विश्व साइकिल दिवस: ऑस्ट्रिया से सीखे बिना अधूरा रहेगा भारत में सुरक्षित ‘साइकिल सफर’ का सपना

भोपाल। आज 3 जून है, विश्व साइकिल दिवस। भारत में हमारे लिए साइकिल अक्सर बचपन की यादों, सुबह की कसरत या फिर किसी की आर्थिक मजबूरी का साधन बनकर रह जाती है। लेकिन जब आप यूरोपीय देशों, खासकर ऑस्ट्रिया की सड़कों, इंफ्रास्ट्रक्चर और सार्वजनिक परिवहन की व्यवस्था को करीब से देखते हैं, तो समझ आता है कि साइकिलिंग सिर्फ एक सवारी नहीं, बल्कि एक उन्नत, पर्यावरण-अनुकूल और बेहद संवेदनशील नागरिक सभ्यता की पहचान है।हाल ही में मेरी ऑस्ट्रिया देश की यात्रा में जब वहां के पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम को करीब से देखा तो यकीन नहीं हुआ कि वहां की सरकार बारीक से बारीक चीज का कितना ध्यान रखती है। भारतीय शहरों में ‘सस्टेनेबल अर्बन ट्रांसपोर्ट’ और प्रदूषण-मुक्त सड़कों का सपना तब तक अधूरा रहेगा, जब तक हम ऑस्ट्रिया जैसे देशों के प्रैक्टिकल मॉडल को अपनी नीतियों में लागू नहीं करते। आइए, आज इस विशेष मौके पर समझते हैं कि साइकिलिंग को लेकर दुनिया कहां खड़ी है और हमें अपनी सोच और सिस्टम में क्या बड़े बदलाव करने होंगे।

इंफ्रास्ट्रक्चर की जमीनी हकीकत: ऑस्ट्रिया बनाम भारत

एक पत्रकार के रूप में जब मैं ऑस्ट्रिया के यातायात ढांचे की तुलना भारतीय शहरों से करता हूं, तो जमीनी हकीकत का बड़ा अंतर साफ नजर आता है। भारत में साइकिलिंग को कभी भी मुख्यधारा के शहरी नियोजन यानि अर्बन प्लानिंग का हिस्सा माना ही नहीं गया, जबकि यूरोप ने इसे अपनी लाइफलाइन बना लिया है।
1. बाधारहित पृथक लेन बनाम ‘खंभा’ ट्रैक
ऑस्ट्रिया में साइकिल चालकों के लिए मुख्य सड़क के समानांतर बिल्कुल अलग और सुरक्षित ट्रैक बने हैं। इन ट्रैकों पर किसी भी मोटर वाहन या पैदल चलने वाले का आना प्रतिबंधित है। सबसे बड़ी बात यह है कि ये ट्रैक 100% बाधारहित हैं। इसके विपरीत, भारत में पहली बात तो साइकिल ट्रैक नाममात्र के हैं। जो थोड़े-बहुत बनाए भी जाते हैं, उनकी प्लानिंग इतनी खराब होती है कि ट्रैक के बीच में अचानक बिजली या टेलीफोन का खंभा आ जाता है। कहीं निगम की लापरवाही से गड्ढे होते हैं, तो कहीं रातों-रात कोई गुमठी (दुकान) सज जाती है या अवैध पार्किंग का कब्जा हो जाता है। ऐसे में साइकिल सवार जान जोखिम में डालकर मुख्य सड़क पर आने को मजबूर होता है।
2. पब्लिक ट्रांसपोर्ट से जुड़ाव: ट्रेन में साइकिल का रिजर्व सफर
ऑस्ट्रिया की सबसे कमाल की व्यवस्था जो मुझे प्रभावित कर गई, वह है साइकिल का पब्लिक ट्रांसपोर्ट के साथ बेहतरीन तालमेल। वहां आप अपनी साइकिल को लेकर सब-वे , रीजनल ट्रेनों और इंटरसिटी बसों में आसानी से सफर कर सकते हैं। इसके लिए हर बस और ट्रेन का सबसे आखिरी हिस्सा विशेष रूप से आरक्षित रहता है, जहां साइकिल लाक करने के हुक लगे होते हैं। भारत में मेट्रो या सिटी बसों में साइकिल के साथ यात्रा करने की फिलहाल कोई एकीकृत या सुलभ व्यवस्था नहीं है, जिससे लंबी दूरी तय करने वाले साइकिल चालकों को कोई मदद नहीं मिलती।
3. स्मार्ट पार्किंग: मुफ्त ‘हैंगिंग स्टैंड’ बनाम ‘प्रीमियम वसूली’
ऑस्ट्रिया के किसी भी सब-वे स्टेशन, बस स्टैंड या सार्वजनिक स्थल पर चले जाइए, वहां आपको सैकड़ों साइकिलें व्यवस्थित तरीके से टंगी हुई मिलेंगी। वहां मुफ्त ‘हैंगिंग स्टैंड्स’ की व्यवस्था है, जहां आप साइकिल लाक कीजिए, अपने काम पर जाइए और लौटकर सुरक्षित अपनी साइकिल से घर चले जाइए। इसके उलट, भारत में केवल चुनिंदा बड़े रेलवे स्टेशनों पर ही वाहन रखने की व्यवस्था होती है। वहां भी साइकिल रखने के लिए भारी-भरकम प्रीमियम शुल्क देना पड़ता है, और सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं होती। पब्लिक ट्रांसपोर्ट स्टेशन पर तो यह व्यस्था पूरी तरह नदारद है।

वैश्विक नजरिया: जहां साइकिलिंग ‘स्टेटस सिंबल’ नहीं, ‘संस्कार’ है

यूरोप के अधिकांश देशों में साइकिल चलाना सिर्फ सड़कों की बुनावट तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वहां के सामाजिक व्यवहार और ‘संस्कार’ का हिस्सा बन चुका है। वहां की सड़कों पर एक अलग ही अनुशासन और संवेदनशीलता दिखाई देती है। वहां कार नहीं, साइकिल है सड़क की ‘वीआईपी’ सवारी।
ऑस्ट्रिया, जर्मनी या स्विट्जरलैंड में यदि कोई व्यक्ति साइकिल से जा रहा है, तो पीछे से आ रही कोई कार या लग्जरी व्हीकल उसे जबरन ओवरटेक करने की कोशिश नहीं करेगी। वहां बेवजह हार्न बजाकर साइकिल सवार पर दबाव बनाना या उसे डराना अपराध की श्रेणी में आता है। जब तक साइकिल चालक को सुरक्षित आगे निकलने का रास्ता नहीं मिल जाता, तब तक कार सवार धैर्यपूर्वक उसके पीछे 15-20 की स्पीड पर चलता रहेगा। वहां साइकिल सवार को सड़क पर पहला हक दिया जाता है।

सामाजिक नजरिया: हिकारत बनाम सम्मान

सबसे बड़ा अंतर हमारी और उनकी सामाजिक मानसिकता में है। भारत में साइकिल चलाने वाले को अक्सर वित्तीय रूप से कमजोर या कमतर नजर से देखा जाता है। सड़क पर चलते समय बड़ी गाड़ियों वाले उन्हें हिकारत से देखते हैं। इसके विपरीत, ऑस्ट्रिया और नीदरलैंड जैसे देशों में बड़े-बड़े कार्पोरेट लीडर्स, जर्नलिस्ट्स, प्रोफेसर और ब्यूरोक्रेट्स शान से सूट-बूट पहनकर साइकिल से अपने दफ्तर जाते हैं। वहां साइकिल चलाना गरीबी नहीं, बल्कि पर्यावरण के प्रति आपकी जिम्मेदारी, फिटनेस और आपके उच्च नागरिक बोध का प्रतीक माना जाता है।

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