स्वामीनाथन एस. अंकलेसरिया अय्यर
किसने सोचा होगा कि यमन का एक गरीब और सशस्त्र मिलिशिया समूह वैश्विक अर्थव्यवस्था की दुखती रग दबा देगा? हूती विद्रोहियों ने मोका बंदरगाह और लाल सागर के दक्षिणी प्रवेश द्वार बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य को नियंत्रित करने वाले द्वीपों पर कब्जा कर लिया है। इसका असर वॉशिंगटन से नई दिल्ली और रियाद से इस्लामाबाद तक दिखाई दे सकता है।
सऊदी तेल पर बढ़ा संकट
अप्रैल 2026 के बाद जब ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद कर दिया, तो सऊदी अरब ने अपने ज्यादातर कच्चे तेल को ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन के जरिए लाल सागर तक पहुंचाना शुरू किया। हूती हमलों में आई शांति के दौरान अप्रैल-जून तिमाही में लाल सागर के रास्ते सऊदी अरब का तेल निर्यात बढ़कर 8.1 मिलियन बैरल प्रतिदिन हो गया था। इससे वैश्विक तेल कीमतों पर भी नियंत्रण रहा।
इसका असर कच्चे तेल की कीमतों पर भी दिखने लगा है। ब्रेंट क्रूड करीब 90 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 105 डॉलर तक पहुंच चुका है। अगर सऊदी तेल की सप्लाई लंबे समय तक बाधित रहती है तो कीमतों में और तेज उछाल आ सकता है।
शिपिंग पर बीमा खर्च का असर
सऊदी अरब कुछ तेल छोटे जहाजों के जरिए स्वेज नहर से निर्यात कर सकता है, लेकिन कुल निर्यात में भारी कमी आ सकती है। हूती विद्रोहियों का कहना है कि उनका निशाना केवल सऊदी शिपिंग है और दूसरे देशों के जहाज सुरक्षित हैं। हालांकि, यह भरोसा ज्यादा मजबूत नहीं है, क्योंकि किसी भी समय इस प्रतिबंध का दायरा बढ़ाया जा सकता है।
ऐसे में लाल सागर से गुजरने वाले जहाजों का बीमा प्रीमियम काफी बढ़ सकता है। पहले समुद्री रास्तों को रोकने के लिए बड़े नौसैनिक बेड़े की जरूरत पड़ती थी, लेकिन अब ड्रोन और मिसाइलों के साथ ऊंचे बीमा खर्च भी शिपिंग को प्रभावित कर सकते हैं।
राजनीतिक असर ज्यादा
इसका सबसे बड़ा असर आर्थिक कम और राजनीतिक ज्यादा हो सकता है। सऊदी अरब हमेशा से अमेरिका को अपना सबसे बड़ा सुरक्षा कवच मानता आया है। पिछले साल नवंबर में ट्रंप और क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) ने एक बड़े सुरक्षा समझौते पर दस्तखत किए थे, जिसकी तुलना नाटो (NATO) से की गई थी।
जब हूती ड्रोन और मिसाइलों ने सऊदी ठिकानों पर हमला बोला, तो क्राउन प्रिंस ने ट्रंप से अमेरिकी सेना भेजने की दो बार व्यक्तिगत अपील की। लेकिन ट्रंप ने साफ इनकार कर दिया। उन्होंने सिर्फ खुफिया जानकारी देने की बात कही, सेना भेजने से मना कर दिया।
सऊदी अरब ने पाकिस्तान और तुर्की के साथ ‘मक्का सुरक्षा समझौता’ भी किया था, जिसमें कहा गया था कि किसी एक देश पर हमला सभी पर हमला माना जाएगा। लेकिन क्या पाकिस्तान या तुर्की इस जंग में कूदेंगे? इस समझौते का मतलब सिर्फ थोड़ी-बहुत खुफिया जानकारी साझा करना ही रहेगा, युद्ध के मैदान में कोई सेना नहीं आने वाली। अगर यह समझौता सिर्फ कागजी शेर साबित होता है, तो भारतीय राजनयिकों को इससे काफी खुशी होगी।
सबसे बड़ा संकट कच्चे तेल का नहीं
दुनिया के लिए इसके आर्थिक नतीजे बेहद डरावने हो सकते हैं। होर्मुज का रास्ता बंद होने के बावजूद दुनिया अब तक जैसे-तैसे बची हुई थी, क्योंकि चीन ने तेल का आयात कम कर दिया था और सऊदी अरब अपना तेल लाल सागर के रास्ते भेज रहा था।
लेकिन अब सऊदी अरब का 40 लाख बैरल कच्चा तेल और 40 लाख बैरल रिफाइंड तेल (पेट्रोल-डीजल) लाल सागर के जरिए बाहर नहीं आ पाएगा। दुनिया कच्चे तेल की कमी को तो फिर भी झेल सकती है, लेकिन रिफाइंड ईंधन, खासकर डीजल की किल्लत बहुत भारी पड़ेगी।
अमेरिका में दिखाई दे रहा असर
टीवी विश्लेषक भले ही इस बात पर बहस कर रहे हों कि कच्चा तेल 120 डॉलर तक जाएगा या नहीं, लेकिन असली मुसीबत डीजल की है। अमेरिका में डीजल 6 डॉलर से बढ़कर 8 डॉलर प्रति गैलन तक पहुंच सकता है, जो साल की शुरुआत से दोगुना है। यह महंगाई ट्रंप की चुनावी उम्मीदों को पूरी तरह बर्बाद कर सकती है।
कच्चा तेल सिर्फ 30% ही बढ़ा है, क्योंकि यूक्रेन ने रूस की कई तेल रिफाइनरियों को तबाह कर दिया है, जिससे रूस का रिफाइंड उत्पादन 20 लाख बैरल घट गया है। रूस अब कच्चा तेल तो ज्यादा बेच पा रहा है, लेकिन उसने अपने देश में डीजल के निर्यात पर पूरी तरह रोक लगा दी है।
भारत के लिए बढ़ेगी चुनौती
भारत दुनिया के बड़े तेल आयातकों में शामिल है, लेकिन साथ ही वह रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों का बड़ा निर्यातक भी है। रिफाइंड उत्पादों की कीमत कच्चे तेल की तुलना में तेजी से बढ़ने के कारण भारतीय रिफाइनरियों का मुनाफा पहले ही बढ़ रहा है। लाल सागर लंबे समय तक बंद रहा तो यह मार्जिन और बढ़ सकता है।
लेकिन अगर होर्मुज और बाब-अल-मंदेब दोनों लंबे समय तक बंद रहते हैं, तो सरकार का सब्सिडी बिल सीमा पार कर जाएगा, जिससे कड़े फैसले लेने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। ऐसे में घरेलू ईंधन कीमतों, सरकारी वित्त और महंगाई के बीच संतुलन बनाना बड़ी चुनौती होगी।