एक साल से छोटे बच्चे को भूलकर भी न दें शहद और घुट्टी! जानिए आयुर्वेद एक्सपर्ट क्यों दे रहे हैं यह चेतावनी

नई दिल्ली। बच्चा रात में बार-बार रो रहा है, उसे पेट दर्द हो रहा है या खाना खाने में आनाकानी कर रहा है, तो सबसे पहले दादी-नानी के नुस्खे ही याद आते हैं। कभी पेट पर हल्की मालिश, कभी खाने-पीने में बदलाव, तो कभी सोने-जागने का समय ठीक करने की सलाह। 

पीढ़ियों से चले आ रहे ये अनुभव केवल घरेलू परंपराएं नहीं, बल्कि बच्चों की जरूरतों और तकलीफ को करीब से समझने का तरीका भी हैं। बच्चों की देखभाल को उनकी उम्र, पाचन क्षमता, खानपान और दिनचर्या से जोड़कर देखा जाता है। 

अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान (एआईआईए) के कौमारभृत्य (बाल रोग) विभाग के प्रमुख प्रो. राजगोपाल एस. के अनुसार आयुर्वेद में बाल्यावस्था को क्षीरदा (जन्म से एक साल तक), क्षीरान्नादा (एक से तीन साल) और अन्नादा (तीन साल के बाद) में बांटा गया है, इसलिए उसकी देखभाल भी उसी के अनुसार होनी चाहिए।

समझें बच्चों की जीवनशैली का नियम

  • जन्म से एक साल तक- शुरुआती छह महीने तक मां का दूध बच्चे के लिए सर्वोत्तम आहार है। इस दौरान बिना चिकित्सकीय सलाह के पानी, शहद, घुट्टी या जड़ी-बूटियों का मिश्रण नहीं देना चाहिए। छह महीने पूरे होने पर मां के दूध के साथ उम्र के अनुकूल पूरक आहार शुरू किया जाता है। भोजन नरम, साफ व पौष्टिक होना चाहिए। इस उम्र में भी औषधि देने से पहले विशेषज्ञ की सलाह आवश्यक है।
  • एक से तीन वर्ष- इस उम्र में बच्चा चलना, बोलना और आसपास की चीजों को समझना सीखता है। गतिविधियां बढ़ने के साथ पोषण की जरूरत भी बढ़ती है। भोजन में दाल, अनाज, मौसमी फल, सब्जियां और प्रोटीन के उपयुक्त स्रोत शामिल करें। जबरन खिलाने के बजाय थोड़ी-थोड़ी मात्रा में भोजन दें।
  • तीन साल के बाद- बच्चे की सीखने और शारीरिक गतिविधियों की क्षमता तेजी से बढ़ती है। घर के संतुलित भोजन की आदत डालें। अधिक मीठे पेय, पैकेट वाले खाद्य पदार्थ और तले हुए भोजन को सीमित रखें। नियमित खेल, पर्याप्त नींद, व्यक्तिगत स्वच्छता और समय पर टीकाकरण पर ध्यान दें।

दादी-नानी के नुस्खे, पर रहे सावधानी भी

  • देखभाल का तरीका- जन्म के बाद आरंभिक महीनों में पोषण व सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण है। चलना-फिरना सीखने के साथ बच्चे की ऊर्जा की आवश्यकता बढ़ती है। बच्चे के चलने, बोलने, दूसरों के साथ प्रतिक्रिया देने जैसी आदतों पर ध्यान देना चाहिए। हर उम्र में एक जैसा खानपान और देखभाल उचित नहीं है।
  • बच्चों में पेट की परेशानी- दूध पीते समय हवा निगलने से छोटे बच्चों को पेट में परेशानी हो सकती है। दूध पिलाने के बाद बच्चे को कुछ देर सीधा रखकर डकार दिलाना और जागते समय पेट पर हल्की मालिश करना उन्हें आराम पहुंचाता है। सोते समय पैरों को साइकिल की तरह चलाना भी आराम देता है।
  • कब्ज होने पर उपाय- उम्र के अनुसार बच्चे को पर्याप्त तरल, फल, सब्जियां व रेशे (फाइबर) वाला भोजन कब्ज से राहत में मदद करता है। नियमित समय पर शौच की आदत डालें। छोटे बच्चों को अरंडी का तेल, त्रिफला, चूर्ण या कोई अन्य जड़ी-बूटी बिना विशेषज्ञ की सलाह के न दें।
  • सर्दी-खांसी- पर्याप्त आराम और तरल देना सामान्य देखभाल के उपयोगी तरीके हैं। नाक बंद होने पर शिशुओं के लिए उपयुक्त सेलाइन ड्राप का उपयोग किया जा सकता है। एक साल से अधिक उम्र के बच्चों को थोड़ी मात्रा में शहद खांसी से राहत देता है, पर उससे कम के बच्चे को शहद बिल्कुल न दें। बिना चिकित्सकीय सलाह के कफ सिरप, काढ़ा या जड़ी-बूटियों के मिश्रण न दें।  

परेशानियों को समझें

  • दांत निकलने पर बेचैनी- इस दौरान मसूड़ों में खुजली, अधिक लार और चिड़चिड़ापन हो सकता है। साफ उंगली से मसूड़ों की हल्की मालिश या सुरक्षित टीथर से राहत मिल सकती है। मसूड़ों पर शहद, ब्रांडी या सुन्न करने वाली दवा न लगाएं। तेज बुखार या दस्त को केवल दांत निकलने का असर मानकर नजरअंदाज न करें।
  • नींद की परेशानी- नियमित सोने-जागने का समय और शांत वातावरण बच्चों की अच्छी नींद के लिए जरूरी है। सोने से पहले स्क्रीन टाइम से बचें, मोबाइल न दें। शिशु को पीठ के बल, सपाट और सख्त सतह पर सुलाएं। लगातार खर्राटे, खर्राटों में सांस रुकने जैसी स्थिति या असामान्य सुस्ती पर विशेषज्ञ सलाह लें।
  • कम भूख- बच्चों की भूख में कभी-कभी बदलाव सामान्य है। बार-बार नाश्ता देने, मीठे पेय पिलाने और जबरन खिलाने से बचें। भोजन का समय तय करें। परिवार के साथ खाने के लिए प्रोत्साहित करें, बातचीत करें, कहानी सुनाएं और उसे बोलने का अवसर दें। मोबाइल देकर चुप रखने से बचें।

औषधि के साथ दिनचर्या महत्वपूर्ण

प्रो. राजगोपाल एस. बताते हैं कि आयुर्वेद में बच्चों की देखभाल केवल औषधियों से ही नहीं, खानपान, नींद, स्वच्छता और शारीरिक गतिविधियों से भी होती है। औषधि या उपचार को अपनाने से पहले बच्चे की स्थिति और चिकित्सकीय आवश्यकता का आकलन जरूरी है। दादी-नानी के अनुभव बच्चों की देखभाल में उपयोगी हैं पर गंभीर लक्षणों में घरेलू उपचार पर निर्भर रहना ठीक नहीं। बच्चों की बेहतर सेहत के लिए परंपरा और विज्ञान का संतुलन आवश्यक है, क्योंकि बच्चे का स्वास्थ्य ही स्वस्थ समाज के स्वास्थ्य की नींव है।

प्रस्तुति- अनूप कुमार सिंह


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