MP में स्कूली शिक्षा का संकट, 12वीं तक पहुंचते-पहुंचते बच्चे पढ़ाई से दूर, इंदौर का सबसे बुरा हाल

 भोपाल। मध्य प्रदेश में शिक्षा के क्षेत्र में नए प्रयोगों के बड़े-बड़े दावों के बीच जमीनी हकीकत चिंताजनक है। कम छात्र संख्या वाले प्राथमिक स्कूलों को बंद करने और स्कूलों के मर्जर के फैसलों के चलते प्रदेश में लाखों बच्चों की पढ़ाई अधर में लटक गई है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, बीते सत्र में राज्य के स्कूलों से 15.25 लाख बच्चे गायब रहे, वहीं इस साल 11.12 लाख बच्चों को ‘ड्रॉपबॉक्स’ में डाल दिया गया है। ‘ड्रॉपबॉक्स’ में ऐसे छात्र शामिल हैं, जिन्होंने पुराना स्कूल तो छोड़ दिया है लेकिन किसी नए विद्यालय में दाखिला नहीं लिया है।

12वीं तक आते-आते टूट जाती है पढ़ाई की लड़ी

यूडाइस (UDISE) रिपोर्ट के मुताबिक, मध्य प्रदेश में पहली से 12वीं कक्षा तक का Retain Rate (स्कूल में टिके रहने की दर) घटकर 37.3% रह गया है, जबकि राष्ट्रीय औसत 51.9% है। इसका सीधा मतलब यह है कि राज्य में 62.7% बच्चे 12वीं की पढ़ाई पूरी करने से पहले ही स्कूल छोड़ रहे हैं।

दूरी बनी सबसे बड़ी बाधा

कम नामांकन का हवाला देकर प्राथमिक विद्यालयों को बंद किए जाने से बच्चों के लिए स्कूल की दूरी 1 से 5 किलोमीटर तक बढ़ गई है। यातायात साधन न होने और सुरक्षा कारणों से गरीब परिवारों को मजबूरन बच्चों की पढ़ाई छुड़ानी पड़ रही है या वे निजी स्कूलों की ओर रुख कर रहे हैं।

सरकारी आंकड़ों में भारी अंतर

शिक्षा पोर्टल पर 2025-26 के लिए नामांकित छात्र 1.35 करोड़ दर्ज हैं, जबकि यूडाइस रिपोर्ट में यह संख्या 1.52 करोड़ बताई गई है। 17 लाख के इस बड़े अंतर पर अधिकारियों का कहना है कि यूडाइस में प्री-प्राइमरी का डेटा भी शामिल होता है।

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