करीब दो दशकों तक धीरेंद्र मुकलवार ने पर्दे के पीछे रहकर काम किया। उन्होंने इंडिपेंडेंट प्रोजेक्ट्स के लिए संगीत दिया, जिंगल्स बनाए और ‘उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक’, ‘टॉयलेट: एक प्रेम कथा’ और ‘आर्टिकल 15’ जैसी फिल्मों में म्यूजिक प्रोड्यूसर के तौर पर योगदान दिया। लेकिन किसी पूरी फीचर फिल्म का संगीत अकेले संभालने का पहला मौका उन्हें एक ऐसे प्रोजेक्ट से मिला, जिससे उनका गहरा निजी जुड़ाव था।
डायरेक्टर विशाल चतुर्वेदी की फिल्म ‘हनुमान अंश‘ – जो नीम करौली बाबा के आध्यात्मिक जीवन पर आधारित थी – इसने धीरेंद्र को म्यूज़िक डायरेक्टर के तौर पर पहला सोलो क्रेडिट दिलाया। उन्होंने फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर तैयार किया और ‘सियावर रामचंद्र की जय’ गाना भी कंपोज़ किया; यह गाना असल में किसी पारंपरिक गाने के तौर पर नहीं सोचा गया था।
‘हनुमान अंश’ के बाद ही हुए नीम करौली बाबा के दर्शन
News18 Showsha के साथ एक खास बातचीत में, धीरेंद्र ने बताया कि ‘हनुमान अंश’ का मौका मिलने से कई साल पहले से ही वे नीम करौली बाबा को मानते थे। असल में, विशाल के फिल्म के लिए उनसे संपर्क करने से कुछ महीने पहले ही, वे छह-सात साल से वहां जाने की कोशिश करने के बाद आखिरकार कैंची धाम पहुंचे थे। धीरेन्द्र के लिए, इस समय को महज संयोग मानकर नजरअंदाज़ करना मुश्किल था। धीरेन्द्र ‘हनुमान अंश’ से अपने जुड़ाव को उस यात्रा से जोड़कर देखते हैं, जिस पर वे बरसों से जाना चाहते थे। कैंची धाम जाने की कई बार योजना बनाने के बावजूद, कोई न कोई वजह से यात्रा टल जाती थी। लेकिन पिछले साल अप्रैल में यह सब बदल गया।
सात साल से मौके के इंतजार में थे धीरेंद्र
वे याद करते हुए कहते हैं, ‘मैं इसे बस किस्मत ही कह सकता हूं। पिछले छह-सात सालों से मैं कैंची धाम जाने और बाबा जी का आशीर्वाद लेने के मौके का इंतज़ार कर रहा था, लेकिन किसी न किसी वजह से ऐसा हो ही नहीं पा रहा था। फिर, पिछले साल अप्रैल में मुझे आखिरकार कैंची धाम जाने का सौभाग्य मिला। और उस यात्रा के बस दो-तीन महीने बाद ही विशाल जी का फोन आया।’
विशाल ने की 43 दिन की आध्यात्मिक साधना
उस समय, विशाल खुद 43 दिन की एक आध्यात्मिक साधना कर रहे थे, जिसमें फिल्म के लिए हनुमान चालीसा का पाठ करना शामिल था। धीरेंद्र कहते हैं कि उन्होंने यह ऑफर लगभग तुरंत ही स्वीकार कर लिया, बिना डायरेक्टर को यह बताए कि वे हाल ही में कैंची धाम गए थे। वे कहते हैं, ‘तो, जब उन्होंने मुझे फ़िल्म का ऑफर दिया, तो मैंने एक पल की भी देरी किए बिना हां कह दिया। मुझे इसके बारे में सोचने की भी जरूरत नहीं पड़ी।’
विशाल और धीरेंद्र को एक-दूसरे का नहीं पता था
उन्होंने कहा, ‘बाद में, मैंने उनसे कहा- शायद आपको यकीन न हो, लेकिन मैं बस दो-तीन महीने पहले ही कैंची धाम गया था।’ दोनों में से किसी को भी नीम करौली बाबा के साथ दूसरे के जुड़ाव के बारे में पता नहीं था। विशाल को यह नहीं पता था कि धीरेंद्र बरसों से बाबा जी को मानते आ रहे थे, जबकि धीरेंद्र को जरा भी अंदाज़ा नहीं था कि विशाल उनके जीवन पर आधारित फिल्म बना रहे थे।
‘हनुमान अंश मिलना चमत्कार जैसा’
वे आगे कहते हैं, ‘इसलिए, यह फिल्म मिलना ही किसी चमत्कार जैसा लगा। सचमुच ऐसा महसूस हुआ जैसे यह कहीं पहले से ही लिखा जा चुका था कि ऐसा होना ही है।’ ‘हनुमान अंश’ का महत्व धीरेंद्र के लिए प्रोफेशनल तौर पर भी बहुत ज़्यादा था। सालों के अनुभव के बावजूद, म्यूजिक प्रोडक्शन और छोटे फॉर्मेट से हटकर किसी फ़ीचर फ़िल्म के लिए स्वतंत्र रूप से म्यूज़िक तैयार करना मुश्किल साबित हुआ था।
कैंची धाम जाने की इच्छा मजबूत हुई
यह जुड़ाव कोविड महामारी के दौरान और गहरा हो गया, जब धीरेन्द्र ने अपने दोस्तों और आस-पास के लोगों को मुश्किल हालात से गुज़रते देखा। कैंची धाम जाने की उनकी इच्छा और मजबूत हो गई, हालांकि वे वहां जा नहीं पा रहे थे। वे कहते हैं, ‘लोग अक्सर कहते हैं कि आप बस वहां जाने का फैसला नहीं कर सकते। इसके लिए एक ‘बुलावा’ होना जरूरी है। बाबा जी को आपको बुलाना होता है।’
‘हनुमान अंश’ का संगीत कैसे बना?
आखिरकार, उन्होंने जबरदस्ती संगीत बनाने की कोशिश छोड़ दी। उन्होंने कहा, ‘मैंने खुद को पूरी तरह समर्पित कर दिया। मैंने सोचा, ‘अब बाबा जी ही मुझे रास्ता दिखाएंगे। और उसी दिन, उसी पल, मुझे एक धुन मिली। वही धुन आगे चलकर ‘हनुमान अंश’ का संगीत बनी। असल में, फ़िल्म की शुरुआत भी उसी थीम से होती है।’