नई दिल्ली। आज एक ओर जहां इंटरनेट मीडिया पर प्रोटीन और मसल्स बिल्डिंग का चलन बढ़ रहा है, तो वहीं देश में ऐसे लोगों की भी संख्या कम नहीं है, जो कमजोर हड्डियों के चलते हर समय फ्रैक्चर के जोखिम में रहते हैं। हड्डियों के कमजोर होने या फ्रैक्चर होने के पीछे सबसे बड़ा कारण सूक्ष्म पोषक तत्वों (माइक्रोन्यूट्रिएंट्स) की कमी ही है।
इंडियन काउंसिल आफ मेडिकल रिसर्च (आइसीएमआर) और एंडोक्राइनोलाजी के विशेषज्ञ भारत में कमजोर हड्डियों की समस्या के पीछे आयोडीन की कमी को भी एक अहम कारण मानते हैं। विटामिन डी और कैल्शियम की कमी पहले से ही चिंताजनक स्थिति पैदा कर रही है।
अनुमान है कि भारत में 20 करोड़ से अधिक लोग आयोडीन की कमी से होने वाले विकारों के जोखिम में हैं। एक रिपोर्ट की मानें तो देश का कोई भी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश इस समस्या से अछूता नहीं है।
दरअसल, जब शरीर को पर्याप्त आयोडीन नहीं मिलता, तो थायरॉइड को अधिक मेहनत करनी पड़ती है। इससे धीरे-धीरे थायरॉइड का आकार बढ़ सकता है, जिसे घेंघा (गाइटर) कहते हैं। आयोडीन की गंभीर कमी से दिमाग का विकास भी प्रभावित होता है, खासकर बच्चों में और गर्भावस्था के दौरान इसका जोखिम अधिक रहता है।
आयोडीन की कमी से हाइपोथायरायडिज्म होता है, जो हड्डियों के निर्माण को बाधित करता है, जबकि आयोडीन की अधिकता या हार्मोनल असंतुलन (हाइपरथायरायडिज्म) हड्डियों के क्षरण को तेज करता है।
कितना गंभीर है थायरॉइड असंतुलन
आयोडीन की कमी के चलते थायरॉइड ग्रंथि का आकार बढ़ जाता है, कई बार लोगों के गर्दन में सूजन या गिल्टी की तरह दिखने लगता है। यह भी संभव है कि यह दिखाई न दे, लेकिन थायरॉइड असंतुलन से समस्याएं महसूस होने लगती हैं। इससे मेटाबोलिज्म, पाचन शक्ति कमजोर हो जाती है। बेसल मेटाबोलिक रेट कम होने से वजन बढ़ने लगता है।
इसके आम लक्षणों की बात करें, तो वजन बढ़ने के अलावा भूख कम लगने, शरीर में सूजन महसूस होने, थकान, सुस्ती, सुबह सोकर उठने के बाद ताजगी महसूस नहीं होने जैसी समस्याएं होती हैं। ऐसे लोगों को अधिक ठंड लगती है और अक्सर पेट की समस्याएं बनी रहती हैं। कुछ लोगों में बालों के झड़ने, त्वचा में रूखापन जैसी परेशानी होती है।
शारीरिक-मानसिक विकास के लिए जरूरी
शरीर खुद आयोडीन नहीं बनाता है, इसे प्राप्त करने का एक मात्र जरिया भोजन ही होता है। सीफूड्स, दुग्ध उत्पाद और आयोडीन युक्त नमक के जरिये ही इसकी भरपाई हो सकती है। हर हाल में इसके लिए असंतुलन को रोकना जरूरी है।
मेदांता अस्पताल गुरुग्राम की इंटरनल मेडिसिन की प्रिंसिपल कंसल्टेंट डॉ. आकांक्षा रस्तोगी कहती हैं कि गर्भावस्था के दौरान शुरुआत में ही थायरॉइड की जांच अवश्य करानी चाहिए, क्योंकि इसके असंतुलन से कई तरह के नकारात्मक असर होते हैं। अगर गर्भस्थ शिशु में आयोडीन की कमी हो गई या थायरॉइड हार्मोन कमा बना रहा, तो बच्चे का शारीरिक और मानसिक विकास बाधित हो सकता है।
आयोडीन की कमी के चलते कई बार गर्भपात होने की भी आशंका रहती है। चूंकि मेटाबोलिज्म प्रभावित हो रहा है, इसलिए हड्डियों के कमजोर होने की भी आशंका रहती है। थायरॉइड के मरीजों में कोलेस्ट्राल का स्तर पर संतुलित नहीं रह पाता है। ऐसे लोगों की बोन मिनरल्स डेंसिटी कम हो जाती है, जिससे फ्रैक्चर की आशंका बढ़ती है।
आयोडीन के प्रमुख सोर्स
- सीफूड्स- समुद्री शैवाल (सीवीड), झींगा (श्रिंप) और अन्य तरह के सीफूड्स में आयोडीन भरपूर मात्रा में होता है।
- दुग्ध उत्पाद- दूध, दही, पनीर आदि डेयरी उत्पादों में कुछ मात्रा में आयोडीन मिलता है।
- नमक- बाजार में आयोडाइज्ड नमक उपलब्ध है। इसका उचित मात्रा में सेवन करना चाहिए। खाना बनाते समय या खाते समय, आपको आयोडीन युक्त नमक का ही इस्तेमाल करना चाहिए।