नई दिल्ली: भारत में फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट (FCRA) उन कानूनों में से एक है जो हर कुछ सालों में चर्चा का विषय बन जाता है। लेकिन क्यों? इस कानून को लेकर बार-बार बहस होती रही है कि भारत को विदेशी फंडिंग की जांच-पड़ताल और NGO, अन्य सिविल सोसाइटी संगठनों की स्वायत्तता के बीच कैसे संतुलन बनाना चाहिए। ऐसे में इसी साल मार्च में फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) अमेंडमेंट बिल, 2026 लोकसभा में पेश किया गया। इस बिल में विदेशी योगदान और संपत्ति के प्रबंधन के लिए एक नया ढांचा प्रस्तावित करता है, जिसमें किसी संगठन का रजिस्ट्रेशन रद्द कर दिया जाता है, सरेंडर या समाप्त हो जाता है।
फिर चर्चा में FCRA Bill
सरकार का कहना है कि इन बदलावों का मकसद प्रशासनिक और कानूनी कमियों को दूर करना है। वहीं आलोचक प्रस्तावित शक्तियों के दायरे पर सवाल उठाते रहे हैं। हालांकि, विपक्ष का तर्क है कि प्रस्तावित बदलाव सरकार को बहुत ज्यादा शक्तियां देते हैं और इससे सरकार चैरिटेबल संगठनों की ओर से दशकों में बनाई गई संपत्तियों पर नियंत्रण कर सकती है। उनका ये भी आरोप है कि FCRA बिल अल्पसंख्यकों को दुश्मन मानता है और उनकी संपत्तियां छीनने पर आमादा है।
इस संबंध में डीएमके सांसद पी. विल्सन ने तर्क दिया है कि इन बदलावों का ईसाई संस्थानों पर बहुत ज्यादा असर पड़ सकता है जो कल्याणकारी कार्यों के लिए विदेशी चंदे का इस्तेमाल करते हैं। तो, FCRA Bill 2026 में असल में क्या बदल रहा है। यह बिल पर विवाद क्यों हो गया है? विदेशों से पैसा पाने वाले हजारों संगठनों के लिए इस बिल का क्या मतलब है
FCRA क्या है?
फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट, जिसे आमतौर पर FCRA के नाम से जाना जाता है, यह तय करता है कि भारत में व्यक्ति, ट्रस्ट, NGO, संगठन और कंपनियां विदेशी स्रोतों से पैसा, सिक्योरिटी या अन्य योगदान कैसे प्राप्त कर सकते हैं और उनका इस्तेमाल कैसे कर सकते हैं। अमित शाह के नेतृत्व वाले गृह मंत्रालय की ओर से संचालित यह कानून विदेशी चंदे पर रोक नहीं लगाता है। इसके बजाय, यह तय करता है कि कौन इसे प्राप्त कर सकता है, इसका हिसाब-किताब कैसे रखा जाना चाहिए और इसे कहां खर्च किया जा सकता है।
नया कानून क्यों जरूरी?
- इस कानून के तहत, जो भी संगठन नियमित विदेशी फंडिंग प्राप्त करना चाहता है, उसे गृह मंत्रालय से FCRA रजिस्ट्रेशन लेना होगा।
- जो संगठन किसी खास मकसद के लिए एक बार का अनुदान प्राप्त कर रहे हैं, वे इसके बजाय पहले अनुमति ले सकते हैं।
- इसमें मिलने वाले हर रुपये को एक तय बैंक अकाउंट से गुजरना होता है, उसका ऑडिट होता है और सरकार को हर साल उसकी रिपोर्ट देनी होती है।
- ये कानून चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों, विधायकों, जजों, सरकारी कर्मचारियों, समाचार रिपोर्टिंग से जुड़े अखबार के संपादकों और राजनीतिक दलों के विदेशी चंदा लेने पर भी पूरी तरह रोक लगाता है।
सरकार का क्या कहना है?
सरकार का तर्क है कि ऐसा सिर्फ भारत में ही नहीं हो रहा है। गृह मंत्रालय ने अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा में विदेशी प्रभाव से जुड़े रजिस्ट्रेशन सिस्टम का हवाला देते हुए कहा है कि इस तरह की निगरानी सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है। हालांकि, इन सिस्टम का दायरा अलग-अलग है और ये FCRA के तहत विदेशी चंदे पर व्यापक नियमन के सीधे तौर पर बराबर नहीं हैं।
FCRA: कानून जो धीरे-धीरे और सख्त होता गया
- भारत ने सबसे पहले 1976 में इमरजेंसी के दौरान FCRA कानून बनाया था।
- उस समय भी मुख्य चिंता घरेलू राजनीति और संस्थाओं पर विदेशी प्रभाव की थी।
- 2010 में इस ढांचे में बड़े बदलाव किए गए, जब संसद ने पुराने कानून की जगह मौजूदा FCRA कानून लागू किया।
- सबसे बड़े बदलावों में से एक था पांच साल के लिए मान्य रजिस्ट्रेशन सिस्टम शुरू करना, जिसके बाद संगठनों को अपने लाइसेंस का रिन्यूअल कराना होता था।
- 2020 में इस कानून में सबसे अहम बदलावों में से एक किया गया, जिसके तहत विदेशी फंड पाने वाले संगठनों के लिए जरूरी कर दिया गया कि वे सारा चंदा नई दिल्ली में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की एक ही शाखा के जरिए लें।
- इसमें प्रशासनिक खर्च की सीमा 50 फीसदी से घटाकर 20 फीसदी कर दी गई। संगठनों पर विदेशी फंड को दूसरे NGO को ट्रांसफर करने पर भी रोक लगा दी गई, साथ ही पदाधिकारियों को आधार या पासपोर्ट की जानकारी देनी पड़ी।
- लगातार हुए संशोधनों ने रिपोर्टिंग की जरूरतों और कामकाज से जुड़ी पाबंदियों, दोनों को और सख्त बना दिया है।
- 2026 का बिल इस ढांचे का दायरा सामान्य नियमों के पालन से आगे बढ़ाकर, किसी संगठन का रजिस्ट्रेशन खत्म होने पर उसकी संपत्ति के प्रबंधन और निपटान तक ले जाता है।
2026 के बिल में क्या प्रस्ताव है
- इस बिल का मुख्य प्रावधान उन संगठनों से जुड़ा है जिनका FCRA रजिस्ट्रेशन खत्म हो जाता है।
- अभी, किसी संगठन का FCRA रजिस्ट्रेशन तब खत्म हो सकता है जब सरकार कानून के उल्लंघन के कारण उसे रद्द कर दे।
- या संगठन खुद उसे सरेंडर कर दे, या रजिस्ट्रेशन का नवीनीकरण न कराया जाए।
- 2026 का बिल औपचारिक रूप से सर्टिफिकेट के समाप्त होने की अवधारणा पेश करता है। ऐसा तब होगा जब कोई संगठन नवीनीकरण के लिए आवेदन न करे, नवीनीकरण की समय-सीमा चूक जाए या उसका नवीनीकरण आवेदन खारिज हो जाए।
- यह बदलाव इसलिए अहम है क्योंकि बिल FCRA सर्टिफिकेट के खत्म होने को विदेशी फंड से बनी संपत्ति के भविष्य से जोड़ता है।
- प्रस्तावित कानून एक खास अथॉरिटी बनाता है जो विदेशी चंदे और उस चंदे से बनी संपत्ति का जिम्मा संभालेगी, जब भी किसी संगठन का रजिस्ट्रेशन रद्द होगा, सरेंडर किया जाएगा या समाप्त हो जाएगा।
- शुरुआत में, एसेट्स (संपत्ति) का ट्रांसफर अस्थायी होगा। अगर संगठन बाद में अपना रजिस्ट्रेशन बहाल या रिन्यू कराने में सफल हो जाता है, तो बिना इस्तेमाल किए गए विदेशी योगदान और एसेट्स वापस कर दिए जाएंगे।
- हालांकि, अगर संगठन तय समय के भीतर अपना रजिस्ट्रेशन वापस पाने में नाकाम रहता है, तो यह ट्रांसफर स्थायी हो जाएगा।
- तब तय अथॉरिटी के पास उन एसेट्स को मैनेज करने, उन्हें केंद्र या राज्य सरकार के विभागों को ट्रांसफर करने या बेचकर उनका निपटान करने का अधिकार होगा।
- ऐसे निपटान से मिली रकम और बचे हुए विदेशी योगदान को भारत के कंसोलिडेटेड फंड (भारत की संचित निधि) में जमा किया जाएगा।
नए बिल के क्या हैं अहम प्रावधान
दिलचस्प बात यह है कि बिल इस एक्ट के उल्लंघन के लिए अधिकतम सजा को पांच साल की जेल से घटाकर एक साल कर देता है; सरकार इसे लागू करने के लिए अधिक उचित तरीका बताती है। एक और प्रावधान कहता है कि केंद्र सरकार की पूर्व मंजूरी के बिना इस एक्ट के तहत किसी अपराध की जांच शुरू नहीं की जा सकती। मंत्रालय का कहना है कि इससे केंद्रीय कानून के तहत कई जांचों को रोका जा सकेगा; बिल ऐसी मंजूरी देने के लिए कोई पैमाना या समय-सीमा नहीं बताता है।