भारत से 3000 KM दूर घमासान, हूतियों का बाब अल-मंदेब के मुहाने पर कब्‍जा, जानिए क्‍या होगा असर?

सना/रियाद: यमन के हूती विद्रोही अब बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य पर कब्जा करने के काफी करीब पहुंच गये हैं। ईरान के समर्थन वाले हूती विद्रोही जिसे ‘अंसार अल्लाह’ भी कहा जाता है पिछले 18 घंटों से लगातार आगे बढ़ रहा है। वो अब बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य से 50 किलोमीटर से भी कम दूरी पर मौजूद है। यह पानी का एक संकरा रास्ता है जो रेड सी को गल्फ ऑफ अदन और उसके आगे अरब सागर से जोड़ता है।

अगर हूती विद्रोही इस 29 किलोमीटर चौड़े रास्ते पर कब्जा कर लेते हैं तो तेहरान ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ वाली अपनी रणनीति को यहां भी अपना सकता है और खाड़ी देशों से हिंद महासागर की ओर होने वाले ऊर्जा निर्यात को पूरी तरह से ब्लॉक कर सकता है। यानि ईरान जिसका कंट्रोल होर्मुज स्ट्रेट पर है उसका कंट्रल बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य पर भी हो जाएगा। ऐसे में सऊदी अरब का तेल कारोबार पूरी तरह से चोक हो सकता है।


बाब अल-मंदेब बंद हुआ तो भारत पर क्या असर?

होर्मुज स्ट्रेट की तरह बाब अल-मंदेब भी भारत के लिए काफी महत्वपूर्ण है। भारत न सिर्फ कच्चा तेल और दूसरे पेट्रोकेमिकल्स मंगाने के लिए बल्कि यूरोप तक पहुचने के लिए भी ‘बाब अल-मंदेब’ नाम के समुद्री रास्ते पर निर्भर है। रिफाइंड फ्यूल, दवाइयां, मशीनरी और दूसरे सामान ले जाने वाले जहाज भी अक्सर नीदरलैंड्स के रॉटरडैम और फ्रांस के मार्सिले जैसे बड़े यूरोपीय बंदरगाहों तक पहुंचने के लिए इसी जलडमरूमध्य का इस्तेमाल करते हैं।


ऐसी स्थिति में अगर ‘बाब अल-मंदेब’ (जिसका मतलब आंसुओं का दरवाजा होता है) पर कब्जा हो जाता है तो भारत को होने वाली जरूरी तेल की सप्लाई रुक सकती है। वैसे भी अमेरिका-ईरान तनाव शुरू होने के बाद से खाड़ी देशों से होने वाली पेट्रोलियम शिपमेंट में पहले ही काफी रुकावट आ चुकी है। साथ ही इससे भारत का एक्सपोर्ट भी ग्लोबल मार्केट में कम कॉम्पिटिटिव हो जाएगा।

बाब अल-मंदेब पर हूतियों का कब्जा भारत को कैसे पहुंचाएगा नुकसान?

भारत पर इसका गंभीर असर पड़ेगा। सबसे सीधा असर एनर्जी की कीमतों में ग्लोबल बढ़ोतरी के तौर पर दिखेगा। हालांकि इस क्षेत्र से गुजरने वाले तेल की मात्रा पहले ही कम हो गई थी और 2023 में क्रूड ऑयल और पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स की मात्रा 9.3 मिलियन बैरल प्रति दिन (bpd) थी जो 2025 की पहली छमाही में घटकर सिर्फ 4.2 मिलियन bpd रह गई है।


हूती हमलों की खबर से ब्रेंट क्रूड की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गई और बाद में यह 99 डॉलर के आसपास स्थिर हुई। अगर बाब अल-मंदेब लंबे समय तक बंद रहता है तो एनर्जी की कीमतें और बढ़ सकती हैं। नई दिल्ली रूस जैसे दूसरे स्रोतों से वैकल्पिक सप्लाई का इंतजाम कर सकती है लेकिन उसे फिर भी ज्यादा एनर्जी कीमतों का सामना करना पड़ेगा।

बाब अल-मंदेब पर कब्जे के बाद भारत के लिए एकमात्र दूसरा विकल्प अफ्रीकी महाद्वीप का चक्कर लगाकर जाना है। ऐसे रास्ते से मुंबई और रॉटरडैम के बीच की दूरी लगभग 15,700 km से बढ़कर 23,000 km हो जाएगी। इस लंबे रास्ते से यूरोप जाने वाले हर किलो सामान की लॉजिस्टिकल लागत बहुत बढ़ जाएगी जिससे भारतीय एक्सपोर्ट को बड़ा झटका लग सकता है।

Spread the love