शरीर में सूजन होना हमेशा किसी बीमारी का संकेत नहीं होता। चोट, इन्फेक्शन या टिशू डैमेज के दौरान होने वाली एक्यूट इन्फ्लेमेशन शरीर की नेचुरल डिफेंस मैकेनिज्म है, जो हीलिंग में मदद करती है। लेकिन जब यह सूजन लंबे समय तक बनी रहती है, तो इसे क्रोनिक इन्फ्लेमेशन कहा जाता है। लगातार बनी रहने वाली इन्फ्लेमेटरी एक्टिविटी शरीर के हेल्दी सेल्स और टिशू पर असर डाल सकती है और कुछ हालात में कैंसर रिस्क से भी जुड़ी हो सकती है। रिसर्च के अनुसार क्रोनिक इन्फ्लेमेशन के दौरान बनने वाले कुछ रिएक्टिव मॉलिक्यूल्स डीएनए को डैमेज कर सकते हैं, जबकि लगातार टिशू डैमेज और रिपेयर का प्रोसेस एबनॉर्मल सेल ग्रोथ के लिए अनुकूल स्थिति बना सकती है। यही कारण है कि क्रोनिक इन्फ्लेमेशन और कैंसर के बीच संबंध को लेकर साइंटिफिक लंबे समय से स्टडी कर रहे हैं।
क्रोनिक इंफ्लेमेशन क्या है और यह एक्यूट इंफ्लेमेशन से कैसे अलग है?
एनसीबीआई के अनुसार एक्टयूट इंफ्लेमेशन (Acute Inflammation) शरीर की कम समय के लिए होने वाला प्रोटेक्टिव रिस्पॉन्स है। उदाहरण के लिए चोट लगने पर उस हिस्से में इम्यून सेल्स पहुंचते हैं, कैमिकल सिग्नल्स रिलीज होते हैं और टिशू रिपेयर की प्रक्रिया शुरू होती है। चोट या इंफेक्शन ठीक होने के बाद सामान्यतः इंफ्लेमेशन भी कम हो जाती है।
लगातार इंफ्लेमेशन कोशिकाओं को कैसे नुकसान पहुंचाती है?
क्रोनिक इंफ्लामेशन और कैंसर के बीच क्या कनेक्शन है?
एनसीबीआई के अनुसार क्रोनिक इंफ्लामेशन और कैंसर के बीच कनेक्शन कई स्तरों पर देखा गया है। एनसीबीआई के अनुसार इंफ्लेमेशन कैंसर की शुरुआत, ट्यूमर ग्रोथ, इनवेशन और मेटास्टेसिस जैसे अलग-अलग स्टेज्स को प्रभावित कर सकती है।
नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट के अनुसार इसके पीछे एक महत्वपूर्ण मेकेनिज्म है लगातार टिशू डैमेज और रिपेयर, जब किसी टिशू को बार-बार नुकसान पहुंचता है, तो शरीर उसे ठीक करने के लिए सेल्स को विभाजित करने का सिग्नल देता है। यदि इसी स्थिति में डीएनए डैमेजिंग इंफ्लामेटरी कैमिकल्स भी मौजूद हों, तो एबनॉर्मल जेनेटिक्स चेंजस का रिस्क बढ़ सकता है।
डीएनए डैमेज और एबनॉर्मल सेल ग्रोथ में इन्फ्लेमेशन की भूमिका
किन क्रॉनिक बीमारियों से कैंसर का खतरा बढ़ सकता है?
हर क्रॉनिक इंफ्लेमेटरी बीमारी कैंसर का कारण नहीं बनती। लेकिन कुछ खास कंडीशन और कैंसर के बीच मजबूत जुड़ाव देखा गया है।
- बाउल कैंसर के अनुसार क्रोहन डिजीज और अल्सरेटिव कोलाइटिस लंबे समय तक आंत में सूजन पैदा कर सकते हैं। इन कंडीशन वाले लोगों में, खासकर लंबे समय से बीमारी होने पर, कोलोरेक्टल कैंसर का खतरा बढ़ सकता है।
- नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट के अनुसार क्रोनिक हेपेटाइटिस बी और सी: लंबे समय तक हेपेटाइटिस बी या सी संक्रमण से लीवर में लगातार सूजन और ऊतक क्षति पैदा हो सकती है। इस प्रक्रिया से आगे चलकर लीवर कैंसर का खतरा जुड़ सकता है।
- एनआईएच के मुताबिक एच. पाइलोरी संक्रमण और क्रोनिक गैस्ट्रिटिस, पेट में लंबे समय तक रहने वाला हेलिकोबैक्टर पाइलोरी संक्रमण क्रोनिक इंफ्लेमेशन और एट्रोफिक गैस्ट्रिटिस पैदा कर सकता है।
- क्रोनिक पैंक्रियाटिस, लंबे समय तक पैंक्रिया में सूजन रहने से पैंक्रियाटिक कैंसर का खतरा बढ़ जाता है। हालांकि जोखिम हर व्यक्ति में समान नहीं होता है और इसके पीछे अन्य कारक भी महत्वपूर्ण हैं।
सबसे जरूरी बात यह है कि हर इंफ्लेमेशन कैंसर नहीं बनती और क्रोनिक इंफ्लेमेशन होने का मतलब कैंसर होना नहीं है। लेकिन अगर किसी व्यक्ति को लंबे समय से बिना किसी कारण के इंफ्लेमेशन, लगातार पाचन संबंधी लक्षण, लंबे समय का संक्रमण या किसी सूजन की बीमारी की समस्या है, तो उसका मेडिकल मूल्यांकन और उचित उपचार जरूरी है।