6 साल की उम्र में लिया गोद, अब हिंसक व्यवहार से मां परेशान; क्या कानूनी तौर पर बच्चे को ‘वापस’ किया जा सकता है?

नई दिल्ली: क्या कानूनी प्रक्रिया पूरी कर गोद लिए गए बच्चे को सालों बाद वापस किसी संस्था को सौंपा जा सकता है? अगर बच्चा बड़ा होने के साथ इतना आक्रामक हो जाए कि गोद लेने वाले माता-पिता के लिए उसकी देखभाल करना मुश्किल हो जाए और परिवार को सुरक्षा का डर सताने लगे, तो कानून क्या रास्ता देता है? ऐसे ही अहम सवालों से जुड़ा एक मामला दिल्ली हाई कोर्ट पहुंचा है। कोर्ट ने मामले में केंद्र सरकार और संबंधित बाल कल्याण अधिकारियों से जवाब मांगा है।

2018 में 6 साल की उम्र में लिया था गोद

दिल्ली हाई कोर्ट जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की पीठ के सामने एक महिला ने याचिका दायर की है। महिला के मुताबिक, उसने और उसके पति ने 2018 में CARA के माध्यम से 6 साल के बच्चे को कानूनी प्रक्रिया पूरी करने के बाद गोद लिया था। याचिका में दावा किया गया है कि बाद में बच्चे के व्यवहार और मानसिक स्थिति से जुड़ी गंभीर समस्याएं सामने आईं।

आक्रामक व्यवहार और चोरी का लगाया आरोप

महिला के वकील अली बिन सैफ ने अदालत को बताया कि बच्चे के व्यवहार में आक्रामकता और चोरी जैसी समस्याएं सामने आईं। याचिका के अनुसार, उसे कई स्कूलों से भी निकाला जा चुका है। एक स्कूल में कथित तौर पर एक अन्य छात्र के साथ अनुचित व्यवहार की घटना सामने आने के बाद उसका दाखिला भी खत्म कर दिया गया था।

पति की मौत के बाद बढ़ी मुश्किल

याचिका के मुताबिक, बच्चे को गोद लेने के करीब तीन साल बाद महिला के पति का निधन हो गया। इसके बाद महिला अपनी बुजुर्ग मां और बहन के साथ रह रही है। महिला का कहना है कि घर में तीन महिलाएं हैं और बच्चे के बढ़ते आक्रामक व्यवहार के कारण उनकी सुरक्षा को लेकर लगातार चिंता बनी रहती है।

मां चाहती है संस्था को सौंपी जाए कस्टडी

महिला ने हाई कोर्ट से मांग की है कि बच्चे की कस्टडी ‘सेंट्रल एडॉप्शन रिसोर्स अथॉरिटी’ (CARA) या किसी सरकारी अथवा निजी संस्था को सौंपने के लिए निर्देश दिए जाएं। उसका कहना है कि ऐसी संस्था बच्चे को जरूरी मेडिकल देखभाल और इलाज उपलब्ध करा सकती है। महिला ने अदालत को यह भी बताया कि वह अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार बच्चे के इलाज का खर्च उठाने के लिए तैयार है।

हाई कोर्ट ने पूछा- कानून में क्या है रास्ता?

सुनवाई के दौरान जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने कहा कि ऐसे मामलों में गोद लिए गए नाबालिग की वापसी या वैकल्पिक देखभाल से जुड़े कानूनी प्रावधानों पर बहुत कम उदाहरण उपलब्ध हैं। कोर्ट ने केंद्र सरकार से CARA के माध्यम से इस मुद्दे पर अपना पक्ष रखने को कहा है।

चाइल्ड वेलफेयर कमिटी को भी नोटिस

हाई कोर्ट ने लाजपत नगर स्थित चाइल्ड वेलफेयर कमिटी-कस्तूरबा निकेतन कॉम्प्लेक्स को भी नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने पूछा है कि क्या नाबालिग को वहां रखा जा सकता है। मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने संबंधित अधिकारियों से 30 सितंबर तक जवाब दाखिल करने को कहा है। अब इस मामले में अदालत के सामने मुख्य सवाल सिर्फ परिवार की परेशानी का नहीं, बल्कि ऐसे हालात में गोद लिए गए नाबालिग की देखभाल, सुरक्षा, पुनर्वास और कानूनी कस्टडी की व्यवस्था से भी जुड़ा है।

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