मक्का पैक्ट का हो सकता है ‘अब्राहम अकॉर्ड’ जैसा हाल, सऊदी का पाकिस्तान पर दांव लगाना बड़ी गलती

रियाद: पाकिस्तान के आर्मी चीफ फील्ड मार्शल असीम मुनीर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जो छवि पेश कर रहे हैं और देश के अंदर की जो गंभीर सच्चाई है उनमें जमीन-आसमान का फर्क है। पाकिस्तानी हुकूमत के बढ़ा-चढ़ाकर किए गए दावों पर भरोसा करने के बजाय, जो देश अपनी लड़ाइयों के लिए पाकिस्तान आर्मी से मदद लेना चाहते हैं, उन्हें पहले यह निष्पक्ष रूप से परखना चाहिए कि क्या आर्मी बलूचिस्तान (जहां विद्रोह चल रहा है) और खैबर पख्तूनख्वा (जहां आतंकवाद का बोलबाला है) जैसे इलाकों में अपने ही जवानों की सुरक्षा कर सकती है?

18 सितंबर को खैबर पख्तूनख्वा में कोहाट पुलिस लाइंस पर ‘इत्तेहादुल मुजाहिदीन पाकिस्तान’ (जो तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान यानी TTP का ही एक गुट है) ने फिदायीन हमला किया। इसमें 16 पुलिसकर्मियों समेत करीब 23 लोगों की मौत हो गई। यह घटना पाकिस्तान के हालात की एक गंभीर मिसाल है। ठीक अगले ही दिन TTP के आतंकवादियों ने उसी इलाके में घात लगाकर हमला किया और पाकिस्तान आर्मी के छह जवानों (जिनमें दो अधिकारी भी शामिल थे) को मार डाला।

बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा में तैनाती से डर रहे जवान

रिपोर्ट तो यहां तक हैं कि आर्मी अधिकारी हिंसा से प्रभावित इन दो प्रांतों में पोस्टिंग लेने से इनकार कर रहे हैं और नौकरी तक छोड़ रहे हैं। भारी नुकसान और जवानों के गिरते मनोबल से परेशान होकर पाकिस्तान आर्मी ने बलूचिस्तान के अलगाववादियों और TTP के खिलाफ लड़ाई का काम ‘लश्करों’ को सौंपना शुरू कर दिया है। इन लश्करों में अफगान नेशनल आर्मी के पूर्व जवान शामिल हैं जो अगस्त 2021 में अफगानिस्तान में अफगान तालिबान के सत्ता में आने के बाद बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा के सीमावर्ती इलाकों में आ गए थे।

इन लोगों को हथियार दिए गए हैं और अशांत इलाकों में आर्मी और पुलिस की चेक पोस्ट संभालने की इजाज़त दी गई है। स्थानीय लोग इनकी मौजूदगी का विरोध कर रहे हैं क्योंकि ये लोग जबरन वसूली करते हैं और आम लोगों को परेशान करते हैं। अफगान तालिबान को पाकिस्तान के साथ अपनी सीमा पर इन लश्करों की मौजूदगी के बारे में पता है। हो सकता है कि पाकिस्तान पहले से ही इन मिलिशिया का इस्तेमाल अफगान तालिबान को अस्थिर करने के लिए कर रहा हो लेकिन अब तक उसे सफलता नहीं मिली है।
इसलिए इस बात की संभावना कम है कि अफगान तालिबान TTP के खिलाफ कार्रवाई की पाकिस्तान की मांगों को मानेगा। और इसीलिए तुर्की के खुफिया प्रमुख और कतर की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के उप सचिव – जिन्होंने पाकिस्तान जाने से पहले हाल ही में काबुल और कंधार में अफगान नेताओं से मुलाकात की थी उनसे दोनों देशों के बीच मध्यस्थता करने की कोशिशों से मतभेदों के सुलझने की संभावना कम है। चीन ने भी अप्रैल में ऐसी ही कोशिश की थी ताकि उसके सीपीईसी पर असर ना हो लेकिन वो भी नाकाम रहा था।

पाकिस्तान के रहते मक्का पैक्ट की नाकामी तय

इसलिए 7 अगस्त को मक्का में पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच हस्ताक्षरित और 31 अगस्त को ‘मक्का रक्षा गठबंधन’ को लेकर भारतीय सुरक्षा विश्लेषकों में जो डर था वो गलत था। पाकिस्तान और तुर्की पहले से ही हूती विद्रोहियों के खिलाफ सऊदी युद्ध में लड़ाके के तौर पर शामिल होने से इनकार कर रहे हैं। ये विद्रोही यमन में जमीनी स्तर पर आगे बढ़ने के साथ-साथ लाल सागर और मुख्य भूमि पर सऊदी आर्थिक हितों को निशाना बना रहे हैं और महत्वपूर्ण तेल बुनियादी ढांचे को भी नुकसान पहुंचा रहे हैं।

तुर्की ने सिर्फ ‘तकनीकी मदद’ देने पर सहमति जताई है। इसका मतलब जमीन पर सैनिक भेजे बिना एयर डिफेंस सिस्टम, काउंटर-ड्रोन टेक्नोलॉजी, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर क्षमताएं और समुद्री सुरक्षा में मदद करना हो सकता है।

इसलिए बहुत संभावना है कि मक्का डिफेंस अलायंस का भी वही हश्र होगा जो ‘बोर्ड ऑफ पीस’ और ‘अब्राहम एकॉर्ड्स’ का हुआ था जिन्हें अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सुरक्षित और शांतिपूर्ण पश्चिम एशिया के लिए आगे का रास्ता बताया था। असलियत यह है कि इनमें से कोई भी समझौता या गठबंधन फिलिस्तीनियों के अधिकारों और इजरायल द्वारा अपने पड़ोसियों और पश्चिम एशिया के देशों के खिलाफ की जाने वाली सैन्य आक्रामकता जैसे अहम मुद्दों को हल नहीं करता है।

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