पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने 2020 में मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार गिरने के पीछे की वजहों का खुलासा किया है। उन्होंने दैनिक भास्कर से बातचीत में सरकार गिरने की वजह कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच ‘ईगो’ (अहंकार) का टकराव और अफसरशाही को लेकर खींचतान को बताया।
उज्जैन से अयोध्या तक निकाली जा रही ‘शिवधाम से रामधाम सत्य सनातन स्वाभिमान यात्रा’ के दौरान दिग्विजय ने बताया कि 2018 में कांग्रेस सरकार बनने के बाद सिंधिया मुख्यमंत्री बनना चाहते थे। बाद में कमलनाथ ने उन्हें मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी (PCC) का अध्यक्ष बनने का विकल्प दिया, लेकिन सिंधिया ने इसे ठुकरा दिया। वह अपने समर्थक तुलसी सिलावट को PCC चीफ और गोविंद सिंह राजपूत को उपमुख्यमंत्री बनवाना चाहते थे। कमलनाथ के तैयार नहीं होने से दोनों नेताओं के बीच तनाव बढ़ता गया।
दिग्विजय के मुताबिक, दिल्ली में 23 सफदरजंग रोड स्थित सरकारी बंगले को रिटेन करने की कोशिश और ग्वालियर-चंबल संभाग में कलेक्टर-एसपी के तबादलों को लेकर खींचतान ने भी विवाद बढ़ाया। आखिरकार, इन मतभेदों के बीच मार्च 2020 में कमलनाथ सरकार गिर गई।
पढ़िए दिग्विजय सिंह से बातचीत के प्रमुख अंश-
भास्कर: आपने अपनी इस यात्रा का नाम ही ‘सनातन’ रख दिया है, जबकि सनातन का पेटेंट तो आज भाजपा ले चुकी है?
दिग्विजय: नाम ‘सत्य सनातन स्वाभिमान यात्रा’ है। भाजपा का सनातन से कोई लेना-देना नहीं है। सनातन हजारों साल पुराना है। आरएसएस और वीएचपी तो कल की पैदाइश हैं। इन्होंने ‘सनातन’ और ‘सत्य सनातन’ नाम से सोशल मीडिया हैंडल रजिस्टर्ड करा रखे हैं, जिन पर फॉलोअर्स नगण्य हैं। ये केवल प्रचार करते हैं, जबकि इनके कर्म सनातन के मूल विचारों के विपरीत हैं।
भास्कर: आप ‘जेन-जी’ (Gen Z), युवाओं और जंतर-मंतर के आंदोलनों से खुद को कैसे जोड़ते हैं?
दिग्विजय: इंसान उतना ही जवान होता है, जितना वह महसूस करता है। मैं 11 से 30 साल के युवाओं से निरंतर संवाद रखता हूं। मेरे पिता कहते थे कि बेटा जब 16 का हो जाए, तो उससे छोटे दोस्त की तरह व्यवहार करना चाहिए।
जब अभिजीत दिपके ने ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) का विचार रखा और कुछ ही घंटों में लाखों फॉलोअर्स जोड़ लिए, तो मुझे लगा कि यही युवाओं की ताकत है जो भाजपा की नफरत की राजनीति को हरा सकती है।
भास्कर: भाजपा से आपका यह सीधा टकराव किस बात को लेकर है?
दिग्विजय: मेरी लड़ाई व्यक्तियों से नहीं, भाजपा की विभाजनकारी विचारधारा से है। वे देश के सांप्रदायिक सौहार्द, संविधान और ‘आइडिया ऑफ इंडिया’ को खत्म कर रहे हैं। सनातन का मूल आधार है—’धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो, प्राणियों में सद्भावना हो और विश्व का कल्याण हो।’
संघ इसका ठीक उल्टा करता है। जब मैं यह कहता हूं तो वे मुझे हिंदू-विरोधी या मुसलमान कह देते हैं। ‘हिंदू’ शब्द तो फारसी से आया है, हमारा मूल धर्म सनातन है। मैंने गीता (तिलक और गांधी जी दोनों के भाष्य), कुरान के दो तर्जुमे, बाइबिल और गुरु ग्रंथ साहिब पढ़े हैं; सबका सार सिर्फ इंसानियत है।
भास्कर: खेल और इंजीनियरिंग से राजनीति में आपका पदार्पण कैसे हुआ?
दिग्विजय: मेरी रुचि कभी राजनीति में नहीं थी। बोर्डिंग स्कूल डेली कॉलेज और फिर जीएसआईटीएस से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की। हमेशा प्रथम श्रेणी में पास हुआ। क्रिकेट (विकेटकीपर/ओपनर), फुटबॉल (डिफेंडर), हॉकी (सेंटर फॉरवर्ड) और स्क्वैश का चार-पांच साल सेंट्रल जोन चैंपियन रहा।
इलिनोइ यूनिवर्सिटी (अमेरिका) से इंडस्ट्रियल इंजीनियरिंग में मास्टर्स का बुलावा आ गया था, लेकिन 1967 में पिताजी के निधन के बाद मां के कहने पर मुझे राघोगढ़ रुकना पड़ा। 1969 में राघोगढ़ नगरपालिका चुनाव में 3 कांग्रेस, 3 जनसंघ और 2 मजदूर पार्टी के जीते। गतिरोध के बीच सबने कहा कि ‘यह बाहर से पढ़ा राजा आया है, इसे बना दो।’ और मैं निर्विरोध अध्यक्ष बन गया।
भास्कर: सिंधिया राजघराने और आपके परिवार की पुरानी रंजिश कैसे खत्म हुई?
दिग्विजय: 18वीं सदी में दौलतराव सिंधिया की अंग्रेजों से संधि के बाद सात-आठ पीढ़ियों तक हमारा टकराव चला। आजादी के बाद 1952 में जब मेरे पिता निर्दलीय विधायक बने और जीवाजीराव महाराज मध्य भारत के राजप्रमुख थे, तो जीवाजीराव जी ने पिताजी को डिनर पर बुलाकर कहा, "राजपाट तो दोनों के चले गए, अब कड़वाहट छोड़कर मिला जाए।" वहां से मित्रता शुरू हुई।
राजमाता विजयाराजे सिंधिया मुझे दूसरे बेटे की तरह मानती थीं। 1977 की भीषण कांग्रेस विरोधी लहर में जब मैं राघोगढ़ से लड़ा, तो उन्होंने और माधवराव जी ने मेरे पूरे क्षेत्र में एक भी भाषण मेरे खिलाफ नहीं दिया।
भास्कर: माधवराव सिंधिया को कांग्रेस में लाने वाले आप ही थे?
दिग्विजय: हां, 1980 के चुनाव से पहले माधवराव जी जनता पार्टी से इस्तीफा देकर निर्दलीय थे। संजय गांधी जी ने मुझसे साफ कहा, "दिग्विजय, यदि तुम माधवराव को कांग्रेस में नहीं लाए, तो समझ लेना।"
मैं अर्जुन सिंह जी की मदद से मुंबई गया, जहां सिंधिया जी ‘उगता सूरज’ चुनाव चिह्न के पोस्टर बनवा रहे थे। मैंने समझाया कि संघ की विचारधारा आपके स्वभाव के अनुकूल नहीं है और कांग्रेस में राजा-महाराजाओं की जगह है। वे तैयार हुए और संजय जी से मिलने के बाद दिल्ली में उन्होंने कांग्रेस की सदस्यता ली।
भास्कर: अयोध्या मामले में आपने नरसिम्हा राव सरकार के दौरान कोई गुप्त मिशन भी किया था?
दिग्विजय: 1994-95 में प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव बाबरी ढांचा विध्वंस के बाद राम जन्मभूमि विवाद को गैर-राजनीतिक बनाकर धर्माचार्यों को सौंपना चाहते थे। इसके लिए ‘रामालय ट्रस्ट’ बनाया गया, जिसमें शंकराचार्यों के हस्ताक्षर जरूरी थे। राव के आदेश पर मैं और उनके विशेष सचिव मिस्टर प्रसाद गुप्त रात में सरकारी चार्टर विमान से वाराणसी पहुंचे।
नाव से श्रीमठ जाकर स्वामी रामनरेशाचार्य के साथ रात 11 बजे शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती को जगाया। चर्चा के बाद उन्हें ट्रस्ट का अध्यक्ष बनाने पर सहमति बनी। राव ने दोनों संतों के चरण स्पर्श किए और 67 एकड़ अधिग्रहीत भूमि ट्रस्ट को सौंपने की प्रक्रिया शुरू की, लेकिन 1996 में सरकार जाने से यह अधूरी रह गई।
भास्कर: नर्मदा परिक्रमा का संकल्प कैसे जागा और परिवार का इसमें क्या साथ रहा?
दिग्विजय: 2001-02 में जब मैं मुख्यमंत्री था, मंडला सर्किट हाउस में भोर में तीन-चार बार मेरी नींद खुली और अंतर्मन में नर्मदा परिक्रमा का स्पष्ट संदेश गूंजा। मैंने गुरु शंकराचार्य स्वरूपानंद जी को बताया, तो उन्होंने पैदल परिक्रमा का आदेश दिया।
राजनीतिक व्यस्तताओं के चलते यह 2017 में संभव हुआ। इस बीच मेरी पहली पत्नी आशा (आशु) जी, जिनसे 1969 में विवाह हुआ था और जिन्होंने चार बेटियों व जयवर्धन के लालन-पालन से लेकर घर की पूरी जिम्मेदारी संभालकर मुझे राजनीति की खुली छूट दी थी, 2013 में शांत हो गईं। उनके जाने के बाद अमृता जी मेरे जीवन में आईं।
2017 में जब मैंने परिक्रमा की, तो अमृता ने मेरे साथ पूरी नर्मदा परिक्रमा पैदल की; वे एक दिन भी गाड़ी में नहीं बैठीं। इस यात्रा का मूल विचार भी अमृता का ही था और मेरी पत्नी अमृता ने इस साधना में मेरा पूरा साथ निभाया।
भास्कर: 2018 में मध्य प्रदेश में कांग्रेस सरकार के गिरने की असल वजह क्या थी?
दिग्विजय: 2018 में कांग्रेस के 114 विधायकों में 90 से अधिक कमलनाथ के साथ थे, जबकि 20-22 सिंधिया के साथ। सिंधिया मुख्यमंत्री बनना चाहते थे, लेकिन संख्याबल नहीं था। कमलनाथ ने उन्हें PCC अध्यक्ष बनने का प्रस्ताव दिया, जिसे उन्होंने ठुकरा दिया।
लोकसभा चुनाव हारने के बाद सिंधिया 23 सफदरजंग रोड स्थित सरकारी बंगला मध्य प्रदेश कोटे से रिटेन कराना चाहते थे, लेकिन कमलनाथ तैयार नहीं हुए। विवाद सुलझाने के लिए शोभना भरतिया के घर सुनील मित्तल की मौजूदगी में डिनर रखा गया। वहां कमलनाथ सिंधिया पर बिफर पड़े, “व्हाट डू यू थिंक ऑफ योरसेल्फ, ज्योतिरादित्य? आई एम द चीफ मिनिस्टर!” बीच-बचाव करने पर उन्होंने दिग्विजय को भी चुप करा दिया।
बाद में दिग्विजय और सिंधिया ने ग्वालियर संभाग में तबादलों की सहमति सूची बनाकर कमलनाथ को दी, लेकिन डेढ़ महीने तक आदेश जारी नहीं हुए। पूछने पर कमलनाथ बोले, “दिग्विजय, एम आई अ फूल? तुम दोनों एक हो गए तो मेरी क्या स्थिति रहेगी?” दिग्विजय के मुताबिक, इसी अविश्वास और टकराव के चलते सरकार गिर गई।
भास्कर: आप पर सुपर सीएम होने और उस सरकार को रिमोट से चलाने का आरोप भी लगा था?
दिग्विजय: यह पूरी तरह गलतफहमी थी। उस सरकार के एक मंत्री ने तो सार्वजनिक रूप से कहा था कि दिग्विजय सिंह माफिया चला रहे हैं। सच यह है कि कमलनाथ जी को मुख्यमंत्री बनाने में मेरी बड़ी भूमिका थी और मैं अपनी निष्ठा के प्रति हमेशा अडिग रहा। यदि किसी ने मुझ पर एक प्रतिशत भी उपकार किया हो, तो वह भले मेरा साथ छोड़ दे, मैं उसका साथ कभी नहीं छोड़ता।
भास्कर: आपके किले पर भगवा ध्वज रहता है, आप एकादशी-गुरुवार का व्रत रखते हैं, फिर भी हिंदू-विरोधी की छवि क्यों?
दिग्विजय: इसमें मीडिया का बड़ा हाथ है। मैं नित्य आधा घंटा पूजा के बाद ही अन्न ग्रहण करता हूं। चारों धाम कर चुका हूं। जब मैं यूपी का प्रभारी था, तो गोरखनाथ मठ के तत्कालीन महंत अवैद्यनाथ जी के सबके सामने पैर छूता था।
योगी आदित्यनाथ मिलते हैं तो मैं उनके चरण स्पर्श करता हूं, क्योंकि यह सम्मान उस पवित्र नाथ पीठ का है, लेकिन मैं उनकी राजनीति की निंदा करता हूं, क्योंकि वे गुरु गोरखनाथ के सर्वसमावेशी आदर्शों के खिलाफ काम करते हैं। गोरखनाथ मठ के लिए ऐतिहासिक रूप से भूमि अवध के नवाब ने दी थी, क्योंकि तत्कालीन सूफी संत और मठ के महंत में गहरी मित्रता थी।
भास्कर: आप जंतर-मंतर पर छात्र आंदोलनों में जाने वाले थे, फिर क्यों रुके?
दिग्विजय: जब संसद घेराव की तैयारी थी, मैंने कांग्रेस के युवा नेता सौरभ से बात कर सुबह 8 बजे जाने का तय किया था, लेकिन जयराम रमेश ने फोन पर साफ कहा, "व्हाट ब्लडी नॉनसेंस दिग्विजय, तुम्हें वहां जाने की कोई जरूरत नहीं है।" पार्टी के कहने पर मैं उस दिन रुका, लेकिन अब मैं निश्चित रूप से युवाओं के बीच जाऊंगा।
सोशल मीडिया पर ध्रुव राठी जैसे स्वतंत्र आवाजों को मैं 2011 से समर्थन दे रहा हूं, जिनका एक वीडियो आधे घंटे में 10 लाख लोग देख लेते हैं। आज की राजनीति की चाबी इसी ‘जेन-ज़ी’ पीढ़ी के पास है।
भास्कर: ‘सत्य सनातन स्वाभिमान यात्रा’ (उज्जैन से अयोध्या) का वास्तविक मकसद क्या है?
दिग्विजय: यह लगभग 950 से 1000 किलोमीटर की पदयात्रा है। हम राष्ट्रपति महोदया के नाम एक डिजिटल याचिका जारी कर रहे हैं। हमारे सीधे सवाल हैं- क्या राजनीति में धर्म का हथियार की तरह इस्तेमाल सही है? क्या वोट चोरी और धार्मिक स्थलों के नाम पर चंदा वसूली की लूट पर निष्पक्ष जांच और सजा नहीं होनी चाहिए? यह यात्रा सनातन धर्म के मूल नैतिक मूल्यों और संविधान की रक्षा का खुला शंखनाद है।
अब कमलनाथ और सिंधिया के बीच मतभेदों की शुरुआत से लेकर सरकार गिरने तक की पूरी कहानी पढ़िए…
दिग्विजय सिंह के मुताबिक, 2018 में कांग्रेस के 114 विधायक जीते थे। इनमें 90 से ज्यादा कमलनाथ के साथ थे, जबकि सिंधिया के समर्थक 20-22 विधायक थे। सिंधिया मुख्यमंत्री बनना चाहते थे। वह कहते थे, “राजा, मुझे मुख्यमंत्री बनाओ। आई एम द फ्यूचर।” दिग्विजय उन्हें समझाते थे कि विधायक उनके साथ नहीं जाएंगे।
कमलनाथ ने सिंधिया को PCC अध्यक्ष बनाने और उनके किसी समर्थक को उपमुख्यमंत्री बनाने का प्रस्ताव दिया। सिंधिया ने इसके बजाय तुलसी सिलावट को PCC अध्यक्ष और गोविंद सिंह राजपूत या किसी अन्य को उपमुख्यमंत्री बनाने की मांग की। कमलनाथ इसके लिए तैयार नहीं हुए। दिग्विजय के अनुसार, दोनों नेताओं के बीच अहंकार का टकराव बढ़ता गया।
पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमला बोला। बुधवार को भोपाल में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने आरोप लगाया कि देश के संवैधानिक और शैक्षणिक संस्थानों पर संघ से जुड़े लोगों को बैठाया जा रहा है।