदाय के लोगों की जमीनों पर अवैध कब्जे और उन्हें बंधुआ मजदूर बनाने के आरोपों की जांच कर रही विशेष जांच टीम की कार्यप्रणाली पर बेहद तीखी नाराजगी जताई है। जस्टिस जी.एस. अहलूवालिया और जस्टिस पुष्पेंद्र यादव की खंडपीठ ने एसआईटी की स्टेटस रिपोर्ट को महज एक छलावा करार देते हुए कहा कि ऐसा लगता है कि अफसर अपनी जिम्मेदारी से भागना चाहते हैं।

‘एसी कमरों से बाहर नहीं निकलना चाहते अफसर’

अदालत ने बेहद तल्ख लहजे में कहा, ‘यह वाकई चौंकाने वाला है कि यह कोर्ट आदिवासियों के संभावित शोषण को लेकर लगातार चिंता जता रहा है, लेकिन राज्य के अधिकारी अपने एसी कमरों से बाहर निकलने को तैयार नहीं हैं।’ कोर्ट ने पाया कि एसआईटी ने धरातल पर जाकर कोई फिजिकल सर्वे नहीं किया। जांचकर्ताओं ने यह भी देखने की जहमत नहीं उठाई कि आदिवासियों की जमीन की रजिस्ट्री और पावर ऑफ अटॉर्नी किसने करवाई, जमीन पर असल कब्जा किसका है और क्या फसल बेचने के बाद पैसे आदिवासी किसानों के खातों तक पहुंचे भी या नहीं।

क्या है पूरा मामला?

दरअसल, यह पूरा मामला एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका से शुरू हुआ था, जो बाद में जनहित याचिका में बदल गया। कोर्ट ने एक ऐसे बड़े नेक्सस को नोटिस किया, जहां भोले-भाले आदिवासियों को पहले अपनी जमीनें रसूखदारों को बेचने के लिए मजबूर किया जाता है और बाद में उन्हें उन्हीं की जमीन पर बंधुआ मजदूर बना दिया जाता है। साल 2024 में ही श्योपुर कलेक्टर ने पत्र लिखकर इस गंभीर मुद्दे की तरफ इशारा किया था, लेकिन राजस्व अधिकारियों ने आदिवासियों की जमीन बचाने वाली बेहद अहम धारा 170-बी को लागू करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई।

अब जमीन पर होगी जांच

हाई कोर्ट के कड़े रुख को देखते हुए अतिरिक्त महाधिवक्ता विवेक खेड़कर ने कोर्ट को भरोसा दिलाया कि अब कागजी खानापूर्ति बंद होगी। एसआईटी की टीम सीधे प्रभावित गांवों में जाएगी, आदिवासी परिवारों से सीधे संवाद करेगी और हर एक मामले की बारीकी से जांच कर एक नई और तथ्यात्मक रिपोर्ट तैयार करेगी। अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 6 जुलाई की तारीख तय की है। इसके साथ ही कोर्ट ने शिवपुरी में 111 करोड़ रुपये के सीवरेज प्रोजेक्ट के चालू न होने और झीलों में गंदा पानी गिरने पर भी अफसरों को कड़ी फटकार लगाई है।

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