नई दिल्ली: भारत ने हाल में कई देशों के साथ ट्रेड डील की है। इनका मकसद इन देशों के साथ आपसी व्यापार को बढ़ाना है। 15 साल पहले भारत ने आसियान, जापान और दक्षिण कोरिया के साथ ट्रेड एग्रीमेंट्स किए थे। साउथ कोरिया और आसियान देशों के साथ ट्रेड एग्रीमेंट 1 जनवरी, 2010 से लागू हुए जबकि जापान के साथ यह समझौता अगस्त 2011 में वजूद में आया। इनका मकसद भारतीय निर्यातकों को एशियाई बाजारों तक बेहतर पहुंच देना, आर्थिक जुड़ाव को गहरा करना और व्यापार का विस्तार करना था। इन देशों के साथ भारत का कारोबार बढ़ा लेकिन उसकी रफ्तार ज्यादातर एकतरफा ही रही।
पिछले 15 साल में इन देशों के साथ भारत के ट्रेड का विस्तार हुआ है। तीनों बाजारों में भारत का निर्यात बढ़ा है। लेकिन आयात बहुत तेजी से बढ़ा है। नतीजा यह हुआ कि इन देशों के साथ भारत का व्यापार घाटा आज कई गुना बढ़ चुका है। ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के मुताबिक 2007-09 और 2023-25 के बीच आसियान के साथ भारत का व्यापार घाटा 381%, जापान के साथ 318% और दक्षिण कोरिया के साथ 268% बढ़ गया। इसी अवधि में बाकी दुनिया के साथ भारत का व्यापार घाटा 142% बढ़ा।
कई गुना बढ़ा व्यापार घाटा
GTRI के अनुसार, 2025 तक के तीन वर्षों में आसियान, जापान और दक्षिण कोरिया के साथ भारत का कुल व्यापार घाटा औसतन लगभग 62 अरब डॉलर सालाना रहा। फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गेनाइजेशन (FIEO) के मुताबिक आसियान को भारत का निर्यात 2008-09 में लगभग 19 अरब डॉलर से बढ़कर 2025-26 में लगभग 38 अरब डॉलर हो गया, जबकि आयात 26 अरब डॉलर से बढ़कर लगभग 90 अरब डॉलर हो गया।
इस दौरान दक्षिण कोरिया के साथ एक्सपोर्ट बढ़कर लगभग $6 बिलियन हो गया है, जबकि इम्पोर्ट $21 बिलियन के पार पहुंच गया है। जापान के मामले में, एक्सपोर्ट 2010-11 में $5.1 बिलियन से बढ़कर 2025-26 में लगभग $6 बिलियन हो गया, जबकि इम्पोर्ट $8.6 बिलियन से बढ़कर $21 बिलियन से ज्यादा हो गया।
फायदा या नुकसान
FIEO के डायरेक्टर जनरल और सीईओ अजय सहाय ने ET ऑनलाइन को बताया, "इन आंकड़ों पर ध्यान देने की जरूरत है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) सही नहीं हैं। बल्कि, हमारे पार्टनर देशों को दी गई टैरिफ छूट के कारण इम्पोर्ट में जितनी तेजी से बढ़ोतरी हुई है, उतनी तेजी से भारतीय एक्सपोर्ट में बढ़ोतरी नहीं हुई है।" भारत ने अपने शुरुआती कई FTA तब किए जब उसके इंपोर्ट टैरिफ काफी ज्यादा थे, जबकि कई पार्टनर देश पहले से ही कम टैरिफ वाली अर्थव्यवस्थाएं थे।
भारत ने नहीं उठाया फायदा
असल में, कस्टम्स ड्यूटी आम तौर पर इंपोर्टर देता है, लेकिन यह उदाहरण ‘लैंडेड कॉस्ट’ पर असर को दिखाता है। विदेश में कम टैरिफ हटाने से भारतीय एक्सपोर्टर को शायद मामूली फायदा ही मिले, जबकि भारत के काफी ज्यादा टैरिफ हटाने से पार्टनर देश के एक्सपोर्टर को बड़ा फायदा मिल सकता है।
आर्थिक मौके की शुरुआत
इंटरनेशनल ट्रेड पॉलिसी और WTO के स्वतंत्र एक्सपर्ट और सेंटर फॉर WTO स्टडीज के पूर्व प्रमुख अभिजीत दास ने कहा, "भारत के एक्सपोर्ट में बढ़ोतरी की कहानी शायद घरेलू सुधारों के जरिए हमारी कीमत के मामले में कॉम्पिटिटिवनेस को बेहतर बनाकर लिखी जाएगी, ताकि ट्रांजैक्शन कॉस्ट, इन्फ्रास्ट्रक्चर की कमियों, फाइनेंस की लागत वगैरह से निपटा जा सके। यह उम्मीद करना कि FTA हमारे एक्सपोर्ट में काफी हद तक बढ़ोतरी करेंगे, शायद सही नहीं होगा।"