वॉशिंगटन: वैज्ञानिकों ने मंगल ग्रह पर निर्माण के लिए ‘लिविंग’ निर्माण सामग्री तैयार की है। इसमें निष्क्रिय रेत को जिलेटिन-आधारित हाइड्रोजेल और इंजीनियर किए गए यीस्ट कोशिकाओं के साथ मिलाया गया है। इस सामग्री को मंगल जैसी स्थितियों में प्रोसेस और प्रिंट किया जा सकता है। ये नतीजे भविष्य के मंगल मिशनों के लिए कम ऊर्जा वाली, दोबारा इस्तेमाल होने योग्य निर्माण सामग्री का एक संभावित रास्ता दिखाते हैं। ऐसे में वैज्ञानिक इसे काफी उम्मीद की नजर से देख रहे हैं।
केम सर्कुलैरिटी में प्रकाशित इंजीनियर्ड लिविंग बिल्डिंग मटीरियल फॉर लो-एनर्जी कंस्ट्रक्शन ऑन मार्स (मंगल पर कम ऊर्जा वाले निर्माण के लिए इंजीनियर की गई जीवित निर्माण सामग्री ) शीर्षक वाले शोध के अनुसार, इस सामग्री को मंगल जैसी स्थितियों में प्रोसेस और प्रिंट किया जा सकता है। इसके लिए पारंपरिक रेगोलिथ सिंटरिंग (जिसमें खनिज सामग्री को 1,000°C तापमान पर गर्म किया जाता है) की तुलना में बहुत कम ऊर्जा की आवश्यकता होती है। रीसाइक्लिंग प्रयोगों में ईंटों से कुचली हुई सामग्री का उपयोग नई ईंटें बनाने के लिए किया गया। इसमें उनकी मजबूती और यीस्ट की जीवित रहने की क्षमता बरकरार रही।
कैसे बनाई गई ये सामग्री
शोधकर्ताओं ने निष्क्रिय रेत और पानी-आधारित जिलेटिन और इंजीनियर किए गए यीस्ट हाइड्रोजेल बाइंडर का उपयोग करके मंगल के लिए जीवित निर्माण सामग्री (MLBM) विकसित की है। इसके परीक्षणों में मिश्रण को पहले सामान्य स्थितियों में सेट किया गया और फिर 48 घंटों के लिए -55°C तापमान और 0.0001 atm दबाव पर फ्रीज-ड्राई किया गया। जैसे-जैसे प्रक्रिया आगे बढ़ी, पानी जमा और फिर वाष्प में बदल गया, जबकि जिलेटिन क्रॉसलिंकिंग ने रेत के कणों के चारों ओर एक छिद्रपूर्ण ढांचा (स्कैफोल्ड) बनाया। इंजीनियर की गई ‘सैकरोमाइसेस सेरेविसिया’ कोशिकाओं ने अपनी सतह पर चिपकने वाले प्रोटीन दिखाए और वे ढांचे की दीवारों में समा गईं।
कैसे बनेगी मजबूती
इंजीनियर किए गए यीस्ट ने जिलेटिन के साथ मिलकर सामग्री को मजबूत बनाया। सबसे मजबूत फॉर्मूलेशन में इंजीनियर किए गए ScA-M स्ट्रेन का उपयोग किया गया और इसमें हाइड्रोसोल में मिलाए गए कुल ठोस पदार्थों का 25% जैविक घटक था। इसने 12 MPa की कंप्रेसिव स्ट्रेंथ (दबाव सहने की क्षमता) और 6 MPa की फ्लेक्सुरल स्ट्रेंथ (मुड़ने पर सहने की क्षमता) प्रदान की। साथ ही बेंचमार्क हाइड्रोजेल-आधारित कंक्रीट की तुलना में बेहतर मजबूती दी। माइक्रोस्कोपिक विश्लेषण से पता चला कि यीस्ट कोशिकाओं ने छोटे, अधिक एकसमान और बेहतर ढंग से जुड़े हुए छिद्र बनाने में मदद की। AGA2-डिस्प्ले करने वाले यीस्ट ने भी इस स्ट्रक्चरल सुधार में योगदान दिया।
निर्माण सामग्री को रीसायकल करना
स्टडी में यह भी जांच की गई कि क्या MLBM को बहुत कठिन परिस्थितियों के संपर्क में आने के बाद दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है। शोधकर्ताओं ने बायोलॉजिकल घटकों और ScA से बनी असली मदर ब्रिक्स (मूल ईंटों) को तोड़ा और फिर उससे मिली सामग्री का इस्तेमाल करके नई ईंटें बनाईं। उन्होंने जेल और रेत दोनों को रीसायकल करने के साथ-साथ फ्रीज-ड्राइड बायो-जेल से यीस्ट कोशिकाओं को रिकवर करने का भी परीक्षण किया।
दोनों तरीकों से सामग्री के मैकेनिकल गुण बने रहे और बार-बार रीसायकल करने के बावजूद यीस्ट कोशिकाएं जीवित रहीं। लेखकों का सुझाव है कि थर्मल प्रोसेसिंग के दौरान बाइंडर एक रिवर्सिबल सोल-जेल ट्रांजिशन से गुजरता है, जिससे यह फ्रीज-ड्राइंग के दौरान क्रॉसलिंक हो पाता है। हालांकि अभी रेडिएशन सहने की क्षमता, थर्मल कंडक्टिविटी, टिकाऊपन और बड़े पैमाने पर निर्माण के दौरान प्रदर्शन देखा जाना शामिल है।